तरुण विजय। त्रिपुरा के छात्र एंजेल चकमा की देहरादून में कुछ गुंडों के हमले में मौत की हृदयद्रावक घटना की पूरे देश में तीव्र प्रतिक्रिया हुई है। पूर्वोत्तर के सामाजिक संगठन, नेता इस घटना से काफी रोष में हैं। इस समय मैं त्रिपुरा की राजधानी अगरतला में ही हूं, क्योंकि मुझे एंजेल चकमा के स्वजनों से मिलना है। इस घटना ने कुछ प्रश्न खड़े किए हैं।

कुछ लोग इस घटना पर गिद्ध राजनीति कर दुर्भाग्यपूर्ण शोकांतिका का असम एवं अन्य क्षेत्रों में आसन्न चुनावों के लिए जिस प्रकार उपयोग कर रहे हैं, उससे समाज में विष बढ़ने का भय है। मृतक चकमा समाज का होनहार युवक था। चकमा मूलतः चटगांव निवासी, बौद्ध मतावलंबी एवं शांतिप्रिय लोग हैं। पंडित नेहरू की दुर्नीति के कारण चटगांव को गैर-मुस्लिम, हिंदू, बौद्ध बहुल होते हुए भी पूर्वी पाकिस्तान यानी आज के बांग्लादेश में जाने दिया गया। तब हजारों चकमाओं का नरसंहार हुआ।

उन्हें शरण के लिए भारत आना पड़ा, लेकिन भारत के ईसाई बहुल पूर्वोत्तर राज्यों ने उन्हें अस्वीकार कर दिया। मिजोरम के ईसाई छात्र संगठनों ने 1990 के दशक में चकमाओं के घर जलाए और उन्हें त्रिपुरा सीमा के पार धकेल दिया। तब चकमाओं को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सैकड़ों ट्रक राहत सामग्री भेजी थी। आज जो लोग एंजेल चकमा की हत्या को राजनीतिक रूप दे रहे हैं, उन्होंने कभी चकमाओं की विपत्ति समय में सहायता नहीं की।

चकमा लोग पूरे भारत में मात्र साढ़े पांच लाख हैं और मुख्यतः मिजोरम, असम, मेघालय, अरुणाचल, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल में रह रहे हैं। जहां वे ईसाई बहुल राज्यों में हैं, वहां उनके साथ भेदभाव होता है। उनके क्षेत्रों में सड़कें नहीं, स्कूलों में अध्यापक नहीं हैं। चकमा गांवों के नाम भी बदले गए हैं। इसलिए वे शिक्षा हेतु अपने बच्चे देहरादून, दिल्ली, बेंगलुरु आदि भेजने पर विवश होते हैं।

पूर्वोत्तर भारत का सबसे मनोरम, प्राकृतिक सुषमा से युक्त वीरों और प्रज्ञावान युवाओं का क्षेत्र है, जिसको राममनोहर लोहिया ने यक्ष प्रदेश कहा था। आठ प्रदेशों की पांच हजार किमी सीमाएं चीन, तिब्बत, म्यांमार, बांग्लादेश, भूटान और नेपाल से मिलती हैं। सर्वाधिक संख्या में प्रतिबंधित संगठन पूर्वोत्तर राज्यों में सक्रिय हैं। मोदी शासन आने से पूर्व यहां असम के अलावा अन्य राज्यों में रेल, हवाई अड्डे नामालूम थे। 2024-25 के बजट में पूर्वोत्तर विकास मंत्रालय का बजट 74.4 प्रतिशत बढ़ाया गया। 2014-15 की तुलना में मोदी शासन में पूर्वोत्तर के लिए कुल बजट 179 प्रतिशत बढ़ाया गया।

हवाई अड्डे, राजमार्ग, ईटानगर-दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस, बेहतर शिक्षा एवं खेल सुविधाएं, इन सबका अनंत और असीम विस्तार हुआ है, पर इससे भारत के शत्रु तत्व और बौखला गए हैं। पूर्वोत्तर को भारत से अलग करने की षड्यंत्रकारी योजनाएं ब्रिटिश काल में क्राउन कालोनी के नाम से चलीं। ब्रिटिश काल में ही सादुल्लाह के नेतृत्व में असम की मुस्लिम लीग ने अपील जारी कर युवकों से ज्यादा बच्चे पैदा करने और असम में ज्यादा मुस्लिम भेजने का अभियान चलाया। असम तथा पूर्वोत्तर भारत पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा बने, इसका षड्यंत्र रचा गया।

एंजेल चकमा का परिवार एक देशभक्त और बौद्ध मतावलंबी है। वातावरण के कारण वहां कुछ परिवारों में पश्चिमी नाम रखने का अजीब फैशन है। इसलिए माइकल या एंजेल नाम सुनने में आते हैं। यह समय हर परिस्थिति में पूर्वोत्तर के युवाओं के साथ खड़े होने का है और उन्हें अपनेपन का अहसास कराना राष्ट्रीय कर्तव्य होना चाहिए। पूरे भारत के लिए देशभक्ति की कसौटी बने जांबाज सैनिक, विश्व कीर्तिमान बनाने वाले खिलाड़ी, गायक, विज्ञान और आतिथ्य व्यवसाय के अप्रतिम सितारे पूर्वोत्तर ने दिए हैं।

उनकी श्रेष्ठ, गहरी निष्ठा भारत के तिरंगे के प्रति इतनी है कि वे हमें देशभक्ति का पाठ सिखा सकते हैं, पर उत्तर भारत से कितने लोग पूर्वोत्तर भारत पर्यटन के लिए जाते हैं? कितने यहां के सुंदर स्थानों, महापुरुषों, नदियों और पर्वतों के बारे में सामान्य जानकारी भी रखते हैं? कितने ऐसे हैं, जो यहां के कोई त्योहार बता सकें? कितनों को यहां के कोई दो नाम सही से बोलना आता होगा?
पूर्वोत्तर केवल सामरिक महत्व का विषय नहीं। यहां रक्तबंधु भारतीय हैं। यहां भारत का प्रथम सूर्योदय होता है। यहां की वेशभूषा, त्योहार सबसे सुंदर और अत्यंत मनमोहक हैं।

यहां के छात्र मेधावी भारतीय भविष्य के सर्जक हैं। वे देश के दुश्मनों से लोहा लेने में अपनी जान की बाजी लगा देते हैं। उनकी भाषाएं मधुर संगीत के समान हैं। उन्होंने रानी गाइदिन्ल्यू, यू तीरोट (तीरथ) सिंह, मनीराम दीवान जैसे वीर स्वतंत्रता सेनानी दिए। उन्होंने कारगिल संघर्ष से लेकर प्रत्येक भारत रक्षा अभियान में अपने जीवन की आहुतियां दी हैं। वे चिंकी, मोमो नहीं, भारत माता के मुकुट मणि हैं, जो नूतन भारत निर्माता हैं। उनके प्रति आत्मीयता का भाव जगे, इसके लिए सभी राज्यों के विद्यालयों में पूर्वोत्तर भारत परिचय पाठ्यक्रम होने चाहिए।

जहां कहीं पूर्वोत्तर भारत के छात्र बड़ी संख्या में हैं, वहां पुलिस का पृथक पूर्वोत्तर प्रकोष्ठ बने, जिसमें पूर्वोत्तर से जुड़ा कोई अधिकारी प्रमुख हो एवं पुलिस तथा प्रशासनिक अधिकारियों को पूर्वोत्तर की सम्यक जानकारी देने का अभ्यास वर्ग बने। मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक संस्थान में पूर्वोत्तर भारत पर विशेष पाठ्यक्रम हो एवं नवीन अधिकारियों को दो माह का पूर्वोत्तर भ्रमण कराया जाए। सबसे बड़ी बात अपने परिवारों में माता-पिता बच्चों के साथ पूर्वोत्तर की चर्चा करें और छुट्टियां मलेशिया, सिगापुर या यूरोप में नहीं मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा, मेघालय में मनाने का मन बनाएं।

राष्ट्रीय एकता भाषणों अथवा बजट से नहीं, हृदय की ऊष्मा और पारस्परिक बंधुता के धागों से बुनी जाती है। नस्लीय हमलों की शब्दावली इस एकता वस्त्र को तार-तार करती है। एंजेल चकमा के हत्यारों को शीघ्र कठोर दंड मिले और घृणित मानवता विरोधी अपराधों की पुनरावृत्ति न हो, यही उस होनहार छात्र को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)