ए. सूर्यप्रकाश। नए साल में कुछ नई चुनौतियां भी साथ आई हैं। देश और विशेष रूप से प्रधानमंत्री मोदी को इन चुनौतियों का सामना करना है। स्वाभाविक रूप से ऐसी चुनौतियों के कुछ तार कहीं न कहीं पिछले साल से भी जुड़े हुए हैं। अस्थिरता के शिकार वैश्विक ढांचे में डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों ने जो अनिश्चितता बढ़ाई, उससे उपजी चुनौतियों को प्रधानमंत्री मोदी ने कुशलता से संभाला। हालांकि इंडिगो संकट, अरावली खनन, प्रदूषण से कराहती राष्ट्रीय राजधानी के मुद्दे बेहद परेशान करने वाले रहे। दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में सजा काट रहे पूर्व विधायक को मिली राहत जैसी घटना भी चौंकाने वाली रही। हालांकि बाद में शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया। गोवा के नाइट क्लब में लगी भीषण आग की घटना में जिंदा जले लोग भी राज्य सरकार की अक्षमता और भ्रष्टाचार के शिकार बने। यह भी एक दुर्योग रहा कि ऐसे सभी मामले साल की अंतिम तिमाही के दौरान सामने आए, जो कहां न कहीं दर्शाता है कि प्रधानमंत्री के पास न केवल केंद्रीय, बल्कि राज्यों के स्तर पर भी सक्षम मंत्रियों एवं नौकरशाहों का अभाव है, जो एक पारदर्शी एवं प्रभावी सरकार की योजनाओं को लागू करने में सहायक बन सकें।

इंडिगो प्रकरण की ही बात करें तो विमानन नियामक ने इस कंपनी को ऐसी गुंजाइश ही क्यों दी कि वह बाजार के 65 प्रतिशत हिस्से पर काबिज हो सके। उसे परिचालन विस्तार के लिए ऐसी अनुमति कैसे मिलती गई कि वह नियामक को ही अपनी अंगुलियों पर नचा सके? ऐसे में डीजीसीए के ढांचे और कार्यप्रणाली पर सवाल उठने स्वाभाविक हैं। क्या उसके अधिकारी अपने दायित्वों का निर्वहन करने के लिए पर्याप्त रूप से सक्षम हैं या महज उसमें नियुक्ति पाने वाले नौकरशाह ही हैं। दिसंबर की शुरुआत में विमान सेवाओं के एक बड़े हिस्से के करीब-करीब ठप पड़ने के कई सप्ताह बाद भी इन सवालों के जवाब अभी तक नहीं मिल पाए हैं।

जहां तक अरावली मुद्दे का सवाल है तो केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने इस मामले में नवंबर में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का बचाव किया। हालांकि बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने ही अपने उस फैसले पर स्थगन का निर्णय किया। नवंबर में अदालत ने सरकार द्वारा गठित “विशेषज्ञ पैनल” द्वारा दी गई एक अजीब परिभाषा को स्वीकार कर लिया था। इसमें अरावली पहाड़ियों को 100 मीटर और उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों के रूप में श्रेणीबद्ध किया गया था। जहां मंत्रालय ने अपनी तथाकथित “विशेषज्ञ समिति” की इस राय का जोरदार बचाव किया, वहीं सुप्रीम कोर्ट ने अपने नवीनतम आदेश में इसके विपरीत रुख अपनाया। सरकार की ‘विशेषज्ञ समिति’ की बात करें तो उसमें अधिकांश सदस्य पर्यावरण विशेषज्ञ न होकर नौकरशाह ही थे। इस मामले को लेकर रुख बदलने में मीडिया के सवालों की अहम भूमिका रही है। मीडिया के माध्यम से ही यह हैरान करने वाली जानकारी भी सामने आई कि नवंबर में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तुरंत बाद सरकार ने दर्जनों खनन पट्टों को त्वरित गति से स्वीकृति प्रदान की। यदि यह सच है तो एक बड़ी विडंबना को ही दर्शाता है कि खनन माफिया पूरे परिदृश्य को किस हद तक प्रभावित करने की स्थिति में पहुंच गया है। सरकार इस मामले में समय से स्पष्टता नहीं दिखा सकी, जिससे उसकी छवि प्रभावित हुई।

यह किसी से छिपा नहीं रह गया है कि राजधानी दिल्ली प्रदूषण के मामले में नए कीर्तिमान बनाती जा रही है, लेकिन पर्यावरण मंत्रालय के पास इस स्थिति को परिवर्तित करने के लिहाज से कुछ उल्लेखनीय नहीं है। बीते साल कुछ दिनों के दौरान एक्यूआइ का आंकड़ा 500 से 1,000 तक पहुंचता दिखा, लेकिन पर्यावरण मंत्रालय ने किसी निदान के बजाय दोषारोपण का सहारा लेने को ही प्राथमिकता दी। कभी पराली को लेकर अंगुली उठाई गई तो कभी आम आदमी पार्टी पर। प्रदूषण से निपटने में किसी कारगर कार्ययोजना के मामले में दिल्ली सरकार भी अकर्मण्य ही नजर आई। इसका ही परिणाम है कि दिल्ली रहने के लिहाज से बेहद खतरनाक शहर बन गया है। लोग असहाय महसूस कर रहे हैं। इससे केंद्र सरकार की छवि को भी नुकसान पहुंच रहा है।

गुजरे हुए साल के अंतिम दिनों में उन्नाव दुष्कर्म मामले में सजायाफ्ता पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को दिल्ली हाई कोर्ट से मिली राहत भी चर्चा के केंद्र में रही। सीबीआइ की ओर से पेश हुए सालिसिटर जनरल ने हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाने की अपील की और सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के फैसले को पलट भी दिया। कुछ वर्ष पूर्व यह मामला सामने आने के बाद सेंगर को भाजपा ने निष्कासित कर दिया था, लेकिन बड़ा सवाल यही है कि ऐसे व्यक्ति को पहले-पहल भाजपा में शामिल ही क्यों किया गया? इस पूरे मामले में कई कानूनी सवाल भी उठते हैं, क्योंकि पीड़िता के पिता की हत्या के मामले में भी सेंगर जेल में बंद है। सेंगर पर सख्ती के मामले में भी मीडिया के रुख की अहम भूमिका रही।

गोवा का नाइट क्लब भी शासन-प्रशासन के स्तर पर घोर लापरवाही का ज्वलंत उदाहरण रहा। क्लब में लगी आग में 25 लोग मारे गए और कई घायल हुए। कई आवश्यक स्वीकृतियों के बिना भी इस क्लब का संचालन हो रहा था। इसका प्रवेश और निकास मार्ग ही इतना संकरा था कि राहत एवं बचाव अभियान में तमाम बाधाएं आईं। क्या यह सब पहले नहीं दिख रहा था? ऐसे में, सवाल उठना स्वाभाविक है कि किसकी कृपा से क्लब को लाइसेंस मिला और वहां जिम्मेदार लोगों ने सुरक्षा प्रबंधों की सुध लेने की जिम्मेदारी क्यों नहीं समझी। इस परिदृश्य को देखते हुए यह कहना आवश्यक है कि प्रधानमंत्री के लिए कुछ कड़े निर्णय लेने का समय आ गया है। उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल की संरचना से लेकर उन लोगों के संबंध में कुछ कड़े निर्णय करने होंगे, जो भाजपा शासित राज्यों में सरकार चला रहे हैं। अन्यथा अप्रिय घटनाएं उनकी छवि पर नकारात्मक असर डालेंगी। ऐसी स्थिति से बचने के लिए उन्हें अविलंब कड़ा रुख अपनाना होगा।

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)