अशोक कुमार। नोएडा हिंसा मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा कार्यकर्ता आकृति चौधरी के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत की गई गिरफ्तारी निरस्त करने का हालिया निर्णय कानून-व्यवस्था, प्रशासन की जिम्मेदारी और सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े कुछ गंभीर प्रश्न भी खड़े करता है और शायद इसीलिए सरकार ने इस निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने राज्य की ओर से प्रस्तुत कहानी को 'गढ़ी हुई कहानी' बताया, प्रशासन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों पर सवाल उठाए और याचिकाकर्ता को पांच लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया और वह भी नोएडा के अधिकारियों और विशेष रूप से जिलाधिकारी से।

इस पर कोई विवाद नहीं हो सकता कि संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन करने का अधिकार देता है। लोकतंत्र में लोग प्रदर्शन कर सकते हैं और अपनी शिकायतें सरकार तथा प्रशासन के सामने रख सकते हैं। शांतिपूर्ण प्रदर्शन और हिंसक जमावड़े में अंतर है। जब कोई प्रदर्शन पत्थरबाजी, आगजनी, तोड़फोड़, सार्वजनिक या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, पुलिस पर हमला करने या आम नागरिकों में भय पैदा करने में बदल जाता है, तब वह केवल विरोध का माध्यम नहीं रह जाता। वह गंभीर कानून-व्यवस्था की समस्या बन जाता है, जिसे नियंत्रित करना राज्य का दायित्व है।

नोएडा की घटना को केवल एक सामान्य श्रमिक आंदोलन के रूप में नहीं देखा जा सकता। इस हिंसा में 100 से अधिक वाहनों को नुकसान पहुंचाया गया, 50 से अधिक फैक्ट्रियों में तोड़फोड़ हुई और पुलिस वाहनों सहित कई वाहनों को आग के हवाले किया गया। जब कोई बड़ा समूह हिंसक हो जाता है, तब पुलिस मूकदर्शक बनकर खड़ी नहीं रह सकती। पुलिस का पहला दायित्व मानव जीवन, सार्वजनिक संपत्ति और निजी संपत्ति की रक्षा करना तथा हिंसा को और फैलने से रोकना है।

किसी वैध मांग के नाम पर शुरू हुए प्रदर्शन को इस आधार पर हिंसक बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती कि उसकी शुरुआत एक जायज मांग से हुई थी। बड़े स्तर पर होने वाली पत्थरबाजी, पुलिस वाहनों पर हमले, आगजनी और सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करने वाली घटनाएं सामान्यतः अचानक नहीं होतीं। इसके पीछे पहले से तैयारी, लोगों को संगठित करना और सुनियोजित रणनीति भी हो सकती है। जो लोग ऐसी हिंसा की योजना बनाते हैं, उसे उकसाते हैं या उसके लिए वैचारिक समर्थन तैयार करते हैं, उनकी भूमिका भी उतनी ही गंभीरता से जांची जानी चाहिए, जितनी उन लोगों की, जो जमीन पर जाकर हिंसा करते हैं। अपराध की योजना बनाने और अंजाम देने में सहयोग करने वालों की भूमिका भी कानून की नजर में महत्वपूर्ण होती है।

यदि किसी व्यक्ति पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया जाता है तो राज्य को उस व्यक्ति और हिंसा के बीच संबंध स्थापित करने के लिए विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे। रासुका जैसी निरोधात्मक गिरफ्तारी एक असाधारण शक्ति है और इसे सामान्य आपराधिक जांच या अभियोजन का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। यदि आकृति चौधरी के खिलाफ पर्याप्त प्रमाण नहीं थे तो न्यायिक हस्तक्षेप स्वाभाविक था, पर यह मानना कठिन है कि प्रशासन का कोई व्यक्तिगत हित किसी कार्यकर्ता पर रासुका लगाने या उसे जेल भेजने में हो सकता है। साक्ष्य या प्रक्रिया में कमी हो सकती है, पर इसका यह अर्थ नहीं कि कानून-व्यवस्था को लेकर प्रशासन की चिंता पूरी तरह निराधार बता दी जाए।

ऐसा प्रतीत होता है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाते समय एक पक्ष पर अधिक ध्यान गया, जबकि दूसरे पक्ष यानी नागरिकों के जीवन, संपत्ति और सुरक्षा की राज्य की जिम्मेदारी को माननीय न्यायालय द्वारा उतनी गंभीरता से नहीं देखा गया। हमें उन परिस्थितियों को सामान्य नहीं बनने देना चाहिए, जिनमें सड़कें, औद्योगिक क्षेत्र, सरकारी संस्थान या पुलिस प्रतिष्ठान भीड़ की हिंसा के केंद्र बन जाएं। भारत जैसी बड़ी और विविध लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून के हाथों को कमजोर करने की कोई भी प्रवृत्ति गंभीर परिणाम ला सकती है।

सरकार के फैसलों को लेकर विरोध हो सकता है, लेकिन किसी विचारधारा के नाम पर वाहन जलाने को उचित नहीं ठहराया जा सकता। पुलिसकर्मियों पर हमला किसी राजनीतिक मत का हिस्सा नहीं हो सकता। फैक्ट्रियों और सार्वजनिक संपत्ति में तोड़फोड़ लोकतांत्रिक अधिकार नहीं है। हिंसक भीड़ के सामने खड़े पुलिस अधिकारी को यह तय करना होता है कि सामने मौजूद स्थिति से लोगों की जान और संपत्ति को कितना खतरा है और उसे रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए। यदि भीड़ पत्थर बरसा रही है, वाहनों में आग लगा रही है या पुलिस पर हमला कर रही है तो कानून-व्यवस्था बहाल करना उसका दायित्व है।

यदि किसी अधिकारी ने शक्ति का दुरुपयोग किया है तो उसकी जांच होनी चाहिए। यदि साक्ष्य गढ़े गए हैं तो इसकी निंदा होनी चाहिए। यदि किसी को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया है तो उसे न्याय मिलना चाहिए। यही लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन बड़ी संख्या में हुई हिंसा को बाद में लोकतांत्रिक विरोध का वैध रूप भी नहीं माना जा सकता। इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के चलते यदि पुलिस प्रशासन को यह महसूस होने लगे कि हिंसा के खिलाफ दृढ़ कार्रवाई करना उस पर भारी पड़ सकता है तो इससे सड़क पर कानून तोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है, अधिकारी निर्णय से डरेंगे और अंततः राज्य की वैधानिक प्रभावशीलता ही कमजोर होगी।

लोकतांत्रिक राज्य को असहमति सहनी चाहिए, लेकिन अराजकता के सामने आत्मसमर्पण नहीं। पुलिस संयमित हो, लेकिन पंगु नहीं, प्रशासन जवाबदेह हो, लेकिन असहाय नहीं और न्यायपालिका व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करे, लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था की उस बुनियाद को कमजोर किए बिना, जिस पर लोकतंत्र स्वयं खड़ा है। जिस दिन लोकतांत्रिक विरोध और अराजकता के बीच की रेखा मिट जाएगी, नुकसान केवल पुलिस, प्रशासन या न्यायपालिका का नहीं होगा। पूरे देश को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।

(लेखक उत्तराखंड के डीजीपी रहे हैं)