संपादकीय: ब्रिक्स की राह
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन सहयोग की भावना के साथ संपन्न हुआ, जिसमें भारत ने सदस्य देशों के बीच संतुलन साधने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई
HighLights
भारत ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में संतुलन साधकर सहयोग की राह खोली।
चीन ने पारंपरिक रवैया छोड़ संयमित होकर सहयोग का मार्ग अपनाया।
ब्रिक्स को सशक्त कर वैश्विक व्यवस्था को बहुध्रुवीय बनाने पर सहमति।
ब्रिक्स का समापन जिस सहयोग भाव से हुआ, वह भारत के लिए भी एक उपलब्धि है और सदस्य देशों के लिए भी। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन अपना संयुक्त घोषणापत्र इसीलिए जारी कर सका, क्योंकि भारत सभी देशों के बीच संतुलन साधने में सफल रहा। यह सफलता इसलिए भी संभव हो सकी, क्योंकि सदस्य देशों ने सकारात्मक रवैये का परिचय देकर किसी सहमति पर पहुंचना आवश्यक समझा।
ब्रिक्स देशों की यह भावना ही इस संगठन के भविष्य की राह को सशक्त करेगी। ब्रिक्स सम्मेलन में चीन का रवैया भी उसके पारंपरिक चरित्र की तुलना में कहीं अधिक संयमित और सहयोग भाव वाला दिखा। इसके पीछे एक कारण अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में हो रहा परिवर्तन भी है। बदलती परिस्थितियों में चीन ने ब्रिक्स को मजबूत बनाना आवश्यक समझा तो इसीलिए कि वह भी यह समझ रहा है कि एक वैश्विक विकल्प तैयार करने की आवश्यकता है।
इस सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति के आगमन को लेकर जो अनिश्चितता बनी हुई थी, वह न केवल समाप्त हुई, बल्कि चीनी राष्ट्रपति ने बहुपक्षीय विषयों के अलावा भारत के साथ द्विपक्षीय मुद्दों पर भी चर्चा की। यह चर्चा इसलिए उम्मीद जगाती है, क्योंकि चीनी राष्ट्रपति ने मतभेदों का सम्मान करते हुए सहयोग भाव विकसित करने की बात कही। इस क्रम में भारतीय प्रधानमंत्री ने यह कहने में संकोच नहीं किया कि किसी भी देश को दुर्लभ खनिजों और तकनीक को अपना हथियार नहीं बनाना चाहिए।
यह सीधे तौर पर चीन की ओर संकेत था। इस संकेत के बावजूद चीन की ओर से कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया सामने न आना एक शुभ संकेत है।
यदि ब्रिक्स को वास्तव में एक सक्षम संगठन बनाना है तो चीन के साथ-साथ रूस को भी भारत के प्रति लचीला रवैया अपनाना होगा। चीन और रूस के लिए यह भी आवश्यक है कि वे भारत के साथ अपने व्यापार घाटे को कम करने के लिए सक्रिय हों। ऐसा करके ही ब्रिक्स के ये तीनों प्रमुख स्तंभ ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे सदस्य देशों के साथ मिलकर ब्रिक्स को एक नया आकार दे सकते हैं। इसके जरिये ही वे ग्लोबल साउथ के हितों की रक्षा करने के साथ ही वैश्विक व्यवस्था को भी बहुध्रुवीय भी बना सकते हैं।
इस पर चीन और रूस के दृष्टिकोण में कुछ भिन्नता भले ही हो, लेकिन वे भी भारत की तरह इन उद्देश्यों की प्राप्ति करना चाहते हैं। एक बेहतर विश्व की परिकल्पना तभी साकार हो सकती है, जब ब्रिक्स के सभी सदस्य देश अपने स्तर पर इस संगठन को सहयोग देने के लिए तत्पर रहेंगे। ब्रिक्स में विभिन्न विषयों पर जो सहमति बनी, उन्हें आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। इससे ही यह संगठन अपने समक्ष उपस्थित चुनौतियों का सही तरह से सामना करने के साथ विश्व को राह भी दिखा सकेगा।











