विचार: आसिम मुनीर के शिकंजे में पाकिस्तान
रंपरागत रूप से पाकिस्तान में सेनाध्यक्ष ही सत्ता के सबसे ताकतवर चेहरे रहे हैं, जिनका रसूख निर्वाचित सरकार और उसके मुखिया से कहीं अधिक होता है।
HighLights
पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने शक्ति को मजबूत किया।
नए कानून से सेना का सभी सैन्य अंगों पर नियंत्रण।
कमजोर लोकतंत्र और भारत के लिए बढ़ती चिंताएँ।
विवेक काटजू। श्रीराम कालेज आफ कामर्स में पांच सितंबर को अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दो टूक कहा, 'अगर पाकिस्तान कोई भी नापाक करतूत करता है, तो भारत के जांबाज उसके घर में घुसकर प्रहार करते हैं।' सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट एयर स्ट्राइक से लेकर आपरेशन सिंदूर तक इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। इसमें संदेह नहीं कि भारत पाकिस्तान पर पूरी तरह भारी पड़ा, लेकिन पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने अपने मुल्क की आंखों में धूल झोंकने के लिए यह झूठी कहानी गढ़ दी कि उनकी फौजों ने भारत के कदम थाम लिए थे।
अवाम के बीच अपनी छवि चमकाने में उनका यह फरेब इतना कारगर रहा कि इस सैन्य अभियान के दौरान थलसेना की सीधी भूमिका न होने के बावजूद प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने उन्हें पदोन्नत कर 'फील्ड मार्शल' की रैंक से नवाज दिया और वायुसेना प्रमुख के हाथ कुछ भी न लगा। आपरेशन सिंदूर के बाद भी मुनीर ने अपनी छवि को भुनाना जारी रखा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की जी-हुजूरी भी उनके हक में गई। पाकिस्तानी सैन्य-राजनीतिक नेतृत्व ने न केवल भारत से मध्यस्थता कराने में ट्रंप के दावे पर मुहर लगाई, बल्कि ट्रंप की इस हद तक खुशामद जारी रखी कि उनका नाम नोबेल शांति पुरस्कार के लिए आगे भी बढ़ाया।
परंपरागत रूप से पाकिस्तान में सेनाध्यक्ष ही सत्ता के सबसे ताकतवर चेहरे रहे हैं, जिनका रसूख निर्वाचित सरकार और उसके मुखिया से कहीं अधिक होता है। मुनीर ने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ एवं अपने बीच सत्ता की इस खाई को अप्रत्याशित रूप से कई गुना और चौड़ा कर दिया। उन्होंने पाकिस्तान के राष्ट्रीय जीवन के हर पहलू में सीधा हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया। इससे भी बढ़कर उन्होंने पाकिस्तानी तंत्र में सेना प्रमुख के पद को कानूनी और संवैधानिक रूप से ऐसा अभेद्य कवच प्रदान करने का फैसला किया कि उस पर किसी भी प्रकार का अंकुश असंभव हो जाए।
ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तानी सेना ही स्वयं को देश की वास्तविक शासक मानती आई है। वह नौसेना और वायुसेना को महज 'तकनीकी सेवाओं' से अधिक कुछ नहीं समझती, भले ही सैद्धांतिक तौर पर इन दोनों अंगों के प्रमुखों को थलसेना प्रमुख के समकक्ष दर्जा प्राप्त रहा हो। अब यह मानक समानता भी अतीत की बात हो चुकी है। नौसेना और वायुसेना के अधिकारों के ताबूत में आखिरी कील 20 अगस्त को उस वक्त ठोकी गई, जब पाकिस्तानी संसद ने 'डिफेंस फोर्सेज आफ पाकिस्तान एक्ट, 2026' पर मुहर लगा दी। इसके साथ ही 'नेशनल कमांड अथारिटी, 2010' में भी संशोधन कर दिया गया। इन विधायी प्रविधानों की पटकथा गत वर्ष नवंबर में पाकिस्तानी संविधान के 27वें संशोधन के जरिये लिखना शुरू हुई। इसके साथ ही अब समूचे सैन्य प्रतिष्ठान पर मुनीर का एकाधिकार स्थापित हो चुका है और नौसेना एवं वायुसेना प्रमुख उनके समकक्ष न रहकर एक तरह से उनके मातहत बनकर रह गए हैं।
27वें संविधान संशोधन के जरिये चीफ आफ डिफेंस फोर्सेज यानी सीडीएफ का नया पद सृजित किया गया। इस कानून का एक पेच यह भी है कि यह पद थलसेना प्रमुख के पास ही रहेगा। यह कानून सुनिश्चित करता है कि सभी सामरिक पहलुओं पर सीडीएफ का ही पूर्ण नियंत्रण होगा। यानी पाकिस्तानी नौसेना और वायुसेना का रणनीतिक, परिचालन एवं प्रशासनिक नियंत्रण सीडीएफ के पास ही होगा। स्पष्ट है कि सैन्य अधिकारियों की पदोन्नति, नियुक्ति और तबादलों में चुनी हुई सरकार की अब कोई भूमिका नहीं रह जाएगी। इस तरह सेना प्रमुख के प्रस्तावों को मंजूरी देने की जो रस्म अदायगी वाली परिपाटी बची हुई थी, उस पर भी पूरी तरह पर्दा गिर जाएगा। यह कवायद कुछ और नहीं, बल्कि कानूनी प्रक्रिया के जरिये पाकिस्तान में फौज की पकड़ को और पुख्ता एवं गहरा करने जैसा है।
नेशनल कमांड अथारिटी एक्ट में संशोधन के बाद अब सीडीएफ ही उस संस्था के उपाध्यक्ष होंगे, जो युद्ध के समय पाकिस्तान के परमाणु हथियारों के उपयोग सहित उनके पूरे संचालन का फैसला करती है। पाकिस्तान के परमाणु शस्त्रागार को सुरक्षित रखने के जिम्मेदार सैन्य जनरल की वास्तविक नियुक्ति भी अब सीडीएफ ही करेंगे। यह कोई दबी-छिपी बात नहीं रही कि पाकिस्तान में लोकतांत्रिक नकाब के पीछे असली चेहरा फौज का ही रहा है। विदेश नीति की बागडोर भी हमेशा सेना के हाथ में रही है। चूंकि अब सीडीएफ को कानूनी तौर पर असीमित अधिकार मिल जाएंगे तो इस नकाब की भी जरूरत नहीं रह जाएगी। भारत के लिए यह चिंता का सबब होगा, क्योंकि पहले से ही कमजोर निर्वाचित सरकार के साथ वार्ता का कोई अर्थ-औचित्य ही नहीं बचेगा। पाकिस्तानी सेना प्रमुख की ताकत जिस कदर बढ़ गई है, उसे देखते हुए कोई प्रधानमंत्री उन्हें यह समझाने में संकोच ही करेगा कि भारत से बैर असल में पाकिस्तान का ही अधिक अहित कर रहा है। रही-सही कसर मुनीर का वह कट्टर सोच पूरा कर देगा, जो आज भी पाकिस्तान की बुनियाद बने द्विराष्ट्र सिद्धांत को अपना मूल मानता है।
भारत के प्रति मुनीर की कटुता बहुत गहरी है, जिसके निकट भविष्य में कम होने के कोई आसार नहीं। वैचारिक पहलुओं से इतर भी इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि ईरान और अमेरिका के बीच कथित मध्यस्थता में निभाई भूमिका के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्हें चर्चा मिली है, क्योंकि वही पाकिस्तानी प्रयासों का चेहरा बने रहे। हालांकि 'इस्लामाबाद समझौता' बेनतीजा ही रहा, लेकिन इसके जरिये उपजे मुनीर के मिथ्या अभिमान से भारत के विरुद्ध उनकी बेतुकी एवं अड़ियल नीति पहले की तुलना में और जहरीली हो जाएगी। अब मुनीर के हाथ में सत्ता की असीमित ताकत आने के बाद पाकिस्तान में पहले से कमजोर लोकतंत्र की हालत और खस्ता ही होनी है। अब अदालतें भी पूरी तरह फौज के इशारों पर चलने को मजबूर होंगी। ऐसे में इमरान खान जैसे राजनीतिक विरोधियों की रिहाई असंभव सी दिखती है। केवल अफगानिस्तान के साथ बढ़ती समस्याएं और टीटीपी एवं बलूच विद्रोहियों से निपटने में मुनीर की नाकामी ही उनकी राह में बचे हुए कुछ कांटे शेष हैं।
(लेखक पूर्व राजनयिक हैं)











