डॉ. रागिनी नायक। एक रोज टीबी डिबेट में एंकर ने मुझसे पूछा कि कितने लोग पार्टियां बदल रहे हैं, उन्हें बड़े पद मिल रहे हैं-क्या आपका कोई विचार है कांग्रेस छोड़ने का? लंबा-चौड़ा जवाब दे सकती थी, लेकिन अनायास ही मेरे मुंह से निकला, 'कांग्रेस का इश्क मैं कैसे छोड़ दूं, मेरी उम्र भर की तलाश है।' ऐसा हम सबके साथ न जाने कितनी बार हुआ होगा कि किसी सवाल के जवाब में फिल्मी गाने की कोई लाइन बोल दी हो या कोई धमाकेदार डायलाग।

विरले ही होंगे, जिन्होंने फिल्मी गानों की अंताक्षरी न खेली हो या फिल्मों के नाम पहचानने वाला डंब शराड्स। हिंदी फिल्मों ने हिंदी में अभिव्यक्ति को नीरसता से बचा के रखा, उसने हिंदी को केवल बोला नहीं, उसे देश भर में एक खनक के साथ सुनाया। सिनेमा ने हिंदी को व्याकरण की किताबों और अकादमिक बहसों के भारी-भरकम बोझ से आजाद किया। आज जहां हिंदी है, वहां खड़े होने की जमीन हिंदी सिनेमा ने तैयार की और पूरे देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में हिंदी का एक विशिष्ट समुदाय बनाया।

मेरे फूफा जी, पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र कहते थे कि 'भाषा का मतलब सिर्फ जीभ नहीं है, भाषा हमारा मन और माथा भी है।' इस बड़े हिंदी और गैर हिंदी-भाषी समाज के मन और माथे में पैठ बनाने के लिए हिंदी सिनेमा ने हिंदी भाषा का आलंकारिक और क्लिष्ट लिबास उतार फेंका और उसे सीधी-सादी जुबान में अपना लिया। 'बयां ऐसा कि दिल माने/जुबां ऐसी कि सब समझें' उसका सिद्धांत बन गया। यही कारण है कि भाषा के तमाम विरोध और विवादों के बावजूद हिंदी सिनेमा बढ़ता गया और हिंदी भाषा का मार्ग प्रशस्त करता गया। एक लंबे समय तक बंबई के हिंदी फिल्म जगत में गैर-हिंदी भाषी लोगों का दबदबा रहा।

जैसे कि बिमल राय, महबूब खां, गुरुदत्त, शशधर मुखर्जी, लता मंगेशकर, शमशाद बेगम, गीता दत्त, रफी, किशोर, तलत महमूद, मन्ना डे, हेमंत कुमार। एक समय मंटो, राजेंद्र सिंह बेदी, राही मासूम रजा, शकील, साहिर, शैलेंद्र, मजरूह सुल्तानपुरी आदि ने मिलकर ऐसी हिंदी तैयार की जो सबके गले उतरी। उसमें उर्दू की नजाकत घुली, क्षेत्रीय बोलियों का सोंधापन मिला और समय के साथ अंग्रेजी के शब्दों को भी सहजता से अपना लिया गया। इसी खुलेपन ने हिंदी को 'अभिजात वर्ग' की तिजोरी से निकालकर 'अवाम' की धड़कन बना दिया। हिंदी सिनेमा ने इस भाषा को वह लचीलापन भी दिया, जिससे यह सुदूर दक्षिण के समुद्र तटों से लेकर पूर्वोत्तर के पहाड़ों तक सहजता से गुनगुनाई जाने लगी।

फिल्मी गीतों ने भी हिंदी भाषा का पूरा साथ दिया। हमारे हर सुख-दुख के लिए, हर मौसम, हर तीज-त्योहार के लिए कोई न कोई गीत मौजूद है। जैसे कि 'साथी हाथ बढ़ाना...', 'डम-डम डीगा डीगा मौसम भीगा-भीगा...', 'होली के दिन दिल खिल जाते हैं...।' फिल्म संगीत में आकर गीत, गजल, कव्वाली सब ऐसे घुलमिल गए जैसे दूध और चीनी। जैसे कि 'परदा है परदा...', 'किसी नजर को तेरा इंतजार आज भी है...।' कुछ गीत और मुहावरेदार पंक्तियां सीधे दिल-दिमाग में उतर गए। जैसे कि 'मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया...।'

यही नहीं, हिंदी फिल्मों ने बिना भेद-भाव धार्मिक आस्था को भी सशक्त किया। जैसे कि 'शिरडी वाले साईं बाबा-आया है तेरे दर पे सवाली...', 'तूने मुझे बुलाया शेरावालिए...', 'ख्वाजा मेरे ख्वाजा...' आदि गीत जुबान पर चढ़ गए। नैतिक शक्ति को सुदृढ़ करने वाले गीतों की भी कमी नहीं रही। जैसे कि 'इतनी शक्ति हमें देना दाता...', 'ऐ मालिक तेरे बंदे हम...।' इन सभी गीतों की खूबी ये रही कि इन्हें याद करने की जरूरत नहीं पड़ी, ये अपने-आप ही स्मृति में रच बस गए।

हर दौर में अच्छी-बुरी फिल्में बनती रहीं। आज भी नए कथानक वाली अच्छी फिल्में बन रही हैं, जिनकी भाषा में नई ताजगी है तो खराब घिसी-पिटी फिल्मों का सिलसिला भी जारी है, लेकिन एक अनमोल समय ऐसा भी था जब फिल्मों ने हमें कुछ ऐसे संस्कार दिए, जिनसे हमारी सभ्यता और विरासत पुष्ट हुई। 'ए मेरे वतन के लोगों...' देश-प्रेम और सैनिकों के सर्वोच्च बलिदान की याद दिलाने वाला अनूठा गीत है।

'मदर इंडिया' में मेहनतकश भारतीय नारी का देश की आम महिला के संघर्ष से अद्भुत मेल है। शैलेंद्र का गीत 'हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है...' वाकई एक नारा बन गया तो 'बहुत कठिन है डगर पनघट की...' एक मुहावरा। 'प्यार किया तो डरना क्या' जैसी लाजवाब पंक्ति हो या 'दीवार' का वह मशहूर डायलाग 'मेरे पास मां है', हिंदी को सहेजने और संवारने का उपकार तो फिल्म जगत ने किया।

हिंदी फिल्मों का मूल उद्देश्य तो मनोरंजन ही है, लेकिन हिंदी सिनेमा ने भाषा का लोकतंत्रीकरण तो किया ही। उसने हिंदी को किसी नियम-पुस्तिका में बंद भाषा नहीं रहने दिया, बल्कि उसे बोलचाल, भावनाओं और सामूहिक स्मृति की भाषा बना दिया, जिसमें हर जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा के लोग अपने सुख-दुख, प्रेम, विरह, हास्य और संघर्ष को कह सकें, लेकिन क्या हिंदी सिनेमा की सरल, सजल शब्दों-धारा, जो हिंदी भाषा में मिठास घोलती थी, आज आडंबर और बनावट भरे शब्दों से हिंदी को खारा बना रही है? क्या हिदी भाषा अपने ही आंगन में पराई हो रही है, यह मैं पाठक के विवेक पर छोड़ती हूं!

(लेखिका कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं)