विचार : सतह पर आते इतिहास में गुम नायक, खिलजी को हराने वाले वीर राजा पृथु
यह आवश्यक है कि कोई भी समाज शत्रु-बोध के भाव का विश्लेषण करे। यह इसलिए आवश्यक है क्योंकि कभी अनजान स्रोतों से शिवाजी महाराज के बारे में मिथ्या मान्यताएं गढ़ी जाती हैं और कभी धर्मांध औरंगजेब को मंदिरों का संरक्षक बताने की चेष्टा होती है। इस पर आश्चर्य नहीं कि छद्म पंथनिरपेक्ष एवं यथास्थितिवादी वर्ग इतिहास के पुनर्लेखन का विरोधी है।
शिवेंद्र राणा। पिछले दिनों असम के मुख्यमंत्री ने गुवाहाटी के एक फ्लाईओवर को राजा पृथु के नाम समर्पित किया। इसके साथ ही 13वीं सदी के कामरूप (आज के असम) के राजा पृथु के बारे में लोगों की जिज्ञासा बढ़ी। इसलिए और बढ़ी, क्योंकि इतिहास में वे गुम से हैं और व्यापक राष्ट्रीय समाज के लिए अनजान। पृथु का पूरा नाम विश्वसुंदरदेव था। वे कामरूप यानी आज के असम के महानतम शासकों में से एक थे। उन्होंने 1185 से 1228 तक शासन किया।
उन्होंने अपने शासनकाल में दो आक्रांताओं- बख्तियार खिलजी और नसीरुद्दीन से लोहा लिया। नालंदा को नष्ट करने वाले खिलजी को तो उन्होंने बुरी तरह पस्त किया था। राजा पृथु जैसे न जाने कितने नायकों ने अपनी ही संततियों के समक्ष पहचान का संकट झेला। उनका विस्मरण कुछ ऐसा ही है जैसे सालार मसूद गाजी जैसे उत्पीड़क को मजार और नेजा मेले की शोहरत हासिल हो और उसके त्राण से मुक्ति दिलाने वाले राजा सुहेलदेव को शोध में तलाशने की कोशिश हो रही हो। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि इतिहास का निरूपण सदैव विजेताओं द्वारा किया जाता आया है।
होना यह चाहिए था कि स्वतंत्रता के बाद भारतीय इतिहासकार अपना इतिहास अपनी दृष्टि से लिखते, लेकिन भारत में पहले इस्लामिक आक्रांताओं, यूरोपीय गौरांग महाप्रभुओं के पश्चात वामपंथियों ने इतिहास लेखन में छल किया। कथित सामासिक संस्कृति के आवरण में वामपंथी इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास के संदर्भ और संदर्श तक दूषित कर दिए। साहित्य के नोबेल से सम्मानित सोवियत लेखक मिखाइल शोलोखोव अपने उपन्यास ‘एंड क्वाइट फ्लोज द डान’ में एक कज्जाक गीत का उल्लेख करते हैं, ‘हमारी धरती पर हलों की लीकें नहीं हैं।
हमारी धरती पर घोड़ों की टापों के निशान हैं और उसमें बीज नहीं, कज्जाकों के शीश बोए जाते हैं।’ शोलोखोव जैसी व्यथा भारत के लोगों की भी है। आक्रांताओं के घोड़ों की टापों ने उनका वैभव नष्ट किया और उनकी संस्कृति उजाड़ने का प्रयास किया। 1947 के बाद प्राप्त स्वशासन में भी यह बौद्धिक बेईमानी विद्यमान रही। वर्तमान में इतिहास का वास्तविक निरूपण राष्ट्रीय विचारों एवं सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप किए जाने का प्रयास किया जा रहा है। इसकी एक बानगी एनसीईआरटी की किताबों में दिख रही है। इसकी जरूरत इसलिए है, क्योंकि ऐतिहासिक व्याख्याओं का आधार सांस्कृतिक मूल्यों की वैध मान्यताएं होती हैं।
आज यदि हम लचित बरफुकन, सुहेलदेव, झलकारी बाई, दलदेव महाराज, महावीरादेवी भंगी, पन्नाधाय धानुक और अब राजा पृथु जैसे विस्मृत ऐतिहासिक नायकों के चरित्र से साक्षात्कार कर रहे हैं, तो यह भारतीय समाज के सांस्कृतिक जागरण में इतिहास बोध की चेतना के प्रसार का परिणाम है। विस्मृत हुए ये नायक भारत की चैतन्य राष्ट्रीयता का संबल हैं। वर्तमान में इतिहास को नए आयाम सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों ने भी दिया है। ऐसे सामाजिक आंदोलन नहीं होते तो हम उपरोक्त ऐतिहासिक नायक-नायिकाओं का नाम भी नहीं जानते। कुछ समय पहले लखनऊ में अवंती बाई लोधी की प्रतिमा पर माल्यार्पण के लिए भाजपा और सपा नेताओं के बीच जो होड़ दिखी, वह इतिहास-बोध की चैतन्यता ही प्रमाणित करती है, भले ही पृष्ठभूमि में राजनीतिक प्रेरणा हो।
यह इतिहास बनाने नहीं, उसे जीने का संदर्भ है। यदि इतिहास का सही संदर्भों में यथार्थ निरूपण न हो तो भावी पीढ़ियों को सर सैयद अहमद खान, इकबाल आदि के बारे में वही सब पढ़ने-सुनने को मिले, जो एक खास एजेंडे के तहत लिखा और प्रचारित किया गया। क्या यह किसी से छिपा है कि अलीगढ़ मूवमेंट पाकिस्तान के निर्माण का आधार बना? इतिहास का निर्धारण उचित मानकों पर हो और वह असत्य वाचन का कारक न बने। इतिहास का तो अर्थ ही है-ऐसा ही हुआ था। वामपंथियों ने भारतीय इतिहास पर अपना एजेंडा स्थापित किया और कथित सद्भाव प्रसार के नाम पर कल्पित कथाएं रचीं। डा. राम मनोहर लोहिया कहते थे, जो कत्ल करने वालों को अपना पूर्वज माने, उसका आत्मगौरव झूठा है।
यह आवश्यक है कि कोई भी समाज शत्रु-बोध के भाव का विश्लेषण करे। यह इसलिए आवश्यक है, क्योंकि कभी अनजान स्रोतों से शिवाजी महाराज के बारे में मिथ्या मान्यताएं गढ़ी जाती हैं और कभी धर्मांध औरंगजेब को मंदिरों का संरक्षक बताने की चेष्टा होती है। इस पर आश्चर्य नहीं कि छद्म पंथनिरपेक्ष एवं यथास्थितिवादी वर्ग इतिहास के पुनर्लेखन का विरोधी है। आखिर पहले के इतिहासकारों द्वारा ऐसा क्या छुपाया गया, जिसके प्रकटीकरण से संघर्ष पैदा हो सकता है?
इतिहास का यथार्थ विश्लेषण इसलिए और आवश्यक हो जाता है, ताकि दमन-अत्याचार की पीड़ा से गुजर चुका राष्ट्र अपना वास्तविक इतिहास जाने और भावी पीढ़ियों को सचेत करे, ताकि उसे पहले जैसी पीड़ा से न गुजरना पड़े। जनता की समझदारी पर संदेह करने का कोई कारण नहीं। तथ्यों को सत्यता के साथ रख दीजिए, जनता उसका विश्लेषण खुद कर लेगी। इसी संदर्भ में 30 दिसंबर, 1916 को ओहियो में गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर ने कहा था, “सिर्फ अपनी आदतों से मुक्ति ही नहीं, बल्कि तमाम गंदे इतिहास से मुक्ति के जरिए ही भविष्य की सभ्यता का परचम उठाया जा सकता है।”
(लेखक इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में परियोजना सहयोगी हैं)
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