डॉ. लक्ष्मीकांत शर्मा। हाल में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला की परिभाषा के संदर्भ में दिए गए अपने ही फैसले पर रोक लगा दी। उस फैसले में सौ मीटर ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली मानने को मंजूरी दे दी गई थी। इसके परिणामस्वरूप कई छोटी, लेकिन पारिस्थितिकीय रूप से महत्वपूर्ण भू-आकृतियां संरक्षण की कानूनी सुरक्षा से बाहर आ सकती थीं। इस पर पर्यावरणीय विरोध और कानूनी प्रश्न उठे। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसले पर रोक लगाते हुए कहा कि उसे लागू करने से पहले उसकी वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और कानूनी समीक्षा आवश्यक है।

अदालत ने विशेषज्ञ समिति के गठन का प्रस्ताव रखा है, ताकि परिभाषा, खनन नियम, संरक्षित क्षेत्र और पारिस्थितिकीय निरंतरता से जुड़े सभी मुद्दों का विस्तृत अध्ययन हो सके। नवीनतम निर्णय इसका संकेत है कि सुप्रीम कोर्ट स्वयं भी मानता है कि पहले के निर्णय के वैज्ञानिक और पारिस्थितिकीय परिणाम संदेहास्पद हैं। 20 नवंबर, 2025 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली की एकसमान परिभाषा को स्वीकृति देने वाला आदेश एक लंबे समय से प्रशासनिक स्पष्टता के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा था। यह आदेश भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमाला की कानूनी और पारिस्थितिकीय सुरक्षा को कमजोर कर सकता था, खासकर तब, जब वह पहले से ही अभूतपूर्व दबाव में है।

अरावली करीब दो अरब वर्ष पुरानी भू-वैज्ञानिक प्रणाली है, जो भूजल भरण को नियंत्रित करती है, मरुस्थलीकरण को रोकती है, जलवायु को संतुलित करती है और उत्तर-पश्चिम भारत में लाखों लोगों की आजीविका का सहारा है। इसे केवल ऊंचाई आधारित नियम से परिभाषित करना न केवल वैज्ञानिक रूप से गलत था, बल्कि पारिस्थितिकीय रूप से भी खतरनाक था। जिस समिति की रिपोर्ट पर उक्त आदेश आधारित था, वही समिति स्वीकार करती है कि अरावली परिदृश्य में ढलान और ऊंचाई व्यापक रूप से बदलती रहती है। समिति के अनुसार 34 में से 23 अरावली जिलों में औसत ढलान छह डिग्री से कम है, जबकि 12 जिलों में यह तीन डिग्री से भी कम है। रिपोर्ट यह सही निष्कर्ष निकालती थी कि केवल ढाल और ऊंचाई को मानदंड बनाना विसंगति बढ़ाएगा।

इसके बावजूद अंतिम सिफारिश में 100 मीटर के प्रविधान को मान्यता दे दी गई थी। यह वैज्ञानिक तर्क और प्रशासनिक विवेक के मूल सिद्धांतों के विपरीत था। भारतीय भू-आकृतिक परिस्थितियों में 100 मीटर ऊंचाई का नियम मनमाना था। अरावली जिलों में औसत ऊंचाई कुछ क्षेत्रों में 100–200 मीटर से लेकर केवल एक जिले में 600 मीटर से अधिक है। इतनी विविधता में एकसमान सीमा लागू करना, भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण और सर्वे आफ इंडिया के सिद्धांतों के विपरीत है। इसी प्रकार 500 मीटर ‘रेंज कनेक्टिविटी नियम’ भी चिंताजनक था। इसके अनुसार दो या अधिक पहाड़ियां यदि 500 मीटर के भीतर हों तो उन्हें एक अरावली रेंज माना जाएगा। इसका कोई भू-वैज्ञानिक आधार नहीं और न ही भारतीय पर्वत प्रणाली मानचित्रण में कोई उदाहरण। सबसे अधिक चिंता का विषय यह था कि समिति ने अरावली क्षेत्रों में महत्वपूर्ण खनिजों के खनन की अनुमति का प्रविधान सुझाया था। यह सबसे नाजुक कोर क्षेत्रों में खनन के लिए कानूनी दरवाजा खोल देता।

अरावली कम नाजुक नहीं, बल्कि अधिक नाजुक है। अरावली राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात में फैली है। इसकी चट्टानें पुरानी और भंगुर हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अरावली को बार-बार मरुस्थलीकरण के विरुद्ध एक पारिस्थितिकीय ढाल के रूप में मान्यता दी है। कोई भी परिभाषा जो इस सुरक्षा सीमा को कम करे, वह विज्ञान और न्यायिक परंपरा दोनों के विरुद्ध है। अरावली एक प्राचीन भू-वैज्ञानिक, जल-चक्र और पारिस्थितिकीय प्रणाली है, जो उत्तर-पश्चिम भारत में जलस्रोत, मरुस्थलीकरण नियंत्रण और स्थानीय जीवन को बनाए रखती है। अरावली संकट का समाधान अल्पकालिक प्रशासनिक कदमों से नहीं होगा।

इसके लिए स्थायी, विज्ञान-आधारित समाधान आवश्यक हैं। पर्यावरणविद् एक राष्ट्रीय अरावली विकास प्राधिकरण की स्थापना की वकालत करते रहे हैं। पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों जैसे रिज टाप, वनाच्छादित पहाड़ियां और वन्यजीव कारिडोर में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध होना चाहिए, किसी भी प्रकार की सार्वभौमिक छूट के बिना, क्योंकि एक बार यदि अरावली का खनन हो गया तो उसे कभी पुनर्स्थापित नहीं किया जा सकता। अरावली को स्थायी कानूनी मान्यता मिलनी चाहिए, चाहे पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के अंतर्गत पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र के रूप में मिले या फिर भारत की प्राचीन पर्वत विरासत प्रणाली के रूप में एक नई कानूनी श्रेणी बनाकर।

अरावली केवल ऊंचाई से परिभाषित नहीं हो सकती। यह एक भू-वैज्ञानिक, जलवैज्ञानिक और पारिस्थितिकीय प्रणाली है, जो उत्तर-पश्चिम भारत को संभालती है। यदि हम इसकी परिभाषा कमजोर कर देंगे, तो कल इसकी सुरक्षा भी कमजोर हो जाएगी और जब तक हमें इसका नुकसान दिखाई देगा, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णय ने इस बहस को वैज्ञानिक, भू-वैज्ञानिक और पारिस्थितिकीय संदर्भ में आगे ले जाने का अवसर दिया है और इसे प्रशासनिक उत्तरदायित्व और न्यायिक विवेक के साथ पुनर्मूल्यांकन करने का संकेत दिया है।

(लेखक राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्रोफेसर एवं अरावली पर्वतमाला के शोधकर्ता हैं)