कौशल किशोर। अलकनंदा का रहस्य ऋषिकेश को समङो बगैर पूरा नहीं होता है। अलकनंदा गढ़वाल के पहाड़ों में गंगा की प्रमुख धारा है। अलकापुरी से निकलते ही सहस्त्र धारा में इसके स्नोतों में खूब वृद्धि होती है। बद्रीनाथ पहुंचने से पूर्व केशव प्रयाग में सरस्वती के मिलने से इसको और मजबूती मिलती है। यह मंदाकिनी को रूद्र प्रयाग में उदरस्थ कर भी अपनी पहचान कायम रखती है। मैदानी क्षेत्र में उतरने से पहले ऋषिकेश में भी छोटी-छोटी नदियां गंगा में मिल कर ऋषिकेशी कहलाती हैं।

इनके बारे में चंद्रभागा और रंभा जैसी दूसरी नदियों एवं ऋषि कुंड और सरस्वती कुंड जैसे जल स्नोतों की स्थिति समङो बगैर जरूरी चर्चा संभव नहीं है। एक ऐसे दौर में जब देश का विशाल हिस्सा बाढ़ और तालाबंदी से निकलने के क्रम में भी महामारी के चक्रव्यूह में फंसा है, ऋषिकेश में रंभा के जलग्रहण की भूमि को बार-बार बेचने के मामले में बवाल मचा है। वहीं हरिद्वार में गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिए महीनेभर से जारी अनशन को खनन बंदी के नाम पर विराम दिया जाता है।

रंभा प्रोजेक्ट नमामि गंगे स्कीम की वह योजना है, जो गंगा बेसिन का वर्तमान ही नहीं, बल्कि भूत और भविष्य भी बताने में सक्षम है। भले ही यह कुल ढाई कोस की नदी है, परंतु पुराणों में इसकी महत्ता वíणत है। इस वन क्षेत्रों में अतिक्रमण में हुई बेतहाशा वृद्धि के बावजूद अब तक इसके स्नोत सूखे नहीं हैं। इनसे निकले मीठे पानी की रक्षा में खड़े बेंत के वनों की दशा देख कर तुलसी के मानस की पंक्तियों का स्मरण होता है, फूलहिं फलहिं न बेंत, जदपि सुधा बरसहिं जलद। मूरख हृदय न चेत, जो गुरु मिलहिं बिरंचि सम। रंभा झील और रंभा नदी को रंभा नाला में तब्दील करने का सिलसिला एक अर्से से चल रहा है। इस बीच इसके दोनों तटों पर 25 मीटर की दूरी तक हुए निर्माण कार्यो को ध्वस्त करने का फरमान जिला मजिस्ट्रेट ने जारी किया है। इसकी जद में आने वाले लोगों ने विरोध में आंदोलन शुरू किया। एक बार फिर यह सुíखयों में है।

ऋषिकेश नगर निगम में इस घनी आबादी को शामिल किए बहुत समय नहीं बीता है। यहां करीब पचास हजार मतदाता हैं। इन्हें बसाने में नगर निकाय के नेता 1960 से सक्रिय हैं। जाहिर है कि इसका लाभ उठाने के लिए वोट बैंक के कब्जेदारों में प्रतियोगिता होगी। यहां नेता भीड़ का नेतृत्व करने के बदले अनुसरण करते प्रतीत होते हैं। रंभा को सीवरलाइन में तब्दील करने का एजेंडा दोनों मिल कर ही पूरा कर सकते हैं। गंगा की इस छोटी सहायक नदी के मामले में यह काम निकटवर्ती लाभ के लिए दूरगामी नुकसान का उदाहरण ही माना जाएगा। एक दशक होने को है, सुप्रीम कोर्ट ने जल स्नोतों पर अतिक्रमण के मुद्दे पर मुआवजा वसूल कर वैधता प्रदान करने को नाजायज माना था। फिर सुप्रीम कोर्ट में ऐसे मामलों की बाढ़ आ गई। पिंड छुड़ाने के लिए इनका रुख राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण की ओर मोड़ा गया था। तभी से इनके निपटारे के लिए समितियां गठित की गई हैं।

शायद पहली बार 1952 में हिमालय में बदले चीड़ के जंगलों की खिलाफत गांधीवादी मीरा बेन (मेडलिन स्लेड) ने की थी। बाद में यह हिमालय में वृक्षों की रक्षा के लिए चले चिपको आंदोलन की आधारशिला साबित हुई। उसी दौर में हिंद स्वराज की एक इकाई गढ़ने के लिए उन्होंने ऋषिकेश को चुना। इसी बीच औद्योगिक विकास और नागरिक समाज के नाम पर पूंजीवादी और समाजवादी शक्तियों की उदारता के नायाब नमूने भी निखरते हैं। क्या खूबसूरत मजाक है कि विकासवाद के चार दशक बाद जब बातें पोस्ट डेवलपमेंट की हुईं, तो कोशिशें वैश्वीकरण की। इन बस्तियों में बसी आबादियों ने भूमंडलीकरण के दौर में शिवालिक क्षेत्र की वन भूमि को पक्के निर्माणों की बदौलत कंक्रीट के जंगलों में तब्दील कर दिया।

रंभा के उद्गम क्षेत्र में घूम कर पता चलता है कि बेंत में फूल और फल देने वाली खूबी तो नहीं है, परंतु इसकी दूसरी खूबियां भी कम नहीं हैं। नवजात शिशु के समान जल के स्नोतों की सेवा में बेंत का कोई सानी नहीं है। इजराइल जैसे देशों के लोग ऐसी जीवंत नदी का सपना बिना आंखें बंद किए समेटने के लिए तैयार हैं। लंबे अर्से तक देशवासियों ने इस जैव विविधता को सहेज कर ही कुदरत का हिस्सा होने का दावा किया। आज इसका नियंता होने का दंभ और नष्ट होने की आशंकाओं के बीच का विस्तार प्रकट होता है। ब्रिटेन से यहां भारतीय सभ्यता, संस्कृति और युगपुरुष महात्मा गांधी को जानने-समझने आई मेडलिन इसे नष्ट करने का सपना तक नहीं देख सकीं, लेकिन फिरंगियों की विरासत को आगे बढ़ाने में लगे भारत के ही निवासियों ने इस नदी में सीवर डाल कर सरकार को इसे गंदा नाला घोषित करने को बाध्य किया है। गंगा की इस छोटी सहायक नदी को गंदा नाला में तब्दील करने वाली आधुनिकता से बचने की आवश्यकता है। यह समस्या छोटी-बड़ी नदियों समेत तमाम जलस्नोतों के साथ मुंह बाए खड़ी है। रंभा के जलभराव क्षेत्र को सहेजने में असफल होना, गंगा के स्नोतों का भविष्य स्पष्ट करती है।

अपने देश में नदी-नालों से लेकर तमाम दूसरे जल स्नोतों के संरक्षण का रिवाज है। परंतु आज कुएं व तालाब से लेकर नदियों और सागर तक के सभी जल स्नोतों की मर्यादा के अनुकूल सेवा का पुराना रिवाज अब दम तोड़ रहा है। चमक-दमक और विकास के रोग से पीडित धरती पर मानव सभ्यता के खत्म होने की आशंकाओं को पंख लगेगा।

[स्वतंत्र टिप्पणीकार]

Edited By: Sanjay Pokhriyal

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