संपादकीय: पेयजल की गुणवत्ता पर उठते रहे हैं सवाल, इंदौर जैसी घटना न होने तक सोता है प्रशासन
इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से 16 लोगों की मौत और सैकड़ों के बीमार होने से प्रशासन की लापरवाही उजागर हुई है। यह घटना दर्शाती है कि देश के कई हिस्सों में पेयजल की गुणवत्ता खराब है, जिस पर अधिकारी और सरकारें तब तक ध्यान नहीं देतीं जब तक कोई बड़ी त्रासदी न हो जाए। अनियोजित कॉलोनियों में सीवर और पानी की लाइनों के कुप्रबंधन से यह समस्या और गंभीर हो जाती है। सरकारों को इस घटना से सबक लेना चाहिए।
HighLights
इंदौर में दूषित पानी से 16 लोगों की जान गई।
प्रशासन की लापरवाही से पेयजल गुणवत्ता पर सवाल उठे।
अनियोजित कॉलोनियों में बुनियादी सुविधाओं की अनदेखी।
इंदौर के बाद बेंगलुरु और गांधीनगर में भी दूषित पेयजल की आपूर्ति की खबरों से कोई आश्चर्य नहीं। वास्तव में अपने देश में अधिकांश इलाकों में पेयजल की गुणवत्ता ठीक नहीं। ऐसा कई शोध-सर्वेक्षणों में भी सामने आता रहता है, लेकिन नगर निगमों के अधिकारी-कर्मचारी और राज्य सरकारें इस समस्या पर तब तक नहीं चेततीं, जब तक कि वैसी कोई घटना नहीं घट जाती जैसी इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में हुई और जहां 16 लोगों की जान चली गई एवं सैकड़ों लोग गंभीर रूप से बीमार हो गए।
इतनी बड़ी त्रासदी के बाद पहले दो अधिकारियों को निलंबित किया गया था। फिर जब मरने वालों की संख्या बढ़ी तो कुछ अन्य शीर्ष अधिकारियों पर भी गाज गिरी, लेकिन कुल मिलाकर मामला निलंबन तक ही सीमित रहा। इसे कोई ऐसी कार्रवाई नहीं कहा जा सकता, जो नजीर बन सके। सबसे स्वच्छ शहर का दर्जा रखने वाले इंदौर की घटना यह भी बताती है कि सरकारी तंत्र मूलभूत बुनियादी सुविधाओं की गुणवत्ता की किस तरह अनदेखी करता है।
इस अनदेखी में पार्षद से लेकर विधायक, सांसद और मंत्री तक भी शामिल रहते हैं। जिस तरह नगर निकायों के अधिकारी बिजली, पानी, सफाई से जुड़ी सुविधाओं का स्तर सुधारने को प्राथमिकता नहीं देते, उसी तरह नगर निकायों के संबंधित कर्मचारी और अधिकारी भी।
इससे दुर्भाग्यपूर्ण और कुछ नहीं हो सकता कि पानी जैसी बुनियादी आवश्यकता की गुणवत्ता पर भी ध्यान नहीं दिया जा रहा है। पेयजल की गुणवत्ता में सुधार इसलिए नहीं हो पाता, क्योंकि उसकी जांच-परख का काम ईमानदारी से नहीं होता। इसका दुष्परिणाम केवल यह नहीं है कि अपने देश में करोड़ों लोग दूषित पानी पीने को विवश हैं, बल्कि यह भी है कि बहुत से लोगों को खरीद कर पानी पीना पड़ता है अथवा पानी को स्वच्छ करने के लिए किस्म-किस्म के उपकरणों का सहारा लेना पड़ता है।
शहरी इलाकों में दूषित पेयजल की आपूर्ति का एक बड़ा कारण यह है कि अनियोजित कालोनियों को रह-रहकर नियमित तो किया जाता रहता है, लेकिन उनमें नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराने पर ध्यान नहीं दिया जाता। जनप्रतनिधियों की निगाह केवल लोगों के वोट हासिल करने पर होती है। इंदौर का भागीरथपुरा इलाका एक अनियोजित कालोनी ही है।
वोट बैंक की राजनीति के चलते इस अनियोजित कॉलोनी को नियोजित तो कर दिया गया, लेकिन इसकी परवाह नहीं की गई कि यहां सीवर लाइन और पाइपलाइन बिछाने का काम सही ढंग से कैसे होगा? यदि इस पर तनिक भी ध्यान दिया गया होता तो सीवेज को पेयजल वाली पाइपलाइन में मिलने से रोका जा सकता था। अच्छा यह होगा कि इंदौर की घटना से मध्य प्रदेश सरकार ही नहीं, देश भर की सरकारें सबक सीखें।













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