[ अमित खरे ]: केंद्र सरकार ने पिछले दिनों ‘सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021’ की घोषणा की। ये नियम समान अवसर प्रदान करने के साथ एक प्रगतिशील संस्थागत तंत्र स्थापित करते हैं, जिसकी आचार संहिता और त्रि-स्तरीय शिकायत निवारण तंत्र का पालन डिजिटल समाचार प्रकाशकों और ओटीटी सामग्री के प्रकाशकों को करना है। ओटीटी प्लेटफॉर्म पांच आयु आधारित श्रेणियों में सामग्री को स्व-वर्गीकृत करेगा। डिजिटल मीडिया पर खबरों के प्रकाशकों को भारतीय प्रेस परिषद की पत्रकारिता नियमावली और केबल टेलीविजन नेटवर्क नियामकीय अधिनियम की कार्यक्रम संहिता का पालन करना होगा, जिससे ऑफलाइन (प्रिंट, टीवी) और डिजिटल मीडिया के बीच समान अवसर उपलब्ध हों। दुख की बात है कि कुछ संशयवादियों ने इन नियमों को सेंसरशिप लागू करने, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने और यहां तक कि उन्हेंं तानाशाही तक करार दिया है।

स्व-वर्गीकरण की अधिक पारदर्शी प्रणाली

पहले ओटीटी प्लेटफॉर्म पर सामग्री के मुद्दे को लेते हैं। वास्तव में स्वतंत्र भारत में पहली बार पांच अलग-अलग आयु समूहों में स्व-वर्गीकरण की अधिक पारदर्शी प्रणाली के लिए पूर्व-प्रमाणीकरण या सेंसरशिप से अलग एक नीति की बात की गई है। अगर हम विभिन्न देशों में ओटीटी वर्गीकरण पर विचार करते हैं तो सिंगापुर में इन्फोकॉम मीडिया डेवलपमेंट अथॉरिटी ब्रॉडकास्टिंग एक्ट, 1994 के तहत स्थापित है, जहां विभिन्न मीडिया के लिए सामान्य मीडिया नियामक निकाय हैं। ओटीटी, वीडियो-ऑन-डिमांड और विशिष्ट सेवाओं के लिए वहां एक मार्च, 2018 से कंटेंट कोड प्रभाव में आया। वहीं ऑस्ट्रेलिया में ऑनलाइन मीडिया को ब्रॉडकास्टिंग सर्विसेज एक्ट, 1992 के माध्यम से विनियमित किया जाता है, जिसमें ऑनलाइन सुरक्षा अधिनियम, 2015 को और जोड़ा गया है। ऑनलाइन सुरक्षा से संबंधित मामलों के लिए ई-सेफ्टी कमिश्नर का कार्यालय नियामक प्राधिकरण होता है।

ओटीटी प्लेटफॉर्म पर सेंसरशिप लगाए जाने का सवाल ही नहीं 

इस प्रकार ओटीटी सामग्री का स्व-वर्गीकरण कई देशों में एक स्वीकृत मानदंड है, किंतु ओटीटी प्लेटफॉर्म पर सेंसरशिप लगाए जाने का कोई सवाल ही नहीं है, बल्कि यह कदम रचनात्मक लोगों को सामग्री के स्व-वर्गीकरण की सुविधा देता है। कुछ ओटीटी प्लेटफॉर्म द्वारा एक और मुद्दा उठाया जा रहा है कि शिकायत निवारण तंत्र में उनकी बहुत कम भूमिका है। एक वेबसाइट ने तो फेक न्यूज भी चला दी कि शिकायत निवारण तंत्र के जजों की नियुक्ति केंद्र सरकार के पैनल से की जाएगी। यह पूर्णतया असत्य है। नए नियम की धारा-12(2) के उप-नियम (1) में निर्दिष्ट स्व-नियामक निकाय की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या मीडिया, प्रसारण, मनोरंजन, बाल अधिकार, मानव अधिकार और ऐसे ही अन्य क्षेत्रों से एक स्वतंत्र एवं विख्यात व्यक्ति करेंगे। अन्य सदस्य, जिनकी कुल संख्या छह से अधिक न हो, मीडिया, प्रसारण, मनोरंजन, बाल अधिकार, मानव अधिकार और ऐसे ही अन्य प्रासंगिक क्षेत्रों के विशेषज्ञ होंगे। स्पष्ट है स्व-विनियमन तंत्र के टियर-1 या टियर-2 में किसी भी सरकारी हस्तक्षेप की बात नहीं। स्व-नियामक निकाय के टियर-2 का गठन खुद ओटीटी प्लेटफॉर्मों द्वारा ही किया जाना है।

ओटीटी प्लेटफॉर्म: तीसरा मुद्दा परामर्श की कमी से संबंधित 

ओटीटी प्लेटफॉर्मों द्वारा उल्लिखित तीसरा मुद्दा उनके साथ परामर्श की कमी से संबंधित है। सूचना एवं प्रसारण मंत्री ने स्वयं दो मार्च, 2020 को दिल्ली में ओटीटी प्लेटफॉर्म के प्रतिनिधियों से मुलाकात की थी। इससे पहले मंत्रालय ने 10 नवंबर, 2019 को मुंबई में और 11 नवंबर, 2019 को चेन्नई में ओटीटी प्लेटफॉर्म के प्रतिनिधियों के साथ विचार-विमर्श किया था। ओटीटी प्लेटफॉर्म लंबे समय से मंत्रालय के साथ विचार-विमर्श कर रहे हैं, लेकिन उन्हेंं यह समझना चाहिए कि परामर्श की भी समय सीमा होती है।

डिजिटल समाचार पोर्टलों के लिए भी पत्रकारिता संहिता का पालन करना जरूरी 

डिजिटल समाचार पोर्टलों के लिए भी पत्रकारिता संहिता का पालन करना जरूरी होगा, जो भारतीय प्रेस परिषद के समान है। उन्हेंं प्रेस काउंसिल एक्ट, 1995 और केबल टेलीविजन नेटवर्क्स रूल्स, 1994 के जर्नलिस्टिक कोड के मानदंडों का पालन करना होगा। उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि प्रतिबंधित सामग्री प्रसारित नहीं होनी चाहिए। यह समझना मुश्किल है कि यह आचार संहिता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कैसे अंकुश लगा सकती है? सरकार से सवाल करने के बजाय सभी डिजिटल न्यूज पोर्टल को आत्मनिरीक्षण करना चाहिए और यह बताना चाहिए कि उन्होंने इतने लंबे समय तक अपना कोड विकसित करने में कोई पहल क्यों नहीं की? डिजिटल न्यूज पोर्टल का एक और दायित्व अपने बारे में जानकारी और शिकायत निवारण तंत्र प्रस्तुत करने से संबंधित है। आश्चर्य है कि कई समाचार पोर्टल आम नागरिकों को अगर कोई शिकायत है तो उन्हेंं ईमेल करने का भी कोई अवसर नहीं देते।

सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 के खंड तीन को लागू करेगा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय

सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 के खंड तीन को लागू करने का अधिकार सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का होगा। इसलिए इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव की जगह सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव का संदर्भ दिया गया है और इस सिलसिले में कोई भी नया प्रविधान नहीं किया गया है। यह प्रविधान आपातस्थिति के लिए किया गया है और 48 घंटे के भीतर इसकी पुष्टि भी करानी होगी। उदाहरण के तौर पर अगर भारत का गलत नक्शा दिखाया गया तो क्या हमें शिकायत दायर किए जाने का इंतजार करना चाहिए या इसे हटाने के लिए तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए? एक दूसरा उदाहरण कुछ दिनों पहले एक राज्य से आया, जहां जिला मजिस्ट्रेट ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर एक न्यूज पोर्टल को नोटिस भेज दिया। वहां भी केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने प्रकाशक/संपादक की शिकायत की प्रतीक्षा किए बिना ही तुरंत राज्य सरकार को सूचित किया कि जिला मजिस्ट्रेट को ये शक्तियां नहीं दी गई हैं और कुछ ही घंटों में जिला मजिस्ट्रेट ने नोटिस वापस ले लिया।

डिजिटल मीडिया के संबंध में लाए गए नए नियमों के खिलाफ अनावश्यक भ्रम

जो लोग डिजिटल मीडिया के संबंध में लाए गए नए नियमों के खिलाफ अनावश्यक भ्रम फैला रहे हैं, उनसे गुजारिश है कि पहले तथ्यों को जान लें। अंधेरे में तीर चलाने से कुछ नहीं होगा। अपने मन के दरवाजे खोल कर उसमें कुछ प्रकाश आने दें। सही चीजें अपने आप दिखने लगेंगी।

( लेखक भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव हैं )

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