अनुरोध ललित जैन। भारत ने अपने पर्यावरणीय संकटों को मापना सीख लिया है। वायु प्रदूषण को एयर क्वालिटी इंडेक्स के जरिये रोजाना आंका जाता है। हीटवेव और बाढ़ सार्वजनिक विमर्श पर हावी रहते हैं, लेकिन जब पीने का पानी जानलेवा बन जाता है, तब प्रतिक्रिया खतरनाक रूप से देर से, सीमित और अल्पकालिक होती है। इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पेयजल से हुई हालिया मौतें कोई अपवाद नहीं हैं, बल्कि एक गहरी प्रशासनिक विफलता का लक्षण हैं।

इंदौर की घटना देश के अलग-अलग हिस्सों में घट चुकी समान त्रासदियों की कड़ी है। गुजरात के महिसागर जिले में हाल में पीलिया का प्रकोप बोरवेल और नगरपालिका जलस्रोतों के दूषित होने से जुड़ा पाया गया। तमिलनाडु के तिरुवल्लूर में प्रदूषित नल जल पीने से लोगों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। ओडिशा के संबलपुर में 2014 के हेपेटाइटिस प्रकोप में लगभग 3,900 से अधिक लोग संक्रमित हुए और लगभग 36 लोगों की मौत हुई थी।

भारत में असुरक्षित पेयजल कोई स्थानीय चूक नहीं, बल्कि बार-बार उभरने वाला संकट है। इस संकट का पैमाना भयावह है। 2005 से 2022 के बीच भारत में तीव्र दस्त, टाइफाइड, वायरल हेपेटाइटिस और हैजा जैसी प्रमुख जलजनित बीमारियों के 20.98 करोड़ से अधिक मामले दर्ज किए गए, जिनमें 50,000 से अधिक मौतें हुईं। इसके अलावा नीति आयोग के कंपोजिट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स के अनुसार हर साल लगभग दो लाख लोग सुरक्षित पेयजल की अपर्याप्त उपलब्धता के कारण अपनी जान गंवाते हैं।

इसके बावजूद जल गुणवत्ता कभी भी उतनी राजनीतिक प्राथमिकता नहीं बन पाती, जितनी अन्य पर्यावरणीय संकेतक बनते हैं। वैश्विक जल गुणवत्ता सूचकांक में भारत 122 देशों में 120वें स्थान पर है। अनुमान है कि देश के लगभग 70 प्रतिशत जलस्रोत दूषित हैं। दूषित पानी से होने वाली बीमारियां काम के दिनों की हानि, बढ़ते चिकित्सा खर्च और श्रम उत्पादकता में गिरावट का दुष्चक्र पैदा करती हैं। जल आपूर्ति एवं स्वच्छता मंत्रालय के अनुसार, इससे 3.77 करोड़ लोग प्रभावित होते हैं और हर साल करीब 7.3 करोड़ कार्यदिवसों का नुकसान होता है।

इन प्रकोपों की जड़ अक्सर जलस्रोत नहीं, बल्कि वह यात्रा होती है, जो पानी स्रोत से नल तक तय करता है। कई शहरों में रिपोर्टें बताती हैं कि सीवर का पानी पेयजल पाइपलाइनों में मिल जाता है। यह शहरी शासन की एक जानी-पहचानी विफलता है। नगरपालिका विभाग अक्सर एक-दूसरे से कटकर काम करते हैं। सड़क निर्माण एजेंसियां बिना जल और सीवरेज विभागों से समन्वय किए खुदाई कर देती हैं।

भूमिगत उपयोगिताओं के सटीक और साझा नक्शों के अभाव में भारी मशीनें पेयजल पाइपों को तोड़ देती हैं और सीवर लाइनों को क्षतिग्रस्त कर देती हैं। इससे सीवर का गंदा पानी जल पाइपों में चला जाता है और समस्या तब सामने आती है, जब तक जनहानि हो चुकी होती है। यह समन्वयहीनता शहरी अवसंरचना कार्यक्रमों के क्रियान्वयन से और गहरी हो जाती है।

कई बार नई पाइपलाइनें बिछा दी जाती हैं, जबकि नीचे मौजूद पुरानी, रिसती और जर्जर नेटवर्क व्यवस्था पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। भारत शहरीकरण को तो बढ़ावा दे रहा है, लेकिन इसमें सुरक्षा प्रोटोकाल, निरंतर निगरानी और संस्थागत जवाबदेही को अनदेखा कर दिया है। जल क्षेत्र की सबसे बड़ी कमी स्वतंत्र नियमन का अभाव है। बिजली क्षेत्र में राज्य विद्युत नियामक आयोग बनाए गए, ताकि सेवा प्रदाय और नियमन को अलग किया जा सके और मानकों का प्रवर्तन हो सके। शहरी जल आपूर्ति में ऐसी कोई समान व्यवस्था नहीं है।

नगरपालिका ही पानी देती है, वही जांच करती है और वही तय करती है कि सब ठीक है या नहीं? यानी संभावित प्रदूषक और नियामक अक्सर एक ही इकाई होते हैं। जब कोई स्वतंत्र नियामक नहीं होता तो न तो नियम सख्ती से लागू होते हैं और न ही गलती पर सजा मिलती है। पानी की जांच के नतीजे जनता से छिपे रहते हैं और प्रदूषण को तब माना जाता है, जब लोग बीमार पड़ने या मरने लगते हैं।

इसलिए सरकार पहले से रोकथाम करने के बजाय हादसे के बाद ही मरम्मत करती है। यह नियामक कमजोरी एक कानूनी शून्य से भी जुड़ी है। जहां भारत ने खाद्य का अधिकार जैसे वैधानिक अधिकार सुनिश्चित किए हैं, वहीं सुरक्षित पेयजल अब भी एक ‘निहित’ अधिकार है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार की न्यायिक व्याख्या से निकला है, न कि स्पष्ट सेवा मानकों वाले किसी प्रवर्तनीय कानून से।

दूषित पेयजल संकट से निपटने के लिए हादसे के बाद तात्कालिक उपाय करना पर्याप्त नहीं है। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है, जो समस्या पैदा होने से पहले ही उसे रोक सके। इसके लिए जमीन के नीचे की पाइपलाइनों का सही नक्शा होना चाहिए, पानी की आपूर्ति करने वालों और उसकी जांच करने वालों को अलग रखा जाना चाहिए और अमृत 2.0 में नल से साफ और सुरक्षित पानी पहुंचाने पर जोर देना होगा।

इंदौर की मौतें कोई चूक नहीं, चेतावनी हैं। भारत ने जिस गंभीरता से हवा की गुणवत्ता मापनी सीखी है, अब उसी गंभीरता से उसे अपने पीने के पानी की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। इसे कल्याणकारी अनुग्रह नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व और बुनियादी आर्थिक आवश्यकता के रूप में देखना होगा।

(लेखक कांग्रेस के अल्पसंख्यक विभाग के उपाध्यक्ष हैं)