विचार: अब भी नासूर बना हुआ है आतंकवाद
आतंक के खिलाफ कोरी बातें ही उसे ताकत प्रदान कर रही हैं। आज सबसे आवश्यक यह है कि आतंकवाद को संयुक्त राष्ट्र की ओर से परिभाषित किया जाए और आतंक के पोषक देशों को दंडित किया जाए।
HighLights
आतंकवाद आज भी विश्व की सबसे जटिल और गंभीर समस्या है।
भारत ने पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की है।
वैश्विक एकजुटता की कमी आतंकवाद के खिलाफ बड़ी चुनौती है।
आशीष त्रिपाठी। आतंकवाद समकालीन विश्व की सबसे जटिल समस्याओं में से एक है। इसने समूचे विश्व को अपने प्रकोप से प्रभावित किया हुआ है। आज के दौर में यह समस्या और विकट होती जा रही है और किसी न किसी रूप में विश्व को ग्रसित कर रही है। आतंकवाद को परिभाषित किया जाए तो यह किसी व्यक्ति विशेष या संगठन द्वारा अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सशस्त्र बल का प्रयोग कर समाज में हिंसा और भय उत्पन्न करना होता है। हिंसा और भय से समाज में भारी उथल-पुथल और अशांति पैदा कर समाज में एक व्यापक गतिरोध पैदा करने की मंशा से की जाने वाली घटनाएं आतंकवाद की श्रेणी में आती हैं। ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले कहीं जिहाद के नाम पर, कहीं पृथक देश बनाने की मांग पर और कहीं शोषण के विरुद्ध संघर्ष चलाने के नाम पर हिंसक घटनाओं को अंजाम देते हैं।
विश्व के इतिहास में सबसे बड़ी आतंकी घटना अलकायदा द्वारा सितंबर 2001 में अमेरिका के विश्व व्यापार केंद्र और ‘पेंटागन’ पर हुई थी। 25 वर्ष पुरानी इस आतंकी घटना में लगभग तीन हजार लोग मारे गए थे और तमाम घायल हुए थे। इस घटना ने समूची दुनिया की नींद उड़ा दी थी। इस घटना के बाद अमेरिका और उसके साथी देशों ने आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक अभियान छेड़ा, लेकिन वह भटक गया। आज स्थिति यह है कि आतंकवाद से पीड़ित रहा अमेरिका उसके सबसे बड़े संरक्षक पाकिस्तान का दोस्त और शुभचिंतक बना हुआ है। यह आतंक के खिलाफ अमेरिका के दोहरे मानदंड का परिचायक है।
कुछ ऐसा ही रवैया चीन और तमाम अन्य देशों का भी है। इस कारण भी भारत पाकिस्तान द्वारा पोषित आतंकवाद से ग्रसित है। भारत में अस्थिरता बढ़ाने और देश में अशांति फैलाने के उद्देश्य से अनेक भीषण आतंकी हमले किए गए। हमने अपने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी जी को भी ऐसी ही घटना में खो दिया। यह घटना भारत के इतिहास में सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक थी। भारत में आतंकवादी हमले लगातार होते रहे हैं। 2001 में भारतीय संसद पर हमला, 2002 में अक्षरधाम मंदिर पर हमला, 2006 में मुंबई लोकल ट्रेन पर हमला और 2008 में मुंबई पर हमला, 2019 में पुलवामा और 2025 में पहलगाम हमला प्रमुख आतंकी घटनाएं हैं। इन हमलों में सैकड़ों लोगों की जान गई और अनेक सुरक्षाकर्मियों ने भी अपना बलिदान दिया।
भारत में होने वाली आतंकी घटनाओं के पीछे पड़ोसी देश पाकिस्तान की भूमिका रही है। फिल्म ‘धुरंधर’ पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद की कहानी को बड़े ही बेहतर ढंग से प्रस्तुत करती है। विडंबना यह कि मुंबई आतंकी हमले में पर्याप्त साक्ष्य मिलने के बाद भी राजनीतिक साहस की कमी और अदूरदर्शिता के कारण पीड़ितों को न्याय मिलने में बहुत देरी हुई। उस समय किसी दबाव में तत्कालीन सरकार पाकिस्तान पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर पाई। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने तो एक पुस्तक विमोचन के अवसर पर झूठा विमर्श खड़ा कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छवि खराब करने का काम किया। ये प्रसंग कहीं न कहीं हमारी राजनीतिक कमजोरियों को भी उजागर करते हैं, जिससे ऐसी घटनाओं के पीछे की ताकतों के मंसूबों को और बल मिलता है। आतंक के खिलाफ जैसी एकजुटता का अभाव विश्व स्तर पर है, वैसा ही राष्ट्रीय स्तर पर भी।
आतंक के खिलाफ इतने वर्षों के संघर्ष के बाद भी आतंकवाद पूरी दुनिया के लिए एक नासूर बना हुआ है। पहलगाम हमले के जवाब में भारत की सेना ने अदम्य साहस और पुरुषार्थ का परिचय देते हुए पाकिस्तान में घुसकर बहावलपुर और मुरीदके जैसी जगहों पर मौजूद बड़े आतंकी कैंप्स को ध्वस्त किया और सैकड़ों आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया। भारत सरकार के इस मजबूत इरादे और सेना की बहादुरी को पूरी दुनिया ने देखा। यह अपने आप में एक बदलते हुए नए भारत की तस्वीर है, लेकिन समस्या यह है कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक एकजुटता कायम नहीं हो पा रही है। प्रधानमंत्री मोदी अनेक वैश्विक मंचों से आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट मत प्रकट करते रहते हैं। वे आतंकवाद के खिलाफ ‘जीरो टालरेंस’ की नीति की वकालत करते हैं। विश्व को एक साथ मिलकर आतंकवाद के खिलाफ ठोस कदम उठाने चाहिए और इसका समूल नाश करने के लिए स्पष्ट नीति और नीयत दिखानी चाहिए।
हाल ही में किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित ‘शंघाई सहयोग संगठन’ के सम्मेलन में सदस्य देशों ने आतंकवाद पर दोहरे रवैये के खिलाफ आवाज उठाई। ‘बिश्केक डिक्लेरेशन’ के नाम से दिए गए साझा बयान में कहा गया है कि सदस्य राष्ट्र आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद के खिलाफ लड़ाई और इसके खात्मे के लिए अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करते हैं। इस घोषणा में अपने निहित स्वार्थों के लिए आतंकवाद और उग्रवाद की अस्वीकार्यता पर भी चिंता व्यक्त की गई। देखना है कि ऐसी ही चिंता ब्रिक्स सम्मेलन में भी व्यक्त की जाती है या नहीं? वैसे, केवल चिंता जताना ही पर्याप्त नहीं। आतंक के खिलाफ कोरी बातें ही उसे ताकत प्रदान कर रही हैं। आज सबसे आवश्यक यह है कि आतंकवाद को संयुक्त राष्ट्र की ओर से परिभाषित किया जाए और आतंक के पोषक देशों को दंडित किया जाए।
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर हैं)











