विचार: स्वतंत्रता और अराजकता में अंतर करे न्यायपालिका
लगभग 77 वर्ष बाद यह चेतावनी एक नए सवाल के साथ हमारे सामने है
HighLights
डॉ. आंबेडकर की 'अराजकता के व्याकरण' चेतावनी आज भी महत्वपूर्ण।
न्यायपालिका वैध असहमति और आपराधिक आचरण में स्पष्ट भेद करे।
अनुच्छेद 142 का प्रयोग अपवाद रहे, सामान्य अपेक्षा नहीं।
हरबंश दीक्षित। संविधान सभा में अपने अंतिम संबोधन में डा. भीमराव आंबेडकर ने भारतीय लोकतंत्र के लिए एक ऐसी चेतावनी दी थी, जिसकी प्रासंगिकता आज भी न केवल बनी हुई है, बल्कि बढ़ भी गई है। उनका कहना था कि जब अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए संवैधानिक रास्ते उपलब्ध हों, तब असंवैधानिक साधनों का सहारा लेना 'ग्रामर आफ अनार्की' यानी अराजकता का व्याकरण है।
लगभग 77 वर्ष बाद यह चेतावनी एक नए सवाल के साथ हमारे सामने है। नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए वैध असहमति और कानून-विरुद्ध सामूहिक दबाव के बीच सीमा कैसे स्पष्ट रखी जाए और क्या ग्रामर आफ अनार्की से बचने की कोशिश में हम कहीं 'जुरिस्प्रूडेंस आफ अनार्की' अर्थात अराजकता के विधिशास्त्र की ओर तो नहीं बढ़ रहे हैं? हाल की कुछ घटनाओं से यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है। यह कोई स्थापित विधिशास्त्रीय अवधारणा नहीं, बल्कि एक चेतावनीपूर्ण रूपक है। इसका आशय उस स्थिति की आशंका से है, जिसमें सामूहिक असहमति की रक्षा करते-करते व्यक्तिगत कानूनी उत्तरदायित्व कमजोर पड़ने लगे।
पहली बात स्पष्ट है कि असहमति अराजकता नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति तथा शांतिपूर्ण और निरस्त्र सभा की स्वतंत्रता देता है। सरकार की आलोचना, नीतियों का विरोध, धरना, नारे और जनमत निर्माण लोकतंत्र के स्वाभाविक अंग हैं। सत्ता से प्रश्न करना लोकतंत्र-विरोध नहीं, उसकी अनिवार्य शर्त है। जिस व्यवस्था में असहमति के लिए पर्याप्त जगह न हो, वहां स्वतंत्रता संविधान के पन्नों पर भले सुरक्षित रहे, सार्वजनिक जीवन में उसका अर्थ क्षीण होने लगता है, लेकिन स्वतंत्रता कानून से ऊपर नहीं हो सकती। शांतिपूर्ण प्रदर्शन और हिंसा, आलोचना और भय, राजनीतिक लामबंदी और सार्वजनिक संपत्ति के विनाश के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है।
किसी आंदोलन में शामिल होना अपने आप में अपराध नहीं हो सकता, लेकिन आंदोलन की आड़ में किया गया विशिष्ट अपराध सामूहिकता के कारण अपराधमुक्त भी नहीं हो सकता। इसी कसौटी पर एक सितंबर के सर्वोच्च न्यायालय के उस निर्णय को देखना चाहिए, जिसमें 20 से 25 जुलाई के बीच छात्र-प्रदर्शनों से जुड़ी एफआइआर को अनुच्छेद 142 के तहत समाप्त कर दिया गया। न्यायालय ने छात्रों के भविष्य और प्रदर्शन की शांतिपूर्ण प्रकृति को ध्यान में रखते हुए अपनी असाधारण संवैधानिक शक्ति का प्रयोग किया। साथ ही 2,873 व्यक्तियों से संबंधित गंभीर आपराधिक आरोपों की जांच का रास्ता खुला रखा।
इस निर्णय का महत्वपूर्ण पक्ष यही है कि न्यायालय ने सामूहिक प्रदर्शन और व्यक्तिगत आपराधिक आचरण के बीच अंतर बनाए रखा।
प्रदर्शन में भागीदारी और किसी व्यक्ति द्वारा किया गया विशिष्ट अपराध एक ही बात नहीं है। लोकतंत्र में इस अंतर को बचाए रखना उतना ही जरूरी है जितना असहमति के अधिकार की रक्षा करना, लेकिन निर्णय से अनुच्छेद 142 की सीमा को लेकर बड़ा संवैधानिक प्रश्न भी उठता है। सर्वोच्च न्यायालय को 'पूर्ण न्याय' की शक्ति इसलिए दी गई है कि असाधारण परिस्थितियों में संभवत: सामान्य कानूनी उपाय पर्याप्त न हों। हालांकि यह कानून का विकल्प नहीं, न्याय की पूरक शक्ति है। इसका प्रयोग किसी विशिष्ट अन्याय को दूर कर सकता है, लेकिन ऐसा सामान्य सिद्धांत नहीं बना सकता जिससे कानून की बाध्यता या व्यक्तिगत आपराधिक उत्तरदायित्व कमजोर पड़े।
पूर्ण न्याय का अर्थ कानून को पीछे छोड़ना नहीं, बल्कि मामले की विशिष्टता और विधि के सामान्य अनुशासन के बीच संतुलन बनाना है। अनुच्छेद 142 की विश्वसनीयता इसी में है कि उसका असाधारण प्रयोग अपवाद रहे, सामान्य अपेक्षा न बने। यदि किसी विशेष परिस्थिति में दी गई राहत को आगे चलकर हर सामूहिक आंदोलन के लिए कानूनी प्रतिरक्षा की तरह देखा जाने लगे, तो न्यायिक अपवाद धीरे-धीरे सामान्य अपेक्षा बन सकता है। तब सामूहिकता व्यक्तिगत उत्तरदायित्व पर हावी होने लगेगी और कानून की समान बाध्यता का सिद्धांत कमजोर पड़ेगा, पर राज्य के लिए भी तो यही कसौटी है। यदि हर सामूहिक विरोध को संभावित अराजकता मानकर कठोरता से नियंत्रित किया गया, तब कानून-व्यवस्था के नाम पर संवैधानिक स्वतंत्रता का दायरा सिकुड़ जाएगा।
कानून का शासन केवल व्यवस्था बनाए रखने का माध्यम नहीं, वह नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा की संवैधानिक व्यवस्था भी है।
स्पष्ट है कि न्यायपालिका की भूमिका सबसे कठिन है। उसे यह परखना होगा कि राज्य की कार्रवाई वास्तविक कानून-व्यवस्था की आवश्यकता से प्रेरित है या असहमति को दबाने से और साथ ही यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी आंदोलन की सामूहिक पहचान किसी व्यक्ति के विशिष्ट अपराध की ढाल न बन जाए। न्यायिक उदारता का अर्थ उत्तरदायित्व से छूट नहीं और न्यायिक कठोरता का अर्थ स्वतंत्रता का संकुचन नहीं। न्यायपालिका की विश्वसनीयता इसी में है कि वह राज्य और नागरिक, दोनों को संविधान की एक ही कसौटी पर तौले।
यही लोकतंत्र का मूल द्वंद्व है कि कानून के बिना स्वतंत्रता अराजकता में बदल सकती है और स्वतंत्रता के बिना कानून दमन का औजार। राज्य की शक्ति इतनी न बढ़े कि विरोध की आवाज दब जाए और स्वतंत्रता इतनी निरंकुश न हो कि कानून की बाध्यता ही संदिग्ध हो जाए। 'जुरिस्प्रूडेंस आफ अनार्की' का रूपक इसी संभावित असंतुलन के प्रति चेतावनी है। इसका आशय आंदोलन को अराजक कहना नहीं, बल्कि उस स्थिति से सावधान करना है, जिसमें सामूहिक असहमति के नाम पर निजी उत्तरदायित्व और न्यायिक अपवाद के नाम पर कानून की सामान्य बाध्यता कमजोर पड़ने लगे।
डॉ. आंबेडकर की चेतावनी नागरिकों के लिए ही नहीं, राज्य और संवैधानिक संस्थाओं के लिए भी है। नागरिकों को अपने अधिकारों के साथ जुड़ी जिम्मेदारी स्वीकारनी होगी तो राज्य को असहमति के संवैधानिक अधिकार की रक्षा करनी होगी, वहीं न्यायपालिका को सुनिश्चित करना होगा कि असाधारण शक्ति न्याय का साधन बने, कानून से ऊपर जाने का माध्यम नहीं। लोकतंत्र की परिपक्वता इसी संतुलन में है कि विरोध का अधिकार सुरक्षित रहे, लेकिन उत्तरदायित्व की कीमत पर नहीं और न्याय मिले, लेकिन अपवाद नियम न बन जाए।
(लेखक विधि विशेषज्ञ हैं)











