विचार: हुनर तय करेगा भविष्य
डिग्री दुनिया को यह बताती है कि आपने क्या पढ़ा है, जबकि हुनर यह दिखाता है कि आप उस पढ़ाई से क्या कर सकते हैं।
HighLights
स्नातकों में 40% बेरोजगारी दर, डिग्री-हुनर में खाई।
एआई युग में ज्ञान तेजी से पुराना हो रहा है।
निरंतर सीखना, अनुकूलनशीलता भविष्य के लिए आवश्यक कौशल।
राजेंद्र गुप्ता। आज भारत के किसी भी जॉब फेयर में चले जाइए, आपको दो तरह के युवा दिखाई देंगे। एक वह जिसके पास डिग्रियों और प्रमाण पत्रों से भरी फाइल है। दूसरा वह जिसके पास डिग्रियां शायद कम हों, लेकिन वह वेबसाइट बना सकता है, डाटा का विश्लेषण कर सकता है, कोई मशीन ठीक कर सकता है या एआइ टूल का इस्तेमाल करके घंटों का काम मिनटों में निपटा सकता है। आज कंपनियों के लिए यह सवाल पुराना हो चुका है कि आपने क्या पढ़ाई की है। अब असली सवाल यह है कि आप व्यावहारिक रूप से क्या कर सकते हैं। भारत में उच्च शिक्षा का विस्तार भले ही एक बड़ी उपलब्धि रहा हो, लेकिन डिग्रियों और वास्तविक रोजगार के बीच की खाई लगातार चौड़ी हो रही है। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की स्टेट आफ वर्किंग इंडिया 2026 रिपोर्ट के मुताबिक 15 से 25 साल के स्नातकों में बेरोज़गारी की दर लगभग 40 फीसदी के करीब है। जब लाखों युवा डिग्रियां हासिल करने के बाद भी सार्थक काम पाने के लिए संघर्ष कर रहे हों, तो हमें यह सोचना ही पड़ेगा कि क्या हम शिक्षा की सफलता का सही आकलन कर रहे हैं।
डिग्री दुनिया को यह बताती है कि आपने क्या पढ़ा है, जबकि हुनर यह दिखाता है कि आप उस पढ़ाई से क्या कर सकते हैं। इस समस्या की जड़ केवल बेरोज़गारी नहीं है, बल्कि ज्ञान के पुराना होने की असाधारण गति है। एक पीढ़ी पहले तक कोई भी तकनीक सालों तक प्रासंगिक बनी रहती थी, लेकिन एआइ के इस दौर में हर कुछ हफ्तों में नए टूल्स और क्षमताएं सामने आ रही हैं। ऐसे में जो ज्ञान छात्र चार साल की डिग्री की शुरुआत में हासिल करते हैं, वह स्नातक होने तक पुराना पड़ चुका होता है। वर्ल्ड इकोनामिक फोरम की रिपोर्ट भी चेतावनी देती है कि इस दशक के अंत तक कर्मचारियों के लगभग 39 प्रतिशत कोर स्किल्स बदल जाएंगे। इसलिए, आज के समय का सबसे बड़ा हुनर किसी एक साफ्टवेयर या भाषा में महारत हासिल करना नहीं, बल्कि तेजी से नया सीखने, पुरानी हो चुकी बातों को भूलने और लगातार खुद को अपडेट करने की क्षमता है।
हमारी शिक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि तकनीक महीनों की रफ्तार से बदल रही है, जबकि पाठ्यक्रम को बदलने में सालों लग जाते हैं। केवल एआइ साक्षरता ही काफी नहीं होगी, बल्कि हमें छात्रों और संस्थानों को उस भविष्य के लिए तैयार करना होगा जहां एआइ स्वास्थ्य, शिक्षा, वित्त और निर्माण जैसे हर क्षेत्र को नया रूप दे रहा है। आज हर पेशा हाइब्रिड बन रहा है। एक डाक्टर, इंजीनियर, शिक्षक या पत्रकार को अपने मूल विषय के ज्ञान के साथ-साथ डिजिटल और एआइ टूल्स की समझ रखनी ही होगी। इस बदलते दौर में भारतीय अभिभावकों को भी अपनी सोच बदलनी होगी। बच्चों से केवल यह पूछने के बजाय कि वे कौन सी डिग्री ले रहे हैं, यह भी पूछना होगा कि वे व्यावहारिक रूप से क्या करके दिखा सकते हैं।
एआई को सिर्फ रोजगार के खतरे के रूप में देखने के बजाय इसे अपनी उत्पादकता बढ़ाने वाले उपकरण की तरह इस्तेमाल करना सीखना होगा। इसके साथ ही, जैसे-जैसे मशीनें अधिक बुद्धिमान होंगी, इंसानी क्षमताएं जैसे कि संवाद, नेतृत्व, रचनात्मकता, सहानुभूति और नैतिकता और भी अधिक मूल्यवान होती जाएंगी। भारत की युवा आबादी देश के लिए आर्थिक वरदान तभी साबित हो सकती है जब उसे व्यावहारिक हुनर और तकनीक से लैस किया जाए। भविष्य केवल डिग्रियां जमा करने वालों का नहीं, बल्कि तेजी से सीखने और खुद को ढालने वालों का होगा। डिग्री आपके लिए पहला दरवाज़ा भले ही खोल दे, लेकिन आगे का रास्ता लगातार सीखते रहने की आपकी क्षमता ही तय करेगी।
(लेखक नेशनल एजुकेशन पॉलिसी कमेटी के पूर्व सदस्य हैं)











