ब्राजील, रूस, भारत और चीन के लिए गढ़े गए शब्द ब्रिक में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद ब्रिक्स के नाम से चर्चित इस संगठन का शिखर सम्मेलन एक ऐसे समय भारत में हो रहा है, जब ऐसे किसी समूह की आवश्यकता और बढ़ गई है। इसका एक बड़ा कारण पश्चिम और विशेष रूप से उसका नेतृत्व कर रहे अमेरिका का मनमाना रवैया है। जब करीब एक दर्जन सदस्य देशों के साथ अन्य विकासशील देश इस संगठन का प्रभाव बढ़ता हुआ देख रहे हैं और उसे बढ़ाने की आवश्यकता जता रहे हैं, तब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम का यह कहना राजनीतिक संकीर्णता ही है कि आखिर ब्रिक्स सम्मेलनों से भारत को क्या लाभ मिला है?

लगता है वे इसे स्मरण नहीं करना चाहते कि इस संगठन ने मनमोहन सरकार के समय आकार लिया था। मनमोहन सिंह ने इसके पहले और दूसरे सम्मेलन में भाग भी लिया था। उस समय तो चिदंबरम मनमोहन सरकार में मंत्री भी थे। आखिर उन्होंने इसके पहले यह क्यों नहीं पूछा कि इस संगठन से भारत को क्या लाभ मिल रहा है? मनमोहन सरकार में वित्त मंत्री होने के नाते तो उन्हें खास तौर पर यह प्रश्न करना चाहिए था। यह अच्छा हुआ कि उन्हें उनकी ही पार्टी के नेता शशि थरूर ने जवाब दिया। पता नहीं इससे उन्हें ब्रिक्स की महत्ता समझ आएगी या नहीं, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि इस संगठन का और प्रभावी रूप में उभरना भारत के साथ विकासशील देशों के हित में है। यह सही है कि इस संगठन के सामने चुनौतियां भी हैं, लेकिन इसी के साथ उसके पास तमाम अवसर भी हैं।

ब्रिक्स के समक्ष अवसरों की कमी इसलिए नहीं, क्योंकि सदस्य देश दुनिया की लगभग आधी आबादी और क्रय क्षमता के हिसाब से वैश्विक जीडीपी के करीब 40 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस मायने में ब्रिक्स समूह जी-7 से आगे है। पिछले कुछ समय में यह संगठन ग्लोबल साउथ कहे जाने वाले देशों की आवाज के साथ अपने न्यू डेवलपमेंट बैंक के जरिये डालर पर निर्भरता घटाने के मंच के रूप में उभरा है।

देखना यह है कि दिल्ली में आयोजित बिक्स सम्मेलन में सदस्य और सहयोगी देश अपने मतभेदों को भुलाकर आपसी व्यापार को कितना आगे ले जाने की कोई ठोस रूपरेखा बना पाते हैं? ऐसी रूपरेखा इसलिए बननी चाहिए, क्योंकि इससे ही इस संगठन की अहमियत बढ़ेगी। आज जब अनेक देश आर्थिक, व्यापारिक और कूटनीतिक मामलों में पश्चिमी विश्व का नेतृत्व कर रहे अमेरिका की चौधराहट से परेशान हैं, तब यदि ब्रिक्स देश अपनी-अपनी मुद्राओं के जरिये आपसी व्यापार को बढ़ाने के लिए सहमत हो जाते हैं तो यह एक बड़ी उपलब्धि होगी। यह समय की मांग है कि ब्रिक्स देश आपसी सहयोग के जरिये अपनी सच्ची एकजुटता का प्रदर्शन करें।