प्रख्यात वैज्ञानिक और प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार परिषद के प्रमुख प्रो. चिंतामणि नागेश रामचंद्र राव को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्‍‌न देने की घोषणा से वैज्ञानिकों में हर्ष की लहर दौड़ गई है। सोलिड स्टेट और मेटीरियल केमिस्ट्री के क्षेत्र में सीएनआर राव की पूरी दुनिया में धाक है। इस क्षेत्र में उनका योगदान इस तथ्य से स्पष्ट हो जाता है कि उनके 1400 शोध पत्र और 45 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। विश्व के अनेक प्रमुख वैज्ञानिक शोध संस्थानों ने प्रो. राव को अपने संस्थान की सदस्यता के साथ-साथ फेलोशिप भी दी है। उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं।

वास्तव में जो ऊंचाई सचिन तेंदुलकर ने क्रिकेट में हासिल की है, वही प्रो. राव ने विज्ञान के क्षेत्र में हासिल की है। सचिन ने एक बल्लेबाज के रूप में 100 अंतरराष्ट्रीय शतक जड़े हैं तो राव भी ऐसे पहले भारतीय हैं जो शोध कार्य के क्षेत्र में सौ के एच-इंडेक्स में पहुंचे हैं। राव ने इस साल अप्रैल में एच-इंडेक्स तक पहुंचने वाले पहले भारतीय होने का गौरव हासिल किया। राव की इस उपलब्धि से पता चलता है कि उनके प्रकाशित शोध कायरें का दायरा कितना व्यापक है। परमाणु शक्ति संपन्न होने और अंतरिक्ष में उपस्थिति दर्ज करा चुकने के बावजूद विज्ञान के क्षेत्र में हम अन्य देशों की तुलना में काफी पीछे हैं। वैज्ञानिकों-इंजीनियरों की संख्या के अनुसार भारत का विश्व में तीसरा स्थान है, लेकिन वैज्ञानिक शोध और साहित्य में पश्चिमी वैज्ञानिकों का बोलबाला है। ऐसे समय में प्रो. राव ने पश्चिम के एकाधिकार को तोड़ते हुए शोध और अनुसंधान के क्षेत्र में भारत का नाम रोशन किया।

प्रो. सीएनआर राव का जन्म 30 जून 1934 को बेंगलूर में हुआ था। 1951 में मैसूर विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद बीएचयू से मास्टर डिग्री ली। अमेरिकी पोडरू यूनिवर्सिटी से पीएचडी करने के बाद 1961 में मैसूर विश्वविद्यालय से डीएससी की डिग्री हासिल की। 1963 में आइआइटी कानपुर के रसायन विभाग से फैकल्टी के रूप में जुड़कर कॅरियर की शुरुआत की। 1984-1994 के बीच इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के निदेशक रहे। वह ऑक्सफोर्ड, कैंब्रिज समेत अनेक विश्वविद्यालयों में विजिटिंग प्रोफेसर रहे हैं। प्रो. राव इंटरनेशनल सेंटर ऑफ मेटीरियल साइंस के भी निदेशक रहे। रसायन शास्त्र पर गहरी पकड़ रखने वाले राव फिलहाल बेंगलूर स्थित जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिचर्स में कार्यरत हैं। डॉ. राव ने देश की वैज्ञानिक नीतियों को बनाने में भी अहम भूमिका निभाई है।

एक वैज्ञानिक के रूप में प्रो. राव के पांच दशकों के कॅरियर में 1400 से अधिक शोध-पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। दुनियाभर की प्रमुख वैज्ञानिक संस्थाएं रसायन शास्त्र के क्षेत्र में उनकी मेधा का लोहा मानती हैं। वह उन चुनिंदा वैज्ञानिकों में हैं जो विश्व की अधिकांश प्रमुख वैज्ञानिक अकादमियों के सदस्य हैं। राव को दुनिया के 60 विश्वविद्यालयों से डॉक्टरेट की मानद उपाधि मिल चुकी है और भारतीय वैज्ञानिक समुदाय में वह एक आइकन की तरह देखे जाते हैं। किसी वैज्ञानिक के मूल्यांकन के लिए उसका एच-इंडेक्स ही काफी नहीं है, बल्कि उसके कितने शोध-पत्रों का दृष्टांत के रूप में उल्लेख किया गया है यह भी बहुत मायने रखता है। इस मामले में भी प्रो. राव दुनिया के चुनिंदा वैज्ञानिकों में ऐसे एकमात्र भारतीय हैं जिनके शोध-पत्रों का दृष्टांत के तौर पर वैज्ञानिकों ने लगभग 50 हजार बार उल्लेख किया है।

प्रो. राव ठोस अवस्था, संरचनात्मक और भौतिक रसायन के क्षेत्र में दुनिया के जाने-माने रसायन शास्त्री हैं। भारत सरकार ने उन्हें 1974 में पदमश्री और 1985 में पदमविभूषण से सम्मानित किया। 2000 में रायल सोसायटी ने उन्हें ह्युजेज पुरस्कार से सम्मानित किया। भारत-चीनी विज्ञान सहयोग को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाने के लिए उन्हें इसी साल जनवरी, 2013 में चीन के सर्वश्रेष्ठ विज्ञान पुरस्कार से सम्मानित किया गया। प्रो. राव ने ट्रांजीशन मेटल ऑक्साइड सिस्टम, मेटल-इंसुलेटर ट्रांजीशन, सीएमआर मेटीरियल, सुपरकंडक्टिविटी, मल्टीफेरोक्,ि हाइब्रिड मेटीरियल, नैनोट्यूब, ग्राफीन, नेनोमेटीरियल और हाइब्रिड मेटीरियल के क्षेत्र में काफी शोध और अनुसंधान कार्य किए। उन्होंने पदार्थ के गुणों और उनकी आणविक संरचना के बीच बुनियादी समझ विकसित करने में अहम भूमिका निभाई है।

भारत को अंतरिक्ष विज्ञान में बुलंदी पर पहुंचाने वाले मंगल अभियान में भी उन्होंने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। विज्ञान के क्षेत्र में भारत की नीतियों के निर्धारण में अहम भूमिका निभाने वाले राव प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की वैज्ञानिक सलाहकार परिषद के भी सदस्य थे। इसके बाद वह प्रधानमंत्री राजीव गांधी, एचडी देवेगौड़ा और आइके गुजराल के कार्यकाल में भी परिषद से जुड़े रहे। दुनिया में अब वैज्ञानिक और तकनीकी ज्ञान आर्थिक स्नोत के उपकरण बन गए हैं। किसी भी देश की वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता उसकी आर्थिक प्रगति का पैमाना मानी जाती है। दुनिया के ज्यादातर विकसित देश वैज्ञानिक शोध को बढ़ावा देने के लिए अपने रिसर्च फंड का 30 प्रतिशत तक विश्वविद्यालयों को देते हैं, मगर अपने देश में यह आंकड़ा सिर्फ छह प्रतिशत है। उस पर ज्यादातर विश्वविद्यालयों के अंदरूनी हालात ऐसे हो गए हैं कि वहां शोध के लिए स्पेस काफी कम रह गया है। वैज्ञानिक शोध पत्रों के प्रकाशन में भी भारत की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। इसे सुधारने के लिए सरकार को तुरंत ध्यान देना होगा। देश में प्रो. सीएनआर राव जैसे वैज्ञानिक पैदा करने के लिए वैज्ञानिक शोध के लिए नया माहौल और समुचित फंड देने की जरूरत है। विज्ञान के क्षेत्र में प्रो. सीएनआर राव का योगदान अभूतपूर्व है और उन्हें देश का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्‍‌न देने के फैसले से वैज्ञानिक शोध और अनुसंधान को प्रोत्साहन मिलेगा। इससे देश में वैज्ञानिक चेतना का वातावरण बनाने में भी मदद मिलेगी।

[लेखक शशांक द्विवेदी, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं]

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