प्रवीण कौशल। पांच साल पहले स्टारलिंक के तत्कालीन भारत प्रमुख ने एलान किया था कि 2022 के अंत तक देश में 2,00,000 टर्मिनल चालू कर दिए जाएंगे, जिनमें से ज़्यादातर गांवों में होंगे। कंपनी ने करीब 5,000 भारतीयों से प्री-आर्डर भी ले लिए, जबकि उसके पास लाइसेंस नहीं था।

दूरसंचार विभाग ने उसे रुकने और पैसा लौटाने को कहा और कुछ ही समय बाद भारत प्रमुख ने पद छोड़ दिया। हाल में इंडिया मोबाइल कांग्रेस में स्पेसएक्स की एक वाइस प्रेसिडेंट ने कहा कि स्टारलिंक "भारत की सेवा के लिए तैयार है, जब भी भारत तैयार हो।" उनके बास एलन मस्क में इतना सब्र नहीं था।

उन्होंने लिखा, "भारत में कुछ खास धनकुबेर" इस सेवा को रोक रहे हैं और उन्होंने इसे "भारत की जनता के खिलाफ अपराध" भी बताया। इसके बाद उन्होंने एक तरह से भारत सरकार को कोसना शुरू कर दिया। सरकार के ठिठकने के लिए इतना ही काफी होना चाहिए। स्टारलिंक को भारत आने से मना करने की वजहें और भी हैं।

स्टारलिंक सेवा के मामले में दलील हमेशा कुछ ऐसी रहती है: हिमालय की एक कक्षा, पूर्वोत्तर का एक क्लिनिक, मौसम का हाल देखता एक मछुआरा- इन सबको लाभ मिलेगा। खबरों के मुताबिक स्टारलिंक किट की कीमत ₹33,000 से ₹35,000 है और मासिक शुल्क कम से कम ₹3,000। इसकी तुलना उससे कीजिए, जो भारतीय आज चुकाते हैं।

फाइबर कनेक्शन ₹500 से ₹1,500 महीने में मिल जाता है और उसे लगवाने का खर्च स्टारलिंक किट के मुकाबले बहुत मामूली है। मोबाइल डेटा करीब ₹10 प्रति जीबी है। आम परिवार अपना इंटरनेट बिल ₹1,000 से नीचे रखता है। स्टारलिंक का मासिक शुल्क उसके सबसे करीबी विकल्पों से दो से पांच गुना है और हार्डवेयर लगभग पंद्रह गुना महंगा।

माना जा रहा है कि स्टारलिंक भारत में एक "प्रीमियम निश" बना रहेगा यानी गिने-चुने संपन्न ग्राहकों की सेवा। इसके संभावित खरीदार रिज़ार्ट, दूरदराज़ के कार्यस्थल और बैकअप लाइन चाहने वाली कंपनियां हो सकती हैं। गांव का आदमी इस कहानी में तभी आता है, जब सरकार पैसा भरे यानी जनता का पैसा एक विदेशी कंपनी के पास जाए- उस काम के लिए जिसके लिए भारतनेट को पैसा दिया गया है।

इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि कुछ समय पहले मणिपुर में सुरक्षा बलों ने उग्रवादी गुटों से स्टारलिंक के उपकरण बरामद किए थे और तब ऐसी भी खबरें आई थीं कि म्यांमार सीमा के पास उग्रवादियों ने हिंसा के दौरान इंटरनेट बंदी से बचने के लिए तस्करी से लाए गए उपकरणों का इस्तेमाल किया। अंडमान में हुई एक ज़ब्ती में भी एक टर्मिनल मिला था। दूसरे देशों ने भी यही देखा है।

बोलीविया ने स्टारलिंक को लाइसेंस देने से मना किया, फिर भी वहां पड़ोसी देशों से किट पहुंचीं और वे ब्राज़ील या चिली के पतों पर रजिस्टर कराई गईं। इस मामले में कंपनी का जवाब था कि उसका सिस्टम यह गड़बड़ी पकड़ लेता है और करीब 60 दिन बाद सेवा काट देता है, लेकिन संघर्ष वाले इलाके में दो महीने बहुत लंबा समय होता है और सेवा बंद करने का फैसला कंपनी लेती है, अपने हिसाब से और अपने समय पर, न कि वहां की सरकार के हिसाब से। यह स्थिति स्वीकार नहीं की जा सकती।

स्टारलिंक कहता है कि भारतीय उपयोगकर्ताओं का डेटा भारत में ही रहेगा और उसने भारत की सुरक्षा ज़रूरतों के मुताबिक नियंत्रण तैयार किए हैं। उसकी नीयत पर शक करने की कोई वजह नहीं है, लेकिन आखिर किसी इलाके में सेवा चालू या बंद करने का अधिकार किसके पास होगा?

बोलीविया की आपत्ति यह थी कि विदेशी सैटेलाइट आपरेटर किसी सरकार की अपने ही नेटवर्क पर अपने ही कानून लागू करने की क्षमता को कमज़ोर कर देता है। यह सही है कि इस दलील का दुरुपयोग वे सरकारें कर सकती हैं, जो बस सेंसरशिप चाहती हैं, लेकिन इंटरनेट बंदी को लेकर भारतीयों के पास भी सतर्क रहने की ठोस वजहें हैं।

किसी विपरीत हालात में इंटरनेट सुविधा रोकनी है या नहीं, इसे विदेश में मुख्यालय वाली किसी निजी कंपनी को सौंप देना न तो कोई समझदारी है और न ही कोई सुधार। कुलमिलाकर स्टारलिंक को मना करने के पर्याप्त कारण हैं, लेकिन मौजूदा हालात का बचाव करना भी ठीक नहीं होगा। इस वर्ष मई तक 11,000 से ज़्यादा गांव 4G से वंचित थे।

ग्रामीण भारत में हर सौ लोगों पर 48 इंटरनेट कनेक्शन हैं, जबकि शहरों में 127। भारतनेट ने 8.5 लाख किलोमीटर से ज़्यादा फाइबर बिछाया है और करीब 2.2 लाख ग्राम पंचायतों को सेवा के लिए तैयार घोषित किया है। निःसंदेह हर कहीं और खासकर देश के दूरदराज के इलाकों में इंटरनेट सुविधा सभी तक पहुंच सके, इस काम को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। पहाड़ों और द्वीपों में सैटेलाइट क्षमता इस समाधान का हिस्सा होगी।

यह क्षमता ऐसे आपरेटरों के ज़रिए आनी चाहिए, जिन्हें भारत पूरी तरह नियंत्रित कर सके और ज़रूरत पड़ने पर बाध्य भी कर सके। ध्यान रहे कि इसरो क्षमतावान है। इसके अलावा घरेलू कंपनियां या ऐसे उपक्रम, जिनमें नियंत्रण भारतीय लाइसेंसधारकों के हाथ में हो, उन पर भारत को ध्यान देना चाहिए।

यह रास्ता धीमा अवश्य है, लेकिन तब इंटरनेट बंद करने का बटन देश में ही रहेगा। मस्क कहते हैं कि स्टारलिंक को बाहर रखना भारतीयों के खिलाफ अपराध है। इसे वे तय नहीं कर सकते। यह फैसला भारतीय खुद कर सकते हैं और उन्हें मस्क के खिलाफ फैसला करने का पूरा हक है।

(लेखक वर्डा एआई के निदेशक हैं)