[ प्रो. कृपाशंकर चौबे ]: होली का पर्व सदियों से भारत के जन-मन को समान रूप से अनुप्राणित करता चला आ रहा है। कितने उतार-चढ़ाव आए, लेकिन इतिहास के हर कालखंड में यहां तक कि पराधीनता काल में भी भारतीय जन-मन अपने सारे कष्ट बिसार कर होली का दिन मस्ती के साथ बिताता रहा। एक दिन के लिए ही सही, लोग सारी विषमता एवं मतभेद भूलकर गले मिलते हैं, एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाते हैं और अपने सपनों को फिर से रूपायित करने की चेष्टा करते हैं। वे सपने चाहे जितने अल्पजीवी हों, उनमें मस्ती और बेफिक्री होती है। मस्ती और बेफिक्री तब होती है जब व्यक्ति के भीतर कोई कटुता, अनुदारता और घृणा न हो। होली का संदेश ही है कि हम अपने सारे मनोमालिन्य मिटा दें। कहने की जरूरत नहीं कि आज इसी की सबसे ज्यादा जरूरत है। समरस समाज के निर्माण के सबसे अधिक कोई पर्व सहायक बन सकता है तो वह है होली। यह किसी खास तबके का पर्व नहीं, यह सबका पर्व हैैं और इसीलिए इसे लोक पर्व की उचित ही संज्ञा दी जाती है।

अथर्ववेद में कहा गया है, ‘सर्वा आशा मम मित्रं भवंतु।’ यानी हम सब मित्र बनें। इसी आकांक्षा को होली पर्व प्राचीन काल से मूर्त रूप देने की प्रेरणा देता रहा है। होली का पर्व हमें इसका स्मरण कराता है कि भारतीय संस्कृति समस्त ब्रह्मांड के मंगल की कामना करती है। सर्वे भवंतु सुखिन: और वसुधैव कुटुंबकम सिर्फ सूक्तियां नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन के सूत्र हैं। भारतीय संस्कृति उस लोक को सर्वाधिक महत्व देती है जो कोरे मनुष्य नहीं, बल्कि नदी, जल, समुद्र, पहाड़, सारे जीव-जंतु, पेड़-पौधों यानी समूची प्रकृति में दैवी सत्ता का साक्षात्कार करती है। इसीलिए वह उदात्त संस्कृति है।

होली सबसे जुड़ने और सभी के मंगल की कामना का भाव लेकर तो आती ही है, हर तरह के भेद भी मिटाती है। इसी कारण यह पर्व प्राचीन काल से ही साहित्यकारों और कलाकारों को भी अपनी ओर आकृष्ट करता आ रहा है। संस्कृत कवि कालिदास, भारवि, माघ, हिंदी के आदिकालीन कवि चंदबरदाई, विद्यापति, भक्तिकालीन कवि सूर, रहीम, रसखान, जायसी, कबीर, रीतिकालीन कवि बिहारी, केशव, घनानंद, सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया, अमीर खुसरो, बहादुर शाह जफर, नजीर अकबराबादी से लेकर आधुनिक काल के अनेक हिंदी साहित्यकारों ने होली पर रचनाएं लिखी हैं। देख बहारें होली की कविता लिखने वाले नजीर अकबराबादी तो इसे हिंदू-मुसलमान दोनों का साझा पर्व मानते थे।

इसी तरह प्राचीन कला में भी होली मनाते समूहों को चित्रित किया गया है। प्राचीन काल के गांवों के घरों की दीवारों पर औरतों की रंगोली में कला सृजन होता था। गांव के जीवन के साथ लोक कला थी और जीवंत रूप में थी और आज भी है। चित्रकला के दो प्रमुख प्रकार हैं। एक जो प्राचीन काल से गांवों में है। दूसरी आधुनिक कला। प्राचीन काल से चली आ रही लोक कला आम जीवन के अनुभवों और प्रयोजनों के बीच विकसित होती गई है। पारंपरिक और आधुनिक, दोनों कलाओं ने अपने-अपने सामाजिक ढांचे में विकास किया है। पारंपरिक कला ने गांवों में और अकादमिक कला ने शहरों में। भारत के संदर्भ में दोनों सत्य हैं और दोनों ने होली और रंगों को अनेक कोणों से अभिव्यक्त किया है।

प्राचीन काल में कला के बाद जनसंचार का माध्यम गीत, संगीत और नृत्य हुआ करते थे। आदिम समाजों में सामूहिक नृत्य, गीत, संगीत की गतिविधियों से इस संदेश का संचार होता था कि वे आपस में गहरे जुड़े हुए हैं। होली का पर्व भी आपस में जुड़ने की हांक लगाता है। होली के दिन आज भी हर कहीं और खासकर सुदूर गांवों में लोग सारे भेद बिसार कर एकत्र होकर ढोल-मजीरा लेकर घर-घर जाकर समूह में गीत गाते हैं। होली हमें केवल अपने भेद मिटाने को ही नहीं कहती, बल्कि वह अपनी परंपराओं से जुड़ने का भी संदेश देती है। सदियों से होली गीत की नैसर्गिक मुद्रा जस की तस है।

भारत में लोक गीत, लोक संगीत, लोक नृत्य, लोक नाट्य और लोक कथा की बहुत पुरानी परंपरा रही है और सबमें होली के प्रचुर संदर्भ मिलते हैं। सदियों से गांवों में होली के जो लोक गीत गूंज रहे हैं, वे सारी कटुता दूर कर लोक चित्त की मरुआई आश्वस्ति को पुनर्नवा कर देते हैं। शास्त्रीय, उप शास्त्रीय संगीत में भी होली गीतों का सौंदर्य देखते बनता है। होली पर्व की सात्विक मुद्रा और नैसर्गिक शोभा कई फिल्मी गीतों और दृश्यों में भी मुखर है। होली जीवन को उमंग से तो भरती ही है, जीवन के बंधे बंधाए ढर्रे को तोड़ती है।

पौराणिक कथा है कि होली की आग में होलिका का दहन हो गया था और भक्त प्रह्लाद आग से सुरक्षित बच गए थे। यानी होली बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। बाकी पर्वों में धार्मिक कर्मकांड प्रमुखता से होते हैं, खास देवी देवता होते हैं, किंतु होली का धार्मिक क्रिया-कलापों सो कोई सीधा लेना-देना नहीं है। कदाचित इसीलिए दूसरे धर्मों एवं संप्रदायों के लोग इस पर्व से सहजता से जुड़ जाते हैं। होली का पर्व धर्म, संप्रदाय, वर्ग, जाति की जकड़बंदी को तोड़ देता है। ऊंच-नीच के सारे भेद भी मिटा देता है। बाकी त्योहारों में तड़क-भड़क होती है, धन-वैभव की लालसा होती है, किंतु होली में रंग गुलाल न मिले तो जो कुछ मिल जाए वही सही। होली सबका त्योहार है, क्योंकि इसमें धन की बहुत जरूरत नहीं होती। इसीलिए होली का पर्व बाजार के दुष्प्रभाव से बचा हुआ है।

भारत के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग ढंग से होली का पर्व मनाया जाता है, किंतु उन सबमें समरसता और शांतिपूर्ण सह अस्तित्व की ही पुकार होती है। होली का पर्व वसंत ऋतु से भी प्रेरणा लेने की सीख देता है। वसंत ऋतु कोई भेदभाव नहीं करती। सबको मुक्त हस्त से अपना सब कुछ बिखेरती है। मुरझाए पौधों में कोपलें फूटती हैं। वसंत की प्राकृतिक सुषमा का आनंद अमीर और गरीब, दोनों उठाते हैं। वसंत की बहार पर किसका वश? वसंत ऋतु इंसान को प्रकृति की तरह उदार होना भी सिखाती है। वह यह भी सीख देती है कि प्रकृति के सान्निध्य और साहचर्य में ही मनुष्य का मंगल है।

होली का पर्व हमें प्रकृति से, अपनी परंपरा से, मूल से जुड़ने का संदेश देता है। इस संदेश में यह कामना भी अंतरनिहित है कि हम प्रकृति, अपनी परंपरा और विरासत को न छोड़ें। होली को असल भाव में मनाएं-मन से मनाएं और मिलजुलकर मनाएं।

( लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में अधिष्ठाता हैं )

Posted By: Bhupendra Singh

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस