विचार: रिश्तों को संवारने की नई पाठशाला, युवाओं को समझनी होगी जीवन की वास्तविकता
यदि कोई संबंध न चल रहा हो उससे अलग होना हो तो बेहतर है कि बच्चों को दुनिया में न लाया जाए। ‘तेरे-मेरे सपने’ जैसी पहल अच्छी है यदि वह युवाओं को जीवन की वास्तविकता बता सके। जीवन सिर्फ इंस्टाग्राम फेसबुक आदि पर कुछ शेयर करने या रील बनाने के लिए ही नहीं है। उसके अर्थ बहुत व्यापक हैं।
क्षमा शर्मा। देवानंद, मुमताज और चेतन आनंद अभिनीत एक हिट फिल्म आई थी-तेरे-मेरे सपने। इससे पहले देवानंद की ही फिल्म गाइड का गाना युवाओं की जुबान पर चढ़ गया था-तेरे-मेरे सपने अब एक रंग हैं। हालांकि पचास साल से अधिक के समय में बहुत कुछ बदल चुका है। संबंधों में भावुकता के मुकाबले ‘प्रेक्टिकलिटी’ ने स्थान बना लिया है। मामूली बातों पर संबंध खत्म हो रहे हैं। यदि किसी ने हैप्पी बर्थडे नहीं कहा तो भी ‘टाटा-बाय बाय’। वैवाहिक संबंधों में स्थायित्व तक नहीं रहा।
बच्चे भी अब संबंध टूटने की राह में रोड़ा नहीं बनते। पिछले दिनों एक स्त्री ने चार बच्चों के होते हुए भी चार बच्चों के पिता से शादी रचा ली। इसी तरह एक महिला नौ बच्चों के होते हुए भी अपने पुरुष मित्र के साथ चली गई। उसका सबसे छोटा बच्चा आठ-नौ महीने का था। वह रो-रोकर मां को पुकारता रहा, लेकिन वह नहीं रुकी। यही हाल पुरुषों का भी है। किसी और महिला से संबंध बनाने के चक्कर में वे बाल-बच्चों को छोड़कर चले जाते हैं। इसके अलावा संबंधों में हत्या भी जोर पकड़ रही है। कोई पत्नी को मार रहा है, कोई पति को, तो कोई लिव इन पार्टनर को।
हाल में इसी अखबार में खबर छपी कि ऐसी घटनाओं से महिला आयोग बहुत चिंतित है। इसलिए दस राज्यों के 24 शहरों में ऐसे संवाद केंद्र स्थापित किए जाएंगे, जहां विवाह से पहले युवक-युवती आपस में बातचीत कर सकें। इन केंद्रों का नाम होगा-तेरे-मेरे सपने। यहां युवाओं को मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक जिम्मेदारियों को लेकर जागरूक किया जाएगा। माना जा रहा है कि इससे विवाह में स्थायित्व आएगा। तलाक में कमी आएगी। घरेलू हिंसा भी रोकी जा सकेगी। महिला आयोग ने इन केंद्रों से जोड़े जाने वाले लोगों के लिए एक सिलेबस तैयार किया है।
उन्हें प्रशिक्षण भी दिया गया। मूल रूप से यह बातें बहुत अच्छी हैं, लेकिन ये सब पढ़ते हुए लगा कि क्या वाकई अब हमारे परिवारों में ऐसा कोई नहीं रहा, जो बच्चों को विवाह और उसकी जिम्मेदारियों के लिए तैयार कर सके। इसके लिए बाहर वालों की मदद चाहिए। घरों में बच्चे अपने परिजनों को देखकर बहुत कुछ सीखते हैं। घर ही उनकी प्राथमिक पाठशाला होती है। क्या आज ऐसा नहीं रहा। नहीं रहा, तो क्यों नहीं रहा? बच्चों का काम बस पढ़ना-लिखना और नौकरी करना ही रह गया।
कुछ लोग यह भी कहते हैं कि ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि लड़कियां बदल गई हैं, लेकिन उनसे सुसराल वालों की आकांक्षाएं नहीं बदली हैं। इसलिए जहां पहले एक बार विवाह हो जाए, तो लड़कियां उसे अपना भाग्य मानकर स्वीकार कर लेती थीं। जैसे-तैसे जीवन काट देती थीं, लेकिन वे अब ऐसा करने को तैयार नहीं हैं। वे विवाह या किसी संबंध को तोड़ने के लिए अब समाज की परवाह नहीं करतीं। आखिर करें भी क्यों। उनकी मुसीबतें हल करने में समाज का कोई योगदान भी नहीं होता। हालांकि अपराध की शिकार अकेली लड़कियां ही तो नहीं हो रहीं। लड़के और पुरुष भी हो रहे हैं।
दशकों पहले मशहूर अभिनेता श्रीराम लागू ने कहा था कि विवाह संस्था पुरानी पड़ चुकी है, जिसे खत्म हो जाना चाहिए। मान लीजिए विवाह खत्म भी हो जाएं, तो आगे क्या। जिसे साथीपन कहते हैं, वह तो चाहिए ही। बहुत से लोगों को आज भी संतान चाहिए। बढ़ते आइवीएफ क्लीनिक्स गवाह हैं कि जिस दंपती के संतान नहीं होती, वे इनकी मदद लेते हैं।
आखिर महिला आयोग यह क्यों समझ रहा है कि लड़के-लड़कियों में संवाद नहीं होता। आज के दौर में जब मोबाइल हर एक के हाथ में है, तो गांवों तक में युवा भावी जीवनसाथी से बातें करते हैं। फिर यह भी है कि दशकों साथ रहने के बाद भी तलाक हो रहे हैं। कई मामलों में हत्याएं भी। कुछ माह पहले एक बड़े पुलिस अधिकारी की पत्नी ने पति को मार डाला। फिर अपनी सहेली को फोन करके कहा कि राक्षस से मुक्ति मिली। इसी तरह वर्षों तक लिव इन में साथ रहने के बाद साथी की हत्या सुनाई देती है।
कभी कोई मारकर शव को पलंग में छिपा देता है, तो कोई ड्रम में। अस्सी–अस्सी साल की उम्र में भी जोड़े अलग हो रहे हैं। तो क्या ये लोग जो इतने दिन साथ रहे, उनमें आपस में कोई संवाद नहीं हुआ होगा। क्या वे अजनबियों की तरह एक-दूसरे के साथ रहे। बाल-बच्चों की जिम्मेदारी कैसे निभाई। फिर क्या एक-दूसरे की हत्या मात्र मानसिक बीमारी है या कि किसी से छुटकारा पाने का साधन। हालांकि जब ऐसा किया जाता है तो शायद करने वाला सोचता है कि हत्या जैसा अपराध करके बच निकलेगा।
ऐसा करने से कितने परिवार तबाह होते हैं, लोगों में क्या संदेश जाता है, इसकी कोई परवाह भी नहीं की जाती। यदि कोई संबंध नहीं निभ रहा है, तो उससे अलग होना ज्यादा बेहतर है, बजाय इसके कि किसी की जान लेकर ऐसे संबंध से मुक्ति पाई जाए। यह देखना भी दुखद होता है कि संबंध तोड़ने वाले तो अपनी-अपनी राह बढ़ जाते हैं। इनसे जन्म लेने वाले बच्चे ताउम्र आफतों को भोगते हैं।
वे ऐसे माता-पिता से नफरत करते हैं। उनका कोई कुसूर भी नहीं होता, मगर दूसरों के किए की सजा उन्हें भुगतनी पड़ती है। इसलिए यदि कोई संबंध न चल रहा हो, उससे अलग होना हो तो बेहतर है कि बच्चों को दुनिया में न लाया जाए। ‘तेरे-मेरे सपने’ जैसी पहल अच्छी है, यदि वह युवाओं को जीवन की वास्तविकता बता सके। जीवन सिर्फ इंस्टाग्राम, फेसबुक आदि पर कुछ शेयर करने या रील बनाने के लिए ही नहीं है। उसके अर्थ बहुत व्यापक हैं।
(लेखिका साहित्यकार हैं)
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