विचार: ब्रिक्स को लाभकारी बनाने की चुनौती
ब्रिक्स सम्मेलन का सबसे संवेदनशील पहलू भारत-चीन-रूस त्रिकोण होगा। भारत दोनों के साथ संबंध रखता है, लेकिन दोनों से अलग-अलग चुनौतियां भी हैं।
HighLights
ब्रिक्स सम्मेलन की सफलता भारत की कूटनीतिक विरासत में स्वर्णिम अध्याय।
भारत को व्यावहारिक नतीजों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
भारतीय रुपये को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाना और स्थानीय व्यापार बढ़ाना।
डॉ. सुरजीत सिंह। नई दिल्ली में होने जा रहे ब्रिक्स सम्मेलन की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत संस्थागत तंत्र बनाने और सार्थक समझौते करने में कितना सफल होता है। यदि यह सम्मेलन सार्थक परिणाम देने में सफल रहा तो यह भारत की कूटनीतिक विरासत में एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज होगा। ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका से शुरू हुआ यह समूह मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और इंडोनेशिया को अपने साथ जोड़कर आज एक विशाल वैश्विक शक्ति-गुट का रूप ले चुका है।
ब्रिक्स की आर्थिक ताकत का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि विस्तारित ब्रिक्स देशों की हिस्सेदारी वैश्विक जीडीपी (क्रय शक्ति के आधार पर) करीब 42.5 प्रतिशत है और जिसका विश्व की आबादी में लगभग 54 प्रतिशत योगदान है। प्रश्न यह नहीं है कि ब्रिक्स कितना बड़ा हो चुका है। असली सवाल यह है कि क्या बड़ी आर्थिक और जनसांख्यिकीय ताकत सामूहिक राजनीतिक इच्छाशक्ति और ठोस आर्थिक नतीजों में तब्दील हो पाएगी? क्या ये विशाल आंकड़े साझा निर्णयों, साझा संस्थाओं और साझा आर्थिक उपलब्धियों की ठोस बुनियाद रख पाएंगे?
भारत इस सम्मेलन को कितनी कुशलता से भुनाता है, यह देखना दिलचस्प होगा, क्योंकि वर्तमान में भारत दुनिया की तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, इसके पास यूपीआइ जैसी डिजिटल सफलता है, ग्लोबल साउथ में स्वीकार्यता है और अमेरिका, यूरोप, रूस, चीन तथा खाड़ी देशों के साथ संवाद की क्षमता है, लेकिन चुनौतियां उससे भी बड़ी हैं। ब्रिक्स में चीन का आर्थिक वजन, रूस की भू-राजनीतिक स्थिति, पश्चिम एशिया के अंतर्विरोध, स्थानीय मुद्रा व्यवस्था की सीमाएं, सदस्यता विस्तार और आपसी व्यापार में असंतुलन भारत के सामने कठिन प्रश्न खड़े करते हैं। इसके लिए भारत को किसी के पीछे चलने के बजाय सबको साथ लेकर चलने की रणनीति पर कार्य करने की जरूरत है।
ब्रिक्स के सम्मेलन से यह संदेश जाना चाहिए कि भारत किसी देश के विरुद्ध गठबंधन नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में विकासशील देशों की साझा आवाज का मंच है। ब्रिक्स की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि इसका आकार जितना बढ़ा है, इसके भीतर सहमति बनाना उतना ही कठिन होता गया है। डालर व्यवस्था बदलने, रूस-यूक्रेन युद्ध सुलझाने, चीन से सीमा विवाद हल करने या संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था में बदलाव जैसी बड़ी और जटिल राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के पीछे भागने के बजाय भारत को इस सम्मेलन को व्यावहारिक नतीजों की जमीन पर उतारना चाहिए। सप्लाई चेन, डिजिटल भुगतान, केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा, स्थानीय मुद्रा व्यापार, एआइ, हरित ऊर्जा और ग्लोबल साउथ जैसे क्षेत्रों में ठोस समझौते ही असली उपलब्धियां होंगी, जो भारत की कूटनीतिक सफलता की कहानी लिखेंगे।
भारत को ध्यान में रखना होगा कि अमेरिका, यूरोप और जापान जैसे साझेदारों के साथ उसके अहम आर्थिक और रणनीतिक रिश्ते किसी भी सूरत में प्रभावित न हों। इस मंच पर न तो चीन का आर्थिक दबदबा हावी होने दिया जाए और न ही रूस-यूक्रेन या पश्चिम एशिया जैसे विवादों की बात की जाए, अन्यथा सम्मेलन अपने वास्तविक उद्देश्य से भटक जाएगा। इसके अलावा डालर के विकल्प के नाम पर ऐसी अव्यावहारिक वित्तीय घोषणाएं करने से बचना होगा, जिन्हें वर्तमान में जमीन पर उतारना असंभव हो।
यह सच है कि डालर पर निर्भरता घटाने की दिशा में चीन और रूस ने अपने लगभग 99 प्रतिशत द्विपक्षीय व्यापार को रूबल और युआन में स्थानांतरित कर लिया है, लेकिन असली चुनौती कहीं बड़ी है। दुनिया भर के 11,000 से अधिक बैंक आज भी स्विफ्ट यानी वैश्विक अंतर-बैंक वित्तीय दूरसंचार व्यवस्था से जुड़े हैं। इसके सामने चीन की सीआइपीएस (सीमा-पार अंतर-बैंक भुगतान प्रणाली) और रूस की एसपीएफएस (वित्तीय संदेश हस्तांतरण प्रणाली) फिलहाल बौनी हैं और तत्काल कोई विकल्प नहीं बन रही हैं। यही वजह है कि भारत को डालर खत्म करो के बजाय यथार्थवादी और दूरदर्शी रणनीति अपनाते हूए भारतीय रुपये को धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाना, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देना, सस्ता और तेज सीमा-पार भुगतान सुनिश्चित करना और सीबीडीसी (केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा) को अन्य देशों की प्रणालियों से जोड़ने पर फोकस करना चाहिए। यही वह ठोस और व्यावहारिक रास्ता है, जो भारत को वास्तविक आर्थिक स्वायत्तता की ओर ले जाएगा।
ब्रिक्स सम्मेलन का सबसे संवेदनशील पहलू भारत-चीन-रूस त्रिकोण होगा। भारत दोनों के साथ संबंध रखता है, लेकिन दोनों से अलग-अलग चुनौतियां भी हैं। इसलिए चीन के साथ सीमा सुरक्षा और आर्थिक संबंधों को लेकर भारत की स्पष्ट रणनीति होनी चाहिए, जिससे ब्रिक्स सम्मेलन भारत और चीन के लिए संवाद का मंच बन सके। रूस के साथ भारत को ऊर्जा, रक्षा और व्यापार के पुराने रिश्तों का फायदा उठाना चाहिए, लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध को ब्रिक्स के पूरे एजेंडे पर हावी नहीं होने देना चाहिए। इस सम्मेलन में भारत के पास मौका है कि वह स्वयं को ग्लोबल साउथ (यानी एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील देश) की आवाज के रूप में पेश करे।
(लेखक अर्थशास्त्री हैं)











