[सुशील कुमार मोदी]। आधुनिक भारत के संभवत: सबसे बड़े कन्सेंसस बिल्डर यानी आम सहमति का निर्माण करने वाले पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में वह काम किया जो सरदार पटेल ने भारत के राजनीतिक एकीकरण के लिए किया था। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि यदि अरुण जेटली न होते तो शायद भारत में GST लागू करना कठिन होता। भारत सरीखे संघीय गणराज्य में GST लागू किया जाना दुनिया के किसी भी अन्य देश से कठिन काम था।

इसका मुझे प्रत्यक्ष अनुभव तब हुआ जब राज्यों के वित्त मंत्रियों की प्राधिकृत समिति का नेतृत्व करते हुए हम लोगों ने यूरोप, कनाडा एवं ऑस्ट्रेलिया में GST के अमल की व्यवस्था देखी। कनाडा को छोड़कर सभी देशों में केंद्र सरकार GST संग्रह करती है और उसे केंद्र और राज्य के बीच वितरित करती है, परंतु भारत की संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत केंद्र और राज्यों, दोनों को GST संग्रह करने का अधिकार दिया गया।

अरुण जेटली में थे अनेकों गुण
इस कारण यहां दोहरा GST लागू करना और कठिन काम था। भारत जैसे विविधता वाले देश में GST लागू करने के लिए दूरदृष्टि, अथक परिश्रम, विषयवस्तु पर गहरी पकड़ और सभी पक्षों को एक साथ लेकर चलने की क्षमता आवश्यक थी। संयोग से ये सभी गुण अरुण जी में भरे पड़े थे।

अरुण जेटली के वित्त मंत्री बनने से पहले GST की चर्चा लगभग एक दशक से चल रही थी, परंतु इसमें कोई विशेष प्रगति इसलिए नहीं दिख रही थी, क्योंकि राज्यों को केंद्र सरकार पर भरोसा ही नहीं हो पा रहा था। केंद्रीय बिक्री कर की दर घटाए जाने के कारण राज्यों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए केंद्रीय बजट में घोषणा भी की गई, परंतु केंद्र के आश्वासन के बावजूद क्षतिपूर्ति किसी को नहीं मिली। केंद्र के इस रवैये से सभी राज्य सशंकित थे कि GST अमल से होने वाली क्षति की भरपाई होगी भी या नहीं?

वित्त मंत्री का प्रभार लेने के बाद अरुण जेटली ने सर्वप्रथम पूर्व सरकार द्वारा दिए गए आश्वासन को पूरा किया एवं राज्यों को इस मामले में क्षतिपूर्ति प्रदान की। इस एक कदम से राज्यों का भरोसा बढ़ा। इससे GST पर चर्चा का सिलसिला आगे बढ़ाना आसान हुआ।

संविधान संशोधन का रखा प्रारूप 
अरुण जी ने संविधान संशोधन का जो प्रारूप रखा उसमें राज्यों को GST के कारण हुई क्षति को पांच वर्षों तक 14 प्रतिशत की निश्चित वृद्धि से पूरा किए जाने का प्रस्ताव शामिल किया। इस निर्णय ने GST के प्रति राज्यों की प्रमुख चिंता का निवारण कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि राज्य GST पर सार्थक चर्चा करने में दिलचस्पी लेने लगे। केंद्र और राज्यों के बीच कुछ अहम मुद्दों पर असहमति के कारण 2014 तक कोई विशेष प्रगति नहीं हो पाई थी। 

राज्यों की चिंता से सीधे जुड़े हुए मुद्दे जैसे-प्रवेश कर और पेट्रो उत्पादों को GST में समाहित करने को लेकर अरुण जी ने दिसंबर 2014 में राज्यों के वित्त मंत्रियों के एक समूह से अलग से बैठक करते हुए इन मुद्दों को सुलझाया और नए संविधान संशोधन विधेयक का खाका तैयार किया।

सर्वसम्मति से पारित हुआ संशोधन विधेयक  
इस नए प्रारूप पर सभी की आम सहमति हासिल करने के लिए उन्होंने राज्यों के वित्त मंत्रियों की प्राधिकृत समिति की बैठक में भाग लिया और लंबे विचार-विमर्श के बाद उस पर आम सहमति बनाने में सफल हुए। इसी कारण नया संविधान संशोधन विधेयक संसद में सर्वसम्मति से पारित हुआ एवं राज्यों ने भी इसका समर्थन किया। GST लागू करने के लिए यह पहला आवश्यक, निर्णायक एवं महत्वपूर्ण कदम था, जिसके फलस्वरूप GST परिषद का गठन हो सका। 

परिषद की शुरुआती बैठकों में व्यवसायियों पर केंद्र एवं राज्यों के दोहरे नियंत्रण और GST के अधीन कर दरों के बारे में व्यापक चर्चा के बाद ही ऐसी व्यवस्था का निर्माण अरुण जी के नेतृत्व में संभव हो सका जो सबको स्वीकार्य हो। इन चर्चाओं में उन्होंने बड़े-से-बड़े एवं छोटे- से-छोटे राज्य की हर बात को ध्यान से सुना, सभी से राय ली और GST परिषद द्वारा निर्णय लिए जाने की प्रक्रिया को अंजाम दिया। परिषद की बैठक के पूर्व केंद्र एवं सभी राज्यों के अधिकारियों की बैठक की व्यवस्था भी उनके द्वारा बनाई गई। इन बैठकों से छन कर विचार परिषद में आते थे, जिससे परिषद द्वारा निर्णय लिए जाने में काफी आसानी होती थी। इसी के साथ ज्यादा-से-ज्यादा मुद्दों पर चर्चा और निर्णय भी संभव हो पाता था।

जेटली की बैठक में हर पहलुओं पर होती थी चर्चा
कुछ विवादित मामलों में आमतौर पर अरुण जी मंत्री समूह बना देते थे, जिसमें हर विचारधारा के मंत्री शामिल होते थे। इस प्रकार के एक दर्जन से अधिक समूह बने थे और उनकी बैठकों में विवाद के सभी पहलुओं पर सांगोपांग विचार-विमर्श होता था। इससे एक मान्य निष्कर्ष भी निकल आता था जिसे परिषद द्वारा बहुधा स्वीकार कर लिया जाता था।

इसके अलावा अरुण जी कई बार विवादित मामलों को अगली बैठक तक के लिए स्थगित करवा देते थे और राज्यों को नए सिरे से उन मामलों पर विचार करने का आग्रह किया करते थे। लॉटरी पर दोहरी कर दर की व्यवस्था, सरकार को प्रदान की गई सेवाओं, रेस्टोरेंट, ब्रांडेड खाद्य पदार्थों पर टैक्स की दरों के साथ टीसीएस/टीडीएस, ई-वे बिल जैसे जटिल मुद्दों को अरुण जी ने आसानी से सुलझा दिया, जबकि इसकी उम्मीद कम ही दिखती थी। इन सभी मामलों में उनकी सूझ-बूझ, मामले की समग्र समझ, उनके विधि के ज्ञान, सबको साथ लेकर चलने की उनकी प्रवृत्ति और दृढ़ इच्छाशक्ति कारगर सिद्ध हुई।

GST के विचार को वास्तविकता में बदला  
मैं बिना किसी हिचकिचाहट से यह कह सकता हूं कि वह अरुण जेटली ही थे जिन्होंने GST के विचार को वास्तविकता में बदला एवं उसे जमीन पर उतारा। यह कार्य उस दौर में और भी कठिन था जब GST परिषद में भाजपा शासित राज्यों की संख्या अपेक्षाकृत कम थी।

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सभी दलों को विश्वास में लिया
केंद्र सरकार, 29 राज्यों और सात केंद्रशासित प्रदेशों के मिले- जुले स्वरूप में गठित GST परिषद में किसी मुद्दे पर मत विभाजन नहीं हुआ तो यह केवल और केवल अरुण जी की सबको साथ लेकर चलने की प्रवृत्ति के कारण संभव हो पाया। अरुण जी ने कांग्रेस, माकपा से लेकर तृणमूल तक के वित्त मंत्रियों का विश्वास हासिल किया। इसी का परिणाम था कि असंभव सा दिखने वाले GST को उन्होंने क्रियान्वित कर दिखाया।


(लेखक बिहार के उपमुख्यमंत्री हैं)

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Posted By: Dhyanendra Singh

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