[पंकज चतुर्वेदी]। हवा की विशाल मात्रा के तेजी से गोल-गोल घूमने पर उत्पन्न तूफान उष्णकटिबंधीय चक्रीय बवंडर कहलाता है। यह सभी जानते हैं कि पृथ्वी भौगोलिक रूप से दो गोलाद्र्धों में विभाजित है। उत्तरी गोलाद्र्ध में उत्पन्न इस तरह के तूफानों को हरिकेन या टाइफून कहते हैं। इनमें हवा का घूर्णन घड़ी की सुइयों के विपरीत दिशा में एक वृत्ताकार रूप में होता है। जब बहुत तेज हवाओं वाले उग्र आंधी तूफान अपने साथ मूसलाधार वर्षा लाते हैं तो उन्हें हरिकेन कहते हैं। भारत में इन्हें चक्रवात कहा जाता है। इस तरफ हवा का घुमाव घड़ी की सुइयों की दिशा में वृत्ताकार होता है। किसी भी उष्णकटिबंधीय अंधड़ को चक्रवाती तूफान की श्रेणी में तब गिना जाने लगता है जब उसकी गति कम से कम 74 मील प्रति घंटे हो जाती है।

धरती के अपने अक्ष पर घूमने से सीधा जुड़ा है चक्रवाती तूफानों का उठना। भूमध्य रेखा के नजदीक जिन समुद्रों में पानी का तापमान 26 डिग्री सेल्सियस या अधिक होता है, वहां इस तरह के चक्रवातों के उभरने की संभावना होती है। तेज धूप में जब समुद्र के आसपास की हवा गर्म होती है तो वह तेजी से ऊपर की ओर उठती है। बहुत तेज गति से हवा के उठने से नीचे कम दबाव का क्षेत्र विकसित हो जाता है। कम दबाव के क्षेत्र के कारण वहां एक शून्य या खालीपन पैदा हो जाता है। इस खालीपन को भरने के लिए आसपास की ठंडी हवा तेजी से झपटती है। चूंकि पृथ्वी भी अपनी धुरी पर एक लट्टू की तरह गोल घूम रही है सो हवा का रुख पहले तो अंदर की ओर ही मुड़ जाता है और फिर हवा तेजी से खुद घूर्णन करती हुई ऊपर की ओर उठने लगती है। इस तरह हवा की गति तेज होने पर नीचे से ऊपर बहुत तेज गति में हवा भी घूमती हुई एक बड़ा घेरा बना लेती है। यह घेरा 2,000 किमी तक विस्तार पा जाता है। सनद रहे भूमध्य रेखा पर पृथ्वी की घूर्णन गति लगभग 1,038 मील प्रति घंटा है जबकि धु्रवों पर यह शून्य रहती है। इस तरह उठे बवंडर के केंद्र को उसकी आंख कहा जाता है। ऊपर उठती गर्म हवा समुद्र से नमी साथ लेकर उड़ती है। इन पर धूल के कण भी जम जाते हैं और इस तरह संघनित होकर गर्जन मेघ का निर्माण होता है।

जब ये गर्जन मेघ अपना वजन नहीं संभाल पाते हैं तो वे भारी बरसात के रूप में धरती पर गिरते हैं। चक्रवात के केंद्र के इर्द गिर्द 20-30 किमी की गर्जन मेघ की एक दीवार सी खड़ी हो जाती है और इस चक्रवाती केंद्र के गिर्द घूमती हवाओं का वेग 200 किमी प्रति घंटा तक हो जाता है। इस तरह के बवंडर संपत्ति और इंसान को तात्कालिक नुकसान तो पहुंचाते ही हैं, इनका दीर्घकालीन प्रभाव भी पर्यावरण पर पड़ता है। भीषण बरसात के कारण बन गए दलदली क्षेत्र, तेज आंधी से उजड़ गए प्राकृतिक वन और हरियाली, जानवरों का नैसर्गिक पर्यावास समूची प्रकृति के संतुलन को उजाड़ देता है। जिन वनों या पेड़ों को संपूर्ण स्वरूप पाने में दशकों लगे, वे पलक झपकते नेस्तनाबूद हो जाते हैं। तेज हवा के कारण तटीय क्षेत्रों में मीठे पानी में खारे पानी और खेती वाली जमीन पर मिट्टी व दलदल बनने से हुए क्षति को पूरा करना मुश्किल होता है। हम ऐसे तूफानों के पूर्वानुमान से महज जनहानि को ही बचा सकते हैं। तटीय कछुए कैसे यह जान जाते हैं कि आगामी कुछ घंटों में समुद्र में ऊंची लहरें उठेंगी और उन्हें तट की तरफ सुरक्षित स्थान की ओर जाना है, एक शोध का विषय है। फणि तूफान के दौरान ये कछुए तट पर रेत के धोरों में कई घंटे पहले आ कर दुबक गए और तूफान के बाद चले गए।

जलवायु परिवर्तन और चक्रवात
यह तो हुआ चक्रवाती तूफान का असली कारण, लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप में घातक तूफान आने का असल कारण इंसान द्वारा किए जा रहे प्रकृति के अंधाधुंध शोषण से उपजी पर्यावरणीय त्रासदी ‘जलवायु परिवर्तन’ भी है। इस साल के प्रारंभ में ही अमेरिका की अंतरिक्ष शोध संस्था ‘नासा’ ने चेता दिया था कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रकोप से चक्रवाती तूफान और खूंखार होते जाएंगे। जलवायु परिवर्तन के कारण उष्णकटिबंधीय महासागरों का तापमान बढ़ने से सदी के अंत में बारिश के साथ भयंकर बारिश और तूफान आने की दर बढ़ सकती है। यह बात ‘नासा’ के एक अध्ययन में सामने आई है। अमेरिका में ‘नासा’ के जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी के नेतृत्व में यह अध्ययन किया गया। इसमें औसत समुद्री सतह के तापमान और गंभीर तूफानों की शुरुआत के बीच संबंधों को निर्धारित करने के लिए उष्णकटिबंधीय महासागरों के ऊपर अंतरिक्ष एजेंसी के खास उपकरणों द्वारा 15 सालों तक एकत्र आंकड़ों के आकलन से यह बात सामने आई। अध्ययन में पाया गया कि समुद्र की सतह का तापमान लगभग 28 डिग्री सेल्सियस से अधिक होने पर गंभीर तूफान आते हैं। ‘जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स’ के अनुसार समुद्र की सतह के तापमान में वृद्धि के कारण हर एक डिग्री सेल्सियस पर 21 प्रतिशत अधिक तूफान आते हैं।

चेतावनी की चुनौती की डेढ़ सदी
सन 1864 में देश के पूर्वी समुद्री तट पर दो भीषण तूफान आए, कोलकाता में और फिर मछलीपट्टनम में। इसमें अनगिनत लोग मारे गए। उन दिनों कोलकाता देश की राजधानी था। ब्रितानी सरकार ने तत्काल एक कमेटी गठित की ताकि ऐसे तूफानों की पहले से सूचना पाने का कोई तंत्र विकसित किया जा सके। और एक साल के भीतर ही सन 1865 में कोलकाता बंदरगाह ऐसा पहला समुद्र तट बन गया जहां समुद्री बवंडर आने की पूर्व सूचना की प्रणाली स्थापित हुई। सनद रहे भारत में मौसम विभाग की स्थापना 1875 में हुई थी। आजादी के बाद 1969 में भारत सरकार ने साइक्लोन डिस्ट्रेस मिटिगेशन कमेटी का गठन किया ताकि चक्रवाती तूफान की प्राकृतिक आपदा से होने वाले नुकसान हो न्यूनतम किया जा सके। इसके बाद के दौर में भारतीय उपग्रहों के अंतरिक्ष में स्थापित होने और धरती की हर पल की तस्वीरें त्वरित मिलने की शानदार तकनीक के साथ ही अब तूफान पूर्वानुमान बेहद सुगम हो गया है जिसके माध्यम से बड़ी आबादी को बचाने में कामयाबी मिल रही है।

[स्वतंत्र टिप्पणीकार]

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Posted By: Sanjay Pokhriyal

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