डॉ. अभिषेक श्रीवास्तव। आज अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था कमजोर होती जा रही है। कई देश खुले तौर पर अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय कानून सभी देशों पर समान रूप से लागू नहीं हो रहे। देश अब अपने हितों के लिए अकेले फैसले ले रहे हैं। दुनिया में युद्ध और हिंसा बढ़ गई है। जो देश नियम आधारित विश्व व्यवस्था की दुहाई देते थे आज वे ही वैश्विक व्यवस्था के लिए संकट बनते जा रहे हैं।

नियम आधारित विश्व व्यवस्था का मूल उद्देश्य संप्रभुता का सम्मान, क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा, विवादों का शांतिपूर्ण समाधान और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन जैसी प्रमुख बातें थीं। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं-संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय, विश्व व्यापार संगठन और बहुपक्षीय संधियां इसी व्यवस्था का मजबूत स्तंभ थीं, परंतु आज स्थिति यह है कि नियमों का पालन केवल तब किया जाता है, जब वे शक्तिशाली देशों के हितों के अनुकूल हों।

जहां हित टकराते हैं, वहां नियमों की व्याख्या बदल जाती है या उन्हें अनदेखा कर दिया जाता है। वेनेजुएला और ईरान की घटनाएं दर्शाती हैं कि किस प्रकार आर्थिक प्रतिबंध तथा बाहरी शक्तियों का खुला हस्तक्षेप आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक घातक हथियार बन चुका है।

वेनेजुएला के मामले में आंतरिक राजनीतिक संकट और लोकतंत्र की दुहाई देते हुए बाहरी शक्तियों ने न केवल खुला राजनीतिक हस्तक्षेप किया है, बल्कि सत्ता परिवर्तन को प्रोत्साहित करने की नीति भी अपनाई। सरकार की वैधता को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चुनौती दी गई, समानांतर सत्ता संरचनाओं को मान्यता दी गई और तेल, वित्तीय लेन-देन तथा विदेशी निवेश पर कठोर प्रतिबंध लगाए गए।

इसी प्रकार ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय कानून में समानता और निष्पक्षता के सिद्धांत पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। ईरान एनपीटी का हस्ताक्षरकर्ता है और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आइएईए) की निगरानी व्यवस्था को स्वीकार करता रहा है। इसके बावजूद उस पर लगाए गए एकतरफा और बहुपक्षीय प्रतिबंधों की तीव्रता यह दर्शाती है कि नियमों की व्याख्या राजनीतिक हितों के अनुसार की जाती है। इन प्रतिबंधों का प्रत्यक्ष प्रभाव वेनेजुएला तथा ईरान की पहले से कमजोर होती अर्थव्यवस्था पर पड़ा।

तेल निर्यात पर निर्भर देश की विदेशी मुद्रा आय में भारी गिरावट आई, मुद्रास्फीति बेकाबू हो गई और बुनियादी वस्तुओं की कमी हो गई। स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा गईं, कुपोषण बढ़ा और लाखों नागरिक बेहतर जीवन की तलाश में देश छोड़ने को विवश हुए। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि नियम आधारित विश्व व्यवस्था की मूल भावना-समानता, न्याय और संप्रभुता का सम्मान खोती जा रही है। विश्व तेजी से एक बहुध्रुवीय संरचना की ओर बढ़ रहा है, क्षेत्रीय शक्तियां अधिक मुखर हो रही हैं।

ऐसे समय में भारत एक संतुलनकारी भूमिका निभा सकता है, जो रणनीतिक स्वायत्तता, संवाद और बहुपक्षीयता में विश्वास रखता है। पिछले एक दशक में भारत ने अपनी विदेश नीति को नागरिक-केंद्रित और मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित किया है। वैश्विक संघर्षों और ध्रुवीकृत अंतरराष्ट्रीय राजनीति के बीच भारत ने किसी एक पक्ष में कठोरता से खड़े होने के बजाय संघर्षरत सभी पक्षों से संवाद बनाए रखने की नीति अपनाई है।

इस संतुलित दृष्टिकोण ने न केवल भारत को एक विश्वसनीय और उत्तरदायी वैश्विक भागीदार के रूप में स्थापित किया है, बल्कि यह भी दिखाया है कि विदेश नीति का अंतिम उद्देश्य शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि मानव जीवन और गरिमा की रक्षा होना चाहिए। भारत ने संकटग्रस्त क्षेत्रों, आपदाग्रस्त देशों को मानवीय सहायता तथा खाद्य, स्वास्थ्य और ऊर्जा सुरक्षा जैसे मूलभूत विषयों को प्राथमिकता देकर यह स्पष्ट किया है कि भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से ऊपर नागरिकों की आवश्यकताएं हैं।

इस दृष्टिकोण के माध्यम से भारत ने केवल अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा ही नहीं की, बल्कि विकासशील देशों और वैश्विक दक्षिण की उन चिंताओं को भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मुखरता से उठाया, जिन्हें लंबे समय तक नजरअंदाज किया जाता रहा। भारत ने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की संरचनात्मक सीमाओं और प्रतिनिधित्व की कमी की ओर भी लगातार ध्यान आकर्षित किया है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग इस विश्वास पर आधारित है कि जब तक निर्णय-निर्माण प्रक्रियाएं अधिक समावेशी और न्यायसंगत नहीं होंगी, तब तक वैश्विक शांति और स्थिरता एक अधूरा लक्ष्य बनी रहेगी।

आज जब वैश्विक राजनीति टकराव, प्रतिबंधों और सैन्य शक्ति के इर्द-गिर्द सिमटती जा रही है, तब संघर्षों के शांतिपूर्ण समाधान पर जोर देना और संवाद को प्राथमिक साधन मानना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है। नागरिकों की सुरक्षा, मानवीय गरिमा और विकासात्मक आवश्यकताओं को भू-राजनीतिक हितों से ऊपर रखना ही एक स्थायी और न्यायपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की आधारशिला हो सकता है। भारत की विदेश नीति इसी दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करती है-जहां शक्ति के बजाय विश्वास और प्रभुत्व के बजाय सहयोग को वैश्विक राजनीति का मार्गदर्शक सिद्धांत माना जाता है।

(लेखक जेएनयू के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)