ब्रिक्स के नई दिल्ली घोषणापत्र पर सहमति बनना इसलिए एक उपलब्धि और भारत का कूटनीतिक कद बढ़ाने वाली है, क्योंकि यह माना जा रहा था कि सदस्य देशों और विशेष रूप से ईरान और सऊदी अरब एवं यूएई में मतभेदों के कारण ऐसा होना कठिन है। इसके बाद भी भारत सभी देशों को साथ लाने में सफल रहा। इसके पहले भारत अपनी अध्यक्षता वाले जी-20 शिखर सम्मेलन में भी सभी देशों के बीच सहमति बनाने में सफल रहा था, जबकि यूक्रेन युद्ध के कारण अमेरिका और यूरोप के देश रूस के विरुद्ध तीखे तेवर अपनाए हुए थे।

यह सही है कि साझा घोषणापत्र में पश्चिम एशिया संकट को लेकर जो कुछ कहा गया, उसमें किसी देश का नाम नहीं लिया गया, लेकिन यह सामान्य बात नहीं कि अमेरिकी हमलों के जवाब में जो ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात पर मिसाइलें दागता रहता है, वह भी साझा बयान जारी करने के लिए सहमत हुआ। इतना ही नहीं, ब्रिक्स सम्मेलन के चलते ईरान और यूएई के प्रतिनिधियों ने आपस में बात भी की।

कुल मिलाकर भारत ने यह दिखाया कि उसमें एक दूसरे के खिलाफ खड़े देशों के बीच भी सहमति बनाने का कूटनीतिक कौशल है। अपने इस कूटनीतिक कौशल के कारण ही भारत क्वाड का सदस्य है तो ब्रिक्स और एससीओ का भी। यह स्थिति भारत को विशिष्ट बनाती है और विश्व का ध्यान उसकी ओर खींचती है।ब्रिक्स सम्मेलन में बनी सहमति इसका परिचायक है कि भारत सदस्य देशों के बीच यह भाव जगाने में सफल रहा कि विफल होते संयुक्त राष्ट्र के कारण यदि इस संगठन को सशक्त बनाना है तो उन्हें मतभेदों को किनारे कर आपसी सहयोग पर जोर देते हुए एकजुट होना होगा।

अच्छा होगा कि इस संगठन के सदस्य और सहयोगी देश यह समझें कि आपसी सहमति केवल कागज तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए। नई दिल्ली घोषणापत्र पर केवल ईरान, सऊदी अरब और यूएई को ही ध्यान नहीं देना होगा, बल्कि चीन को भी ऐसा ही करना होगा, क्योंकि इसमें पहलगाम हमले का उल्लेख करते हुए आतंकवाद पर दोहरा मानदंड अपनाने की प्रवृत्ति को रेखांकित किया गया है। यह किसी से छिपा नहीं कि चीन इस प्रवृत्ति का प्रदर्शन करता रहा है।

घोषणापत्र की इन बातों पर चीन के साथ रूस को भी गौर करना होगा कि हर देश की संप्रभुता का सम्मान किया जाना चाहिए। यदि ब्रिक्स देश अपने घोषणापत्र के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता नहीं दिखाते तो फिर अन्य देशों और संगठनों से यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि वे अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करें। वास्तव में ब्रिक्स को यह आत्मसात करने की सख्त जरूरत है कि घोषणापत्र पर सहमति बनाने से कहीं अधिक आवश्यक उसके अनुरूप कार्य करना है। इससे ही ब्रिक्स अपने उद्देश्यों में सफल होगा और पश्चिमी देशों के प्रभुत्व वाली विश्व व्यवस्था का विकल्प बन सकेगा।