अभिषेक कुमार सिंह। Oxygen Cylinder Shortage कोरोना वायरस के प्रकोप की दूसरी लहर के साथ देश में कोविड महामारी का आतंक चारों तरफ छा गया है। एक ही दिन में ढाई-पौने तीन लाख से ज्यादा लोगों के कोरोना संक्रमित हो जाने की खबरों के बीच में देश की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के ढह जाने की सूचनाओं ने जनता ही नहीं, सरकारों तक के पसीने छुड़ा दिए हैं। कहीं जरूरी दवाओं की किल्लत, कालाबाजारी, चोरी तक की खबरें हैं तो कहीं अस्पतालों में रेमडेसिविर के इंजेक्शनों और बिस्तरों की किल्लत के लंबे-चौड़े आंकड़े सामने आ रहे हैं।

अगर हम पिछले एक-डेढ़ साल के अरसे पर नजर दौड़ाएं तो कह सकते हैं कि कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया के साथ-साथ हमारे देश में तब दस्तक दी थी, जब शासन-प्रशासन और जनता में से शायद ही कोई इस चुनौती का सामना करने के लिए तैयार था। एक तरफ इसे लेकर अनभिज्ञता थी कि इस वायरस का मुकाबला कैसे किया जाए। मरीजों को कौन-सी दवा दी जाए ताकि संक्रमण काबू में आ जाए। दूसरी तरफ देश में चिकित्सा संसाधनों की कमी का भी अंदाजा सरकार तक को था। यही वजह थी कि सरकार को बीमारी का मुकाबला करने का सबसे सरल तरीका पूरे देश में संपूर्ण लॉकडाउन लगाना ही सूझा था, भले ही उसके इस फैसले की तमाम लोगों ने आलोचना की। बहरहाल, अभी देश में सबसे बड़ी चिंता अस्पतालों में मरीजों को बिस्तर, वेंटीलेटर और ऑक्सीजन उपलब्ध कराने को लेकर है, क्योंकि पिछले कुछ ही दिनों में देश के हर कोने से अस्पतालों में ऑक्सीजन की सप्लाई में कमी की खबरें आ रही हैं।

असल में पिछले साल से ही कोविड के मरीजों की जान बचाने के सिलसिले में अस्पतालों में उन्हें ऑक्सीजन की आपूíत सुनिश्चित करना सबसे बड़ी चुनौती का काम रहा है। जहां-जहां मरीजों की संख्या में थोड़ा भी इजाफा हुआ है, अस्पतालों में मरीजों को बेड देने के अलावा ऑक्सीजन देने में मुश्किलें सामने आई हैं। दवाओं से इलाज में थोड़ी-बहुत देरी सहन की जा सकती है, लेकिन शरीर में ऑक्सीजन का स्तर घट जाए तो मरीज को वेंटीलेटर पर ले जाकर तुरंत ऑक्सीजन देकर ही जिंदा रख पाना मुमकिन होता है। कुछ मरीज ऐसे भी होते हैं जिन्हें सांस लेने में दिक्कत नहीं होती, मगर उनके शरीर में ऑक्सीजन की कमी चिंताजनक स्तर तक होती है।

कहा जा सकता है कि बीते वर्ष दीपावली से इस साल होली तक की अवधि में कोरोना संक्रमण की कमी के आंकड़ों ने आम लोगों से लेकर सरकार और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े लोगों को इस महामारी को लेकर बेफिक्र कर दिया था। देश के सैकड़ों गांव-कस्बों के अस्पतालों में ऑक्सीजन की आपूíत लगातार चुनौती बनी हुई थी, जिसकी अनदेखी की गई। इसकी सच्चाई यह है कि पिछले ही साल केंद्रीय स्तर पर स्वास्थ्य सचिव, उद्योग और आंतरिक व्यापार विभाग के सचिव, फॉर्मास्यूटिकल्स और राज्यों के स्वास्थ्य सचिवों के बीच ऑक्सीजन की आपूíत सुनिश्चित करने की रणनीति बनाई गई थी। सभी राज्यों को निर्देश भी दिए गए कि ऑक्सीजन आपूíत सुनिश्चित करने के लिए ऑक्सीजन टैंकरों के निर्बाध आवागमन के लिए ग्रीन कॉरिडोर बनाए जाएं। साफ है कि इस बीच कोरोना का संक्रमण जब कुछ थमा, तो सारी तैयारियों और दिशानिर्देशों को ताक पर रख दिया गया। यही वजह है कि जब कोरोना वायरस ने म्यूटेशन करते हुए नया ज्यादा संक्रामक रूप धरा और इसमें लोगों व सरकारी स्तर की लापरवाही कायम हुई, देश में महामारी की दूसरी लहर के रूप में कोरोना का विस्फोट हो गया।

अब कोविड मरीजों को ऑक्सीजन की आपूíत के लिए नौ प्रमुख उद्योगों को छोड़कर औद्योगिक उद्देश्य के लिए ऑक्सीजन सप्लाई प्रतिबंधित करने और ‘ऑक्सीजन एक्सप्रेस’ चलाने जैसे उपायों से हालात काबू में आ जाएंगे, लेकिन तब भी कुछ सवाल बाकी रहेंगे। जैसे आखिर क्यों इस मामले में इंतजामों को कायम करने में हीलाहवाली की गई, जबकि दुनिया के बहुतेरे देशों में कोरोना की दूसरी, तीसरी और चौथी लहरों का प्रकोप प्रत्यक्ष दिख रहा था। इसी तरह संकट यह भी है कि अधिकांश ऑक्सीजन की सप्लाई सरकारी अस्पतालों को की जाती है, मगर उन्हें समय से इसका भुगतान नहीं किया जाता। इस वजह से भी ऑक्सीजन सप्लाई बाधित होती है जिसकी कीमत मरीजों को अपनी जान गंवाकर चुकानी पड़ती है।

कहां से आती है यह प्राणवायु : हमारे देश में चिकित्सा ऑक्सीजन की उपलब्धता बढ़ाना आसान नहीं है। कोरोना काल से पहले सामान्य दिनों में महज 15 फीसद ऑक्सीजन का उत्पादन चिकित्सा क्षेत्र के लिए हो रहा था, जबकि बाकी ऑक्सीजन स्टील व ऑटोमोबाइल के क्षेत्र के लिए बनाई जा रही थी। चिकित्सकीय उद्देश्यों से मांग बढ़ने पर ऑक्सीजन का उत्पादन बढ़ाना आसान नहीं है, क्योंकि इसके लिए काफी ज्यादा पूंजी और उन्नत तकनीक की जरूरत होती है। कोरोना के संक्रमण काल में देश में सैनिटाइजर और मास्क उत्पादन के क्षेत्र में तो नए उद्यमी उतरे हैं, मगर ऑक्सीजन उत्पादन नहीं बढ़ सका है। यह कैसे बढ़े, इसके लिए ऑक्सीजन उत्पादन का गणित समझना होगा। हमारे वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्र तकरीबन 21 प्रतिशत है। लेकिन औद्योगिक और चिकित्सकीय इस्तेमाल के लिए ऑक्सीजन हासिल करना आसान नहीं है। इसे बेहद जटिल विज्ञान प्रक्रियाओं से हासिल किया जाता है। सरल शब्दों में कहें तो दबाव डालकर हवा को तरल बनाया जाता है और फिर तरल हवा के कई घटकों को अलग करते हुए नीले रंग की तरल ऑक्सीजन प्राप्त की जाती है। यह ऑक्सीजन बेहद ठंडी होती है, जिसका तापमान शून्य से 183 डिग्री सेल्सियस नीचे होता है। ऑक्सीजन को द्रव रूप में कायम रखने के लिए इस तापमान को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होता है। भंडारण और आसानी से ढोने के उद्देश्य से गैसों को तरल रूप में ही रखा जाता है।

उत्पादन और ढुलाई की दिक्कतें : कोरोना काल में ऑक्सीजन की मांग और उपलब्धता यानी सप्लाई के अंतर को महाराष्ट्र के उदाहरण से समझा जा सकता है। अनुमान है कि इस राज्य में विभिन्न कंपनियां कुल मिलाकर 1,200 टन ऑक्सीजन प्रतिदिन उत्पादित करती हैं। लेकिन इसके बावजूद राज्य के कई अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी बनी हुई है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि कोरोना की भयावहता को देखते हुए महाराष्ट्र में हर दिन लगभग डेढ़ हजार टन ऑक्सीजन की जरूरत होगी। इस जरूरत को पूरा करना आसान नहीं है, क्योंकि फिलहाल भारत में ऑक्सीजन का उत्पादन करने वाली सिर्फ 500 फैक्टियां हैं, जहां रातोंरात उत्पादन नहीं बढ़ाया जा सकता। इसकी नई फैक्टियां भी तुरंत लगाना संभव नहीं है, क्योंकि ऑक्सीजन पैदा करने की प्रक्रिया काफी जटिल है। इसके बाद समस्या इसकी ढुलाई की भी है। तरल ऑक्सीजन ज्वलनशील होती है, इसलिए टैंकर दुर्घटनाग्रस्त न हो, इसे लेकर काफी सावधानी बरती जाती है। ऑक्सीजन ढोने में खास तरह के क्रायोजेनिक टैंकरों का इस्तेमाल होता है। ऑल इंडिया इंडस्टियल गैस मैन्यूफैक्चर्स एसोसिएशन के आंकड़े बताते हैं कि हमारे देश में फिलहाल ऑक्सीजन ढोने वाले ट्रकों की संख्या डेढ़ हजार के आसपास ही है। फैक्ट्री से अस्पतालों तक ऑक्सीजन को ढोकर लाने और फिर वहां सिलेंडरों को बदलने व भरने की चुनौती इतनी आसान नहीं है कि उसे हर कोई संपन्न करा ले।

कोरोना की दूसरी लहर के बाद अब जिस तरह इसकी तीसरी लहर की आशंका जताई जा रही है, उससे तय है कि देश में मेडिकल ऑक्सीजन की मांग में और इजाफा होगा। इससे देखते हुए हालांकि केंद्र सरकार ने सभी राज्यों के जनस्वास्थ्य केंद्रों में ऑक्सीजन पीएसए प्लांट लगाने को मंजूरी दे दी है, लेकिन यह तो वक्त ही बताएगा कि वे कितने कारगर होंगे। फिलहाल तो दावा है कि पीएसए प्लांट ऑक्सीजन का उत्पादन करते हैं और अस्पतालों को चिकित्सा ऑक्सीजन की अपनी जरूरत के संदर्भ में आत्मनिर्भर बनने में मदद करते हैं। इनसे चिकित्सा ऑक्सीजन की आपूíत को लेकर नेशनल ग्रिड पर बोझ भी घटेगा।

वर्ष 1774 में जब ब्रिटिश साइंटिस्ट जोसेफ प्रिस्टले ने ऑक्सीजन को एक अलग तत्व के रूप में पहचाना और 1895 में कार्ल पॉल गॉटफ्रायड व विलियम हैंपसन ने इसे द्रवीभूत करने का तरीका खोजा तो इसके औद्योगिक और चिकित्सकीय इस्तेमाल का रास्ता खुला। इन विज्ञानियों ने हवा को क्रायोजेनिक डिस्टिलेशन प्रोसेस के जरिये फिल्टर करने और उसमें मौजूद पानी, कार्बन डाइऑक्साइड व हाइड्रोकार्बन को अलग करते हुए उसे भारी दबाव के साथ कंप्रेस व कंडेंस करते हुए द्रव ऑक्सीजन प्राप्त करने की विधि विकसित की। इस प्रक्रिया में उच्च गुणवत्ता वाली ऑक्सीजन के अलावा नाइट्रोजन और ऑर्गन गैसें भी प्राप्त होती हैं।

उल्लेखनीय है कि कंप्रेस की हुई ऑक्सीजन का सबसे पहला औद्योगिक इस्तेमाल 1901 में सामने आया था, जब ऑक्सीजन को एसिटिलीन गैस के साथ जलाते हुए उसे धातुओं की वेल्डिंग और कटाई के काम में लाया गया। बाद में कई विज्ञान संबंधी, वाणिज्यिक और औद्योगिक कार्यो में इस ऑक्सीजन के इस्तेमाल का रास्ता खुला। खास तौर से दूसरे विश्वयुद्ध के बाद तकनीकी तरक्की के चलते हवा से ऑक्सीजन को पृथक कर उसका भारी मात्र में उत्पादन करना संभव होने लगा। आज ऑक्सीजन का प्रयोग धातु खास तौर से स्टील इंडस्ट्री और निर्माण क्षेत्र के अलावा केमिकल, फार्मा, पेट्रोलियम, कार, ग्लास व सेरेमिक तथा पल्प और पेपर मैन्युफैक्चरिंग आदि उद्योगों में काफी ज्यादा मात्र में होता है।

चूंकि चिकित्सा क्षेत्र से ज्यादा इसकी खपत उद्योग जगत में है, इसलिए अस्पतालों में ऑक्सीजन की सप्लाई बढ़ाने का फैसला लेने से पहले हाल में केंद्र सरकार ने उद्योग जगत के प्रतिनिधियों संग बैठक की और उन्हें वक्त की जरूरत को देखते हुए अपनी मांग कम करने के लिए राजी किया। जहां तक चिकित्सा के क्षेत्र में ऑक्सीजन के प्रयोग और जरूरत का सवाल है, तो वहां इसके द्रवित रूप का इस्तेमाल होता है। सर्जरी में, इंटेंसिव केयर ट्रीटमेंट में और श्वसन संबंधी इलाज में 90 से 93 फीसद शुद्ध ऑक्सीजन को प्रयोग में लाया जाता है। यह ऑक्सीजन नॉन-क्रायोजनिक सिलेंडरों में भरी जाती है, ताकि उसे जरूरत के वक्त आसानी से अस्पतालों और घरों में पहुंचाया जा सके।

[एफएसआइ ग्लोबल से संबद्ध]

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