[अरुण श्रीवास्तव]। अगस्त का महीना समूचे देशवासियों के लिए स्तब्धकारी रहा। सबसे ज्यादा भाजपा के लिए। पिछले साल इसी माह जहां भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी ने लंबी बीमारी के बाद हमेशा के लिए आंखें मूंद ली थीं, वहीं इस साल हर किसी के प्रिय दो राजनेताओं का असमय चले जाना किसी सदमे से कम नहीं रहा। इस महीने पहले सुषमा स्वराज और फिर अपने स्वभाव से सबको अपना मुरीद बना लेने वाले अरुण जेटली के जाने से ऐसा शून्य पैदा हो गया है, जिसे भर पाना मुश्किल है।

संसद हो या संसद से बाहर, अरुण जेटली की तार्किकता और आत्मविश्वास से भरी आवाज हमेशा उनकी याद दिलाती रहेगी। भाजपा के लिए तो वह हमेशा संकटमोचक की भूमिका में ही रहे, चाहे संसद के भीतर हो या बाहर। यही कारण है कि विदेश यात्रा के दौरान बहरीन से अपने संबोधन में भाव विह्वल प्रधानमंत्री ने इसे अपने सबसे खास दोस्त से बिछुड जाना कहा। ऐसे सर्वस्वीकार्य राजनेता के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके व्यक्तित्व और विचारों से सबक लेकर उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें।

संसद के केंद्रीय कक्ष में अगर कहीं भीड़ लगी है, तो जरूर वहां अरुण जेटली ही होंगे। सपा के वरिष्ठ नेता प्रो. रामगोपाल यादव सहित तमाम राजनेताओं और पत्रकारों की अरुण जेटली के बारे में यही राय थी। दरअसल, भीड़ के बीच उनके होने का मतलब यही होता था कि वे सांसदों को कुछ समझा या बता रहे हैं।

उनके गहन ज्ञान और तार्किकता का हर कोई कायल था। एक सफल वकील और राजनीति के माहिर रणनीतिकार होने के बावजूद उन्हें पद और पैसे का कोई लोभ नहीं था। बेशक एक राजनीतिक पार्टी से जुड़ा होने के कारण एक विचारधारा के प्रति उनकी गहरी निष्ठा थी, लेकिन राजनीति से परे वह 'यारों के यार' थे। जहां उनका किसी से कोई वैर नहीं था। सभी अपने और प्रिय थे। ऐसे स्वभाव के कारण उनके असमय जाने पर हर कोई मन ही मन जार जार रोया।

नि:स्वार्थ कर्मठता: उनकी सबसे बड़ी खूबी उनकी नि:स्वार्थ कर्मठता को माना जा सकता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण इस साल तब देखने को मिला, जब दूसरी बार भाजपा की अगुवाई वाली राजग सरकार बनने पर पहले ही उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर खुद को इससे अलग रखने की मंशा जता दी। बेशक ऐसा उन्होंने अपने स्वास्थ्य को देखते हुए किया था, लेकिन यह कोई पहली बार नहीं था। 2014 में 'मोदी हैं तो मुमकिन है' का नारा गढ़कर नरेंद्र मोदी के लिए देशभर में माहौल बनाने की रणनीति रचने वाले अरुण जेटली ने खुद अपने लिए कभी किसी पद की इच्छा नहीं जताई।

अस्वस्थ होने के बावजूद उन्हें जब-जब मौका मिला, ब्लॉग और ट्वीट के जरिए उन्होंने एनडीए सरकार और उसके फैसलों के पक्ष में अपनी बात रखना जारी रखा था, चाहे वह तीन तलाक का मामला हो या फिर जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए हटाने का। यह सीख हर किसी के लिए है कि अगर हम अपना काम पूरी ईमानदारी, कर्मठता और नि:स्वार्थ भावना से करते हैं, तो देर-सबेर पहचान जरूर मिलेगी।सौम्यता-मृदुभाषिता: उनकी सौम्यता और मृदुभाषिता का भी हर कोई कायल रहा। यही कारण है कि वैचारिक मतभेद होने के बावजूद शायद ही कोई उनके प्रति शत्रुता का भाव रखता होगा।

इसका उदाहरण तब देखने को मिला, जब दिल्ली की कैलाश कॉलानी और बाद में पार्टी के मुख्यालय में उनके अंतिम दर्शन के लिए खास और आम का तांता लगा रहा। दोपहर बाद जब निगम बोध घाट पर उनके अंतिम संस्कार की तैयारियां चल रही थीं, तब जोरदार बारिश में भीगते हुए भी लोग डटे रहे। यह दृश्य पूरा देश टीवी पर देख रहा था। कैसे कोई व्यक्ति अपने व्यवहार, अपने स्वभाव और अपना बना लेने के स्वाभाविक हुनर से हर किसी का अजीज हो जाता है, अरुण जेटली इसके बड़े उदाहरण थे।

समझदारी-तार्किकता: बेशक उनके चेहरे पर हर वक्त मुस्कराहट रहती थी और वे सबसे हंसकर मिलते थे, लेकिन शायद ही कभी उन्होंने हल्की बात कही होगी। नोटबंदी, जीएसटी और राफेल विमान सौदे पर जब सरकार विपक्ष के हमलों से चौतरफा घिरी थी, तब एकमात्र अरुण जेटली ही थे, जिन्होंने अपने अकाट्य तर्को से एक-एक करके सभी को निरुत्तर करते हुए सरकार और खासकर प्रधानमंत्री मोदी तक का बचाव किया।

इतना ही नहीं, पार्टी के सांसदों, नेताओं, प्रवक्ताओं को भी वे लगातार यह सिखाते-बताते रहे कि किस तरह धैर्य और तार्किकता के साथ उन्हें अपनी बात मीडिया मंचों और जनता के बीच रखनी है। इससे सरकार को देशभर में अपने पक्ष में माहौल बनाने में काफी मदद मिली। इसका नतीजा तात्कालिक ऊपरी संशय के बावजूद लोकसभा चुनावों में भाजपा की ऐतिहासिक जीत के रूप में दिखाई दिया। सर्वस्वीकार्यता: भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी ने सर्वस्वीकार्यता की जो राह दिखाई थी, सुषमा स्वराज जी और अरुण जेटली जी उसके सबसे बड़े अनुयायी साबित हुए।

एक पार्टी का वरिष्ठ कार्यकर्ता होने के कारण वैचारिक स्तर पर दूसरी पार्टी के लोगों से उनकी चाहे जितनी गर्मागर्म बहस होती रही हो, लेकिन एक व्यक्ति के रूप में उनका किसी से कोई द्वेष नहीं रहा। यही कारण है कि कैलाश कॉलोनी में उनके अंतिम दर्शन के वक्त सोनिया गांधी, राहुल गांधी, गुलाम नबी आजाद, रामगोपाल यादव जैसे लगभग हर दल के नेता दिखे।

इंसानियत के पैरोकार: यह बहुत कम लोग जानते होंगे कि अरुण जेटली एक इंसान के रूप में हर किसी के कितने बड़े मददगार थे। इसका एक नमूना यह है कि उनके निजी स्टाफ के कई कर्मचारियों के बच्चों के पढ़ने की व्यवस्था उन्होंने देश और विदेश में वहीं की, जहां उनके बेटे रोहन ने पढ़ाई की थी।

उन्हें याद करते हुए उनसे जुड़े तमाम लोगों ने कहा कि वे खाने-खिलाने के बड़े शौकीन थे। इसके चलते उन्हें पुरानी दिल्ली के तमाम दुकानदार और ठेले वाले भी जानते थे और कुछ खास बनाने पर उनके लिए भिजवाते थे। भाजपा के संस्थापकों में से एक और वयोवृद्ध राजनेता लालकृष्ण आडवाणी तक ने उन्हें याद करते हुए कहा कि वे जब भी मिलते थे, कहीं न कहीं के खाने की चर्चा जरूर करते थे।

जरूरत लंबी पारी की: अरुण जेटली ऐसे राजनेता थे, जिनसे देश को लंबी पारी की उम्मीद थी। क्योंकि उनके जैसे एक कर्मठ राजनेता का 66 साल की उम्र में चला जाना असमय ही कहा जाएगा, जिससे देश को लंबे मार्गदर्शन-नेतृत्व की अपेक्षा की जा रही थी। हालांकि इसके लिए कुछ लोग उनके खानपान और जीवनशैली में लापरवाही बरतने की बात भी कहते हैं, पर हर किसी को पता है कि वे जब तक स्वस्थ रहे, पूरी तरह अपने काम के प्रति समर्पित रहे।

ऐसे नेताओं का कम उम्र में चला जाना चिंताजनक भी है। संभवत: स्वास्थ्य कारणों से ही कुछ समय पहले प्रधानमंत्री मोदी जी ने अपने सांसदों की एक कार्यशाला में उनसे अपने स्वास्थ्य और फिटनेस का भरपूर ध्यान रखने का आह्वान किया था। उम्मीद की जानी चाहिए कि राजनेता और देश के नागरिक भी समाज और देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को देखते-समझते हुए खुद की सेहत के प्रति सजग रहने का हरसंभव जतन करेंगे।

Posted By: Neel Rajput

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