जागरण संपादकीय: जानलेवा जल, इंदौर में दूषित पेयजल से 14 लोगों की मौत
इसका परिणाम यह है महानगरों तक में गुणवत्ताहीन पेयजल की आपूर्ति होती है। इसके चलते प्रति वर्ष टाइफाइड, हेपेटाइटिस और हैजा जैसी जलजनित बीमारियों के लाखों मामले सामने आते हैं। यह तथ्य नीति आयोग के समग्र जल प्रबंधन सूचकांक का है कि भारत में सुरक्षित पेयजल के अभाव में हर साल लगभग दो लाख लोग जान गंवाते हैं।
HighLights
इंदौर में दूषित पेयजल से 14 लोगों की मौत हुई।
सीवर का पानी पीने की पाइपलाइन में मिला, त्रासदी का कारण।
नगर निगम की लापरवाही और मंत्री की संवेदनहीनता उजागर।
देश के सबसे स्वच्छ शहर का दर्जा रखने वाले इंदौर में दूषित पेयजल से 14 लोगों की मौत हो जाना बहुत ही आघातकारी और शर्मनाक घटना है। यह स्वच्छता के मानकों पर सवाल खड़े करने के साथ ही नगर निगम के नाकारापन को बयान करने वाली एक ऐसी घटना है, जो देश की छवि भी मलिन कर रही है। इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पेयजल की आपूर्ति इसलिए जानलेवा साबित हुई, क्योंकि सीवर की गंदगी पीने की पाइपलाइन में चली गई और फिर वह घरों तक पहुंच गई।
यदि दूषित पेयजल आपूर्ति की शिकायत पर तत्काल ध्यान दिया गया होता तो इस भयावह त्रासदी को रोका जा सकता था, लेकिन जैसा कि अपने देश में होता है, गंदी जलापूर्ति की शिकायतों पर तब तक ध्यान नहीं दिया गया, जब तक लोग मरने नहीं लगे। 14 लोगों की मौत और एक हजार से अधिक लोगों के बीमार होने और इनमें से सौ से ज्यादा लोगों के अस्पताल में भर्ती होने से यह सहज ही समझा जा सकता है कि कितने अधिक जहरीले जल की आपूर्ति हो रही थी।
यह आपूर्ति इंदौर के उस इलाके में हो रही थी, जो नगरीय विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का निर्वाचन क्षेत्र है और पेयजल की आपूर्ति करने वाला विभाग उनके ही मंत्रालय के तहत आता है। जब मंत्री महोदय से इस हत्यारी लापरवाही पर सवाल किए गए तो उन्होंने संवेदनहीनता का परिचय देते हुए ऐसे सवालों को फोकट का बता दिया।
इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि चौतरफा आलोचना से घिरने के बाद कैलाश विजयवर्गीय ने खेद जता दिया, क्योंकि उनकी वह संवेदनहीनता तो प्रकट हो ही गई, जो ऐसी घटनाओं का कारण बनती है। यह भी संतोषजनक नहीं कि इंदौर नगर निगम के संबंधित अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया, क्योंकि एक तो निलंबन कोई सजा नहीं और दूसरे, इसमें संदेह है कि ऐसे उपाय किए जा सकेंगे, जिससे फिर कभी दूषित जलापूर्ति न हो सके।
यह समझा जाए तो अच्छा कि स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति केवल इंदौर नगर निगम को ही सुनिश्चित नहीं करनी, क्योंकि देश में आम तौर पर पेयजल की गुणवत्ता संतोषप्रद नहीं। इसका प्रमाण यह है कि लोगों को स्वच्छ पेयजल के लिए आरओ आदि का सहारा लेना पड़ता है या फिर पीने का पानी खरीदना पड़ता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि एक ओर जहां पेयजल की गुणवत्ता के मानकों की अनदेखी होती है, वहीं दूसरी ओर और टूटी-फूटी पाइपलाइनों की सुधि मुश्किल से ही ली जाती है।
इसका परिणाम यह है महानगरों तक में गुणवत्ताहीन पेयजल की आपूर्ति होती है। इसके चलते प्रति वर्ष टाइफाइड, हेपेटाइटिस और हैजा जैसी जलजनित बीमारियों के लाखों मामले सामने आते हैं। यह तथ्य नीति आयोग के समग्र जल प्रबंधन सूचकांक का है कि भारत में सुरक्षित पेयजल के अभाव में हर साल लगभग दो लाख लोग जान गंवाते हैं।













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