विचार: शहरों की बिगड़ती सूरत
दिल्ली के सत्य निकेतन में पीजी इमारत गिरने से छात्रों की मौत ने शहरी विकास की खामियों और अनियोजित निर्माण पर सवाल उठाए हैं
HighLights
सत्य निकेतन में पीजी इमारत गिरने से सात छात्रों की मौत।
दिल्ली में छात्रावासों की कमी, अनियंत्रित पीजी कारोबार चिंताजनक।
शहरी विकास नियमों की अनदेखी और राजनीतिक हस्तक्षेप मुख्य कारण।
संजय गुप्त। पिछले दिनों दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में पेइंग गेस्ट यानी पीजी के रूप में चलाई जा रही एक बिल्डिंग गिरने से सात छात्रों की मौत हो गई और कई घायल हो गए। इस हादसे के बाद पीजी के रूप में रहने वाले छात्रों पर मुसीबत आ गई, क्योंकि अनेक इमारतों को जर्जर पाकर खाली करा लिया गया।
इसके चलते अनेक छात्र इधर-उधर भटकने के लिए मजबूर हो गए। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि छात्रों को रह-रहकर समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है। इन दिनों दिल्ली में हास्टल के अभाव में पीजी के रूप में रहने वाले तमाम छात्र संकट में हैं। वैसे तो देश में बरसात के दिनों में कहीं न कहीं से भवनों के गिरने की खबर आती ही रहती है, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसी खबरें राजधानी दिल्ली से भी रह-रहकर आती रहती हैं।
जब अपेक्षा यह है कि कम से कम देश की राजधानी में शहरी विकास संबंधी हर तरह के नियम-कानूनों का सही से पालन हो, तब सच्चाई इसके विपरीत दिखती है। शहरी विकास के मामले में जो हाल दिल्ली का है, वही देश के अन्य शहरों का भी। यह चिंताजनक है कि बेहतर शहरी विकास के मामले में दिल्ली कोई उदाहरण नहीं पेश कर पा रही है।
मोदी सरकार के बाद से देश के शहरों में तेजी से जो परिवर्तन देखने को मिला, वह सबसे अधिक दिल्ली-एनसीआर में देखने को मिला। दिल्ली-एनसीआर की आबादी पूरे देश की चार-पांच प्रतिशत ही होगी, लेकिन यहां भी विकास के काम सही ढंग से नहीं हो रहे हैं। इस विसंगति को देश के साथ-साथ दुनिया भी देख रही है, क्योंकि यहां पर अंतरराष्ट्रीय आयोजन होते ही रहते हैं।
तमाम विकास के बावजूद दिल्ली-एनसीआर की समस्याएं कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। दिल्ली में इसके पहले भी इमारतें गिरती रही हैं और हर बार यह आश्वासन मिला है कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात वाला है। इसका एक बड़ा कारण दिल्ली की स्थानीय राजनीति है और नगर निगम का अक्षम होना है। यहां के औसत नेता वोट बैंक के लालच में शहरी विकास की अच्छी-भली योजनाओं को पटरी से उतार देते हैं। अवैध बस्तियों का नियमितीकरण इसका एक उदाहरण है।
साफ है कि हमारे नीति नियंताओं को इसकी परवाह नहीं कि शहरी विकास के नियम-कानूनों का सही तरह अनुपालन हो। इसका दुष्परिणाम यह है कि दिल्ली एक अंतरराष्ट्रीय शहर की तरह विकसित नहीं हो पा रही है। ध्यान रहे किसी देश की राजधानी उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि के निर्माण में सहायक होती है। समस्या यह है कि हमारी वित्तीय राजधानी मुंबई की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं।
दिल्ली में इमारत गिरने के बाद नगर निगम के कुछ अफसरों को निलंबित करने के साथ और भी कदम उठाए गए, लेकिन इसकी गारंटी नहीं कि भविष्य में ऐसी घटनाएं नहीं होंगी। चूंकि सत्य निकेतन इलाके की इमारत गिरने से छात्रों की जान गई, इसलिए इस घटना का राजनीतीकरण हो रहा है। ऐसा इसलिए और भी हो रहा है, क्योंकि इस समय छात्र राजनीति के केंद्र में हैं।
दिल्ली में एक और इमारत गिरने की घटना से यह भी स्पष्ट हुआ कि दिल्ली विश्वविद्यालय और उसके कालेजों में पढ़ने वाले छात्रों के लिए हास्टल की पर्याप्त सुविधा नहीं है। इसके अभाव में कालेज के आसपास के भवनों में छात्रों के लिए पीजी चलाए जा रहे हैं। समस्या यह है कि उनकी कोई निगरानी नहीं और न ही उनके लिए कोई प्रभावी नियम-कानून बने हैं। इसके चलते पीजी संचालक मनमानी करने को स्वतंत्र हैं।
अब यह कहा जा रहा है कि पीजी के रूप में चलाए जा रहे भवनों को नियमों के दायरे में लाया जाएगा, लेकिन ऐसा तो तीन-चार दशक पहले ही कर दिया जाना चाहिए था। ऐसा शायद इसलिए नहीं हो पा रहा है, क्योंकि मनमाने ढंग से चलने वाले अनेक पीजी नेताओं या उनके परिचितों के हैं। नेता पीजी संचालकों की चिंता अधिक करते हैं, न कि वहां रहने वालों की। एक अनुमान के अनुसार दिल्ली-एनसीआर में मनमाने तरीके से चलाया जा रहा पीजी का कारोबार लगभग 25 से 30 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, क्योंकि तमाम छात्र कोचिंग केंद्रों में पढ़ाई करते हैं।
देश भर के छात्र पढ़ने और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए दिल्ली-एनसीआर आते हैं। छात्रावासों के अभाव में वे जैसे-तैसे संचालित हो रहे पीजी में रहने को विवश हैं। छात्रों को केवल जर्जर भवनों में ही नहीं रहना पड़ रहा, बल्कि ऐसे भवनों में भी अपना गुजारा करना पड़ रहा, जिनमें बुनियादी सुविधाओं का अभाव है।
सब जानते हैं कि शहर प्रगति के केंद्र हैं, लेकिन इसके बावजूद शहरों के विकास के लिए कोई ठोस योजना नहीं बन पा रही है। बनती भी है तो उस पर अमल नहीं होता। शहरों का विकास मुख्यतः राज्य सरकारों का विषय है, लेकिन वे सुनियोजित शहरी विकास के लिए ईमानदारी से प्रयासरत नहीं। इसका एक कारण यह भी है कि हमारे अधिकतर सांसद और विधायक ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं। इसके चलते उनका और सरकारों का ध्यान शहरों के विकास पर कम, ग्रामीण क्षेत्रों पर अधिक रहता है।
निःसंदेह ग्रामीण क्षेत्रों का विकास होना ही चाहिए, लेकिन शहरों की अनदेखी की कीमत पर नहीं। शहरी क्षेत्रों के जो जनप्रतिनिधि हैं, उनमें अधिकांश की शहरों के नियोजित विकास और शहरी ढांचे संबंधी नियम-कानूनों के अनुपालन में रुचि कम ही होती है। इसका कारण यह है कि शहरों में अधिकांश वोट अनियोजित क्षेत्रों से आता है। वोटों की खातिर नेता ही अनियोजित क्षेत्रों का नियोजित विकास नहीं होने देते। उलटे वे इन क्षेत्रों में बसाहट बढ़ाने में लगे रहते हैं, ताकि उनका वोट बैंक मजबूत हो।
ऐसे इलाकों में बसाहट बढ़ने से नागरिक सुविधाओं का अभाव भी बढ़ता है। इससे शहरों की सूरत और बिगड़ती है। चूंकि शहरों में नियोजित विकास नहीं हो पा रहा है, इसलिए वे आर्थिक प्रगति के बड़े केंद्र भी नहीं बन पा रहे हैं। यह स्पष्ट है कि जब तक राज्य सरकारें और स्थानीय निकाय शहरों की समस्याओं को दूर करने का काम प्राथमिकता के आधार पर नहीं करेंगे, तब तक हमारे शहर देश की बदनामी कराने और जानलेवा साबित होने वाली घटनाओं एवं दुर्घटनाओं से मुक्त होने वाले नहीं हैं।











