जगतबीर सिंह। आपरेशन सिंदूर के दौरान जब भारतीय सैन्य बल पाकिस्तान को सबक सिखाने में जुटे हुए थे तो चीन की ओर से उसे पूरी मदद मिल रही थी। केवल सैन्य स्तर पर ही नहीं, बल्कि पाकिस्तानी प्रोपेगंडा को आगे बढ़ाने में भी चीनी मीडिया पुरजोर प्रयासों में लगा था। इसमें एक कारण उन चीनी हथियारों की कथित सफलता को रेखांकित करना भी था, जिनका इस्तेमाल पाकिस्तानी सेना कर रही थी।

पाकिस्तान को चीन के हथियारों से लेकर तकनीकी समर्थन का बढ़ता सिलसिला भारत की चुनौतियां बढ़ाने वाला है। उप सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल राहुल आर. सिंह ने हाल में चीन-पाकिस्तान की इस दुरभिसंधि के बारे में विस्तार से समझाया। उन्होंने बताया कि पाकिस्तान द्वारा इस्तेमाल किए गए ड्रोन के अलावा साइबर आपरेशन और नेटवर्क आधारित वारफेयर एलिमेंट्स पर चीनी सैन्य प्रतिष्ठान की छाप दिखी। उन्होंने यह भी कहा कि चीनी आइएसआर सिस्टम ने पाकिस्तानी सैन्य बलों को रियल टाइम डाटा, वस्तुस्थिति से जुड़ी जानकारियां और निगरानी क्षमताएं भी उपलब्ध कराईं। यहां तक कि मछली पकड़ने वाले चीनी बेड़े का इस्तेमाल भी भारतीय नौसेना पर नजर रखने के लिए किया गया, जबकि पाकिस्तानी नौसेना अपने तटों तक ही सीमित रही।

जब सैन्य अभियान महानिदेशक यानी डीजीएमओ स्तर पर वार्ता जारी थी तो पाकिस्तान की ओर से कहा गया कि हमें पता है कि आपके सैन्य संसाधन कहां, कितनी मात्रा में लगे हुए हुए हैं, इसलिए अनुरोध है कि उन्हें हटा लिया जाए। यह दर्शाता है कि पाकिस्तान के पास भारतीय सैन्य तैनाती से जुड़ी काफी सूचनाएं थीं, जो उसे किसी और से नहीं, बल्कि चीन द्वारा उपलब्ध कराई जा रही थीं।

आपरेशन सिंदूर चीनी रक्षा उद्योग के लिए अपनी क्षमताओं के परीक्षण का भी एक पड़ाव बना, जिसमें वास्तविक युद्ध की स्थिति में उसके उपकरणों की परख होनी थी। बीते पांच साल में पाकिस्तान द्वारा खरीदे गए रक्षा उपकरणों में करीब 81 प्रतिशत चीन से लिए गए। इस तरह चीन ने पाकिस्तान को अपनी प्रयोगशाला के रूप में इस्तेमाल किया, जिसमें उसके हथियारों का अन्य हथियार प्रणालियों के आगे प्रदर्शन दिख जाए। इससे सबक लेकर चीन अपनी रक्षा प्रणालियों को उन्नत बनाएगा, जिसका लाभ अंतत: पाकिस्तान जैसे खरीदारों को ही मिलेगा।

आपरेशन सिंदूर के दौरान भारत को एक साथ तीन मोर्चों पर जूझना पड़ रहा था। पाकिस्तान से तो सीधा मुकाबला था ही, चीन से हरसंभव सहयोग के अलावा तुर्किये से उसे ड्रोन एवं प्रशिक्षित कर्मियों के जरिये भी मदद मिली। हाल के वर्षों में चीन ने पाकिस्तान का लगभग हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर बचाव करते हुए उसे आधुनिक मिसाइलें और परमाणु तकनीक उपलब्ध कराई है। आपरेशन सिंदूर के दौरान तमाम हथियार प्रणालियों के अलावा चीनी बायडू नेविगेशन सिस्टम ने भी पाकिस्तान को बड़ी मदद पहुंचाई। इसमें पीएल-15 के लिए मिसाइल गाइडेंस जैसी सुविधा भी शामिल रही। यह दर्शाता है कि पाकिस्तानी सामरिक संचालन में चीनी प्रणालियों का सीधा जुड़ाव बढ़ रहा है।

कुछ रिपोर्ट यह इशारा भी करती हैं कि स्वीडिश साब 2000 एरिये एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (एईडब्ल्यूएंडसी) प्लेटफार्म की चीनी सिस्टम के साथ जुगलबंदी के जरिये भारतीय विमानों को निशाना बनाया गया। स्पष्ट है कि अलग-अलग स्रोतों वाली प्रणालियों को भी चीनी तकनीक के साथ जोड़कर उनका उपयोग किया जा रहा है। पाकिस्तान को पांचवीं पीढ़ी के जे-37 चीनी लड़ाकू विमान भी मिलने वाले हैं। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे-सीपैक के अंतर्गत भी चीन ने ग्वादर जैसे बंदरगाह के अलावा सामरिक महत्व का दूसरा इन्फ्रास्ट्रक्चर भी पाकिस्तान में विकसित किया है। यह पाकिस्तान की आर्थिकी के साथ ही उसकी सैन्य क्षमताओं को लाभ पहुंचाता है। अपनी भू-सामरिक भौगोलिक स्थिति को देखते हुए पाकिस्तान महाशक्ति बनने की चीनी महत्वाकांक्षाओं के लिहाज से महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह सीपैक और सामुद्रिक सिल्क रूट के जरिये बीजिंग को अहम कनेक्टिविटी उपलब्ध कराता है।

इस तथ्य को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि एक लंबे अर्से से चीन और पाकिस्तान के साथ भी भारत का सीमा विवाद चला आ रहा है। इस कारण अपनी क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए हमें सैन्य बलों की व्यापक तैनाती रखनी पड़ती है। गलवन संकट के बाद से तनातनी घटाने के कुछ प्रयास हुए हैं, लेकिन सैनिकों की वापसी पूरी तरह नहीं हो सकी है। आपरेशन सिंदूर के बाद से नियंत्रण रेखा पर भी संघर्ष विराम की धज्जियां उड़ती दिखीं। आपरेशन सिंदूर के दौरान चीन ने भी बिना कोई औपचारिक लक्ष्मण रेखा लांघे अपनी क्षमताओं को परखा। यह भारत की काट के लिए पाकिस्तान की सामरिक एवं पारंपरिक क्षमताओं को बढ़ाने की चीनी रणनीति में एक अहम मोड़ रहा। इन दोनों देशों की साठगांठ में कोई पर्दा शेष नहीं रहा।

आपरेशन सिंदूर के सबक स्पष्ट हैं कि भारत को खतरे के आकलन, सैन्य आधुनिकीकरण और परिचालन संबंधी प्रक्रियाओं को और दुरुस्त बनाना चाहिए। इसने भारत के सामरिक गुणा-गणित और रक्षा नियोजन जैसे पहलुओं को बुनियादी रूप से बदल कर रख दिया, क्योंकि दो मोर्चो पर लड़ाई कोई कपोल-कल्पना नहीं, बल्कि वास्तविकता का रूप लेती दिख रही है। इसलिए हमें अपनी आर्थिकी को मजबूत बनाते हुए सैन्य क्षमताओं को सशक्त बनाना ही होगा। तभी सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी।

चीन-पाकिस्तान की जोड़ी और उनका जुड़ाव निरंतर खतरनाक होता जा रहा है। इसमें भी किसी को कोई संदेह नहीं कि इस क्षेत्र में चीन का भू-राजनीतिक फोकस भारत की राह में रोड़े बिछाने के लिए पाकिस्तान को अपने पिट्ठू के रूप में इस्तेमाल करते रहना है। आपरेशन सिंदूर ने यह भी दर्शाया कि नई लड़ाइयां पुराने तौर-तरीकों से नहीं लड़ी जाएंगी। अब सैन्य टकराव के साथ ही साइबर, आर्थिक, कानूनी, सूचना और छद्म युद्ध जैसे मोर्चों पर भी मुकाबला करना होगा। ऐसे परिदृश्य में चीन पर्दे के पीछे रहते हुए भी प्रमुख खिलाड़ी के रूप में अपने दांव आजमाता रहेगा। भारत के पास इन दोनों देशों की चुनौती का माकूल तोड़ निकालने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।

(लेखक सेवानिवृत्त मेजर जनरल और यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूशन आफ इंडिया में विशिष्ट फेलो हैं)