[ योगेंद्र नारायण ]: सेंट्रल विस्टा मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक है। इसके तहत संसद भवन का नया परिसर विकसित किया जाना है। कोरोना काल में यह परियोजना भी विपक्ष के निशाने पर आई। यह मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा और अब उसके फैसले के प्रतीक्षा की जा रही है। ऐसे में इस पर विचार होना चाहिए कि आखिर यह परियोजना कितनी आवश्यक है और क्या इस पर विपक्षी दलों की आपत्ति उचित है?

संसद भवन का उद्घाटन 1927 को तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड इरविन ने किया था

मौजूदा संसद भवन देश की प्रतिष्ठित इमारतों में से एक है। इस ऐतिहासिक इमारत का उद्घाटन 18 जनवरी, 1927 को तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड इरविन ने किया था। इसकी योजना, डिजाइन और निर्माण एडवर्ड लुटियन और हर्बर्ट बेकर जैसे वास्तुविदों की देखरेख में हुआ। इसका निर्माण मूल रूप से केंद्रीय विधान परिषद की इमारत के रूप में हुआ, फिर 1946 में यहां संविधान सभा के 396 सदस्यों के बैठने का इंतजाम हुआ।

संसद की सीटों की संख्या में बढ़ोतरी 2026 के बाद संभव है इसके पहले नहीं

1952 के आम चुनाव के बाद इसे संसद का रूप दिया गया और यहां 461 सदस्यों के बैठने की व्यवस्था की गई। फिर बढ़ते-बढ़ते सीटों की संख्या मौजूदा 550 स्तर तक आ गई। इनमें से कुछ सीटें स्थानाभाव के कारण लोकसभा के स्तंभों के पीछे लगाई गईं और वहां से सही दृश्य नहीं दिखाई देता। संविधान संशोधन द्वारा संसद में सीटों की बढ़ोतरी पर अंकुश लगा दिए जाने के कारण अब संसद की सीटों की संख्या में बढ़ोतरी 2026 के बाद संभव है। संसद के मौजूदा संख्याबल का पैमाना अभी तक 1971 की जनगणना है।

2026 के बाद लोकसभा सीटों की संख्या 900 तक पहुंच सकती है

यदि एक लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र और उसमें प्रतिनिधित्व के मौजूदा पैमाने पर गौर करें तो 2026 के बाद होने वाली बढ़ोतरी के बाद लोकसभा सीटों की संख्या 900 तक पहुंच सकती है। तब इतनी बड़ी तादाद में सांसद कहां बैठेंगे? वे कैसे मतदान करेंगे? उनकी सुनवाई कैसे होगी? ऐसे में संसद के लिए एक अत्याधुनिक इमारत अपरिहार्य ही नहीं, बल्कि अनिवार्य हो चली है। इसके लिए अभी से प्रयास करने होंगे। संसद भवन की मौजूदा इमारत में दोनों सदनों की तात्कालिक आवश्यकताओं के लिए कई बार अस्थाई बदलाव किए गए। संसद सदस्यों के अलावा स्टाफ, आगंतुकों और पत्रकारों के लिए एक कैंटीन भी बनी। यह इमारत से बाहर, लेकिन परिसर में ही बिना किसी योजनाबद्ध तरीके के बनाई गई। इससे निकलने वाली गंदगी एक टूटे हुए पुराने पाइप के सहारे सीवरेज में गिरती है। सीवरेज सिस्टम भी बड़ी लचर स्थिति में है।

...जब समूचे संसद भवन में भयंकर दुर्गंध फैल गई थी

राज्यसभा के महासचिव के रूप में मुझे एक वाकया याद है। तब समूचे संसद भवन में भयंकर दुर्गंध फैल गई थी। उसके कारण सदस्यों ने हॉल में बैठने से इन्कार कर दिया। सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। इंजीनियर को तलब कर सीवरेज की गड़बड़ी दुरुस्त करने के लिए कहा गया। उन्हेंं नक्शा लेकर उस दुर्गंध के स्रोत को तलाशने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ी।

यूरोपीय देशों की संसदीय इमारतें सभी अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस हैं

हमारी संसद के विपरीत यूरोपीय देशों की संसदीय इमारतें सभी अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस हैं। वहां फेस रिकग्निशन सिस्टम तक लगे हैं। उनके बैठक कक्ष उत्तम ध्वनि एवं मतदान तकनीक से युक्त हैं। वहीं लाइटिंग बोर्ड वाले हमारे वोटिंग सिस्टम अक्सर दगा दे जाते हैं, क्योंकि वे पुराने पड़ गए हैं। भारत में जब विदेशी प्रतिनिधि संसद की संयुक्त बैठक को संबोधित करते हैं तो केंद्रीय कक्ष में सदस्यों के बैठने के लिए ही स्थान कम पड़ जाता है। विदेशी मेहमानों के बैठने का इंतजाम भी अक्सर अव्यवस्था का शिकार हो जाता है। पत्रकारों के बैठने का भी उचित इंतजाम नहीं हो पाता। तब बड़ी शर्मनाक स्थिति उत्पन्न हो जाती है जब मेहमान सीट पाने के लिए मशक्कत करते दिखाई पड़ते हैं, जबकि उन्हेंं इसका न्योता मिला होता है। इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए भविष्य में बनने वाली इमारत में एक चैंबर में तकरीबन 1,500 लोगों के बैठने की व्यवस्था करनी होगी।

नए संसद भवन में करनी होगी उचित व्यवस्था

नए संसद भवन की लोकसभा के लिए नए हॉल में इतनी क्षमता रखनी होगी कि वहां दोनों सदनों के बैठने और राष्ट्रपति के अभिभाषण की व्यवस्था हो सके। उसमें 24 संसदीय समितियों के काम को सुचारू ढंग से चलाने के लिए भी इंतजाम करने होंगे। फिलहाल उनकी बैठकों को आयोजित करने के लिए तमाम गुणाभाग करने पड़ते हैं। जब संसद सत्र चलता है तो मंत्रियों के लिए जरूरी हो जाता है कि वे प्रमुख अवसरों पर संसद में उपस्थित रहें। सदन के नेता के पास कुछ कक्ष होते हैं जो वह मंत्रियों को सत्र के दौरान आवंटित करते हैं। 24 संसदीय समितियों के प्रमुखों के लिए भी कार्यालय की व्यवस्था होती है। ये खचाखच भरे होते हैं। ऐसे में मंत्रियों से मुलाकात के लिए आने वाले लोग संसदीय गतिविधियों की एक खराब स्मृति के साथ लौटते हैं।

अमेरिकी संसद का जीवंत माहौल लोकतंत्र की सक्षमता का उदाहरण प्रस्तुत करता है 

वहीं अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में प्रतिनिधियों के कक्ष अलग तस्वीर पेश करते हैं। उनका जीवंत माहौल लोकतंत्र की सक्षमता का उदाहरण प्रस्तुत करता है। उसके सभी कक्ष भूमिगत रूप से जुड़े हुए हैं और एक कोने से दूसरे कोने में जाने के लिए गोल्फ काट्र्स जैसी सुविधाएं भी हैं।

संसद भवन में कामकाज को निपटाने के लिए बैठने की उचित व्यवस्था नहीं है

समय के साथ लोकसभा और राज्यसभा सचिवालय के कर्मियों में भी बढ़ोतरी हुई है। लोकसभा सचिवालय में 2,000 से अधिक और राज्यसभा सचिवालय में 1,200 से अधिक कर्मचारी-अधिकारी हैं। उनके पास अपने कामकाज को प्रभावी ढंग से निपटाने के लिए बैठने की उचित व्यवस्था नहीं है।

सुरक्षा कारणों से भी नए संसद भवन की आवश्यकता है

हमें सुरक्षा कारणों से भी एक नए संसद भवन की आवश्यकता है। किसी परमाणु या जैविक हमले की स्थिति में सदस्यों को बचाने के लिए फिलहाल कोई माकूल इंतजाम नहीं है। संसद भवन का निरीक्षण करने वाली उच्चस्तरीय सुरक्षा टीम ने ऐसे किसी इंतजाम की संस्तुति की थी। इसी तरह अग्निशमन इंतजाम भी बहुत साधारण से हैं।

मौजूदा सरकार संसद भवन की नई इमारत के विषय में सोच रही है

यह अच्छा है कि मौजूदा सरकार संसद भवन की नई इमारत के विषय में गंभीरता से सोच रही है। यह आवश्यक भी है। इस पुरानी और कमजोर इमारत की मरम्मत और रखरखाव पर सालाना 25 करोड़ रुपये खर्च करने से बेहतर है कि उसके स्थान पर आधुनिक फिटिंग एवं लाइटिंग वाली नई इमारत बनाई जाए जिसमें आग से निपटने के भी बेहतर इंतजाम हों। यह विकासशील देशों के लोकतंत्रों के लिए एक मिसाल बननी चाहिए। जहां तक मौजूदा संसद भवन का सवाल है तो उसे एक संग्रहालय बना दिया जाए ताकि वह भारत में लोकतंत्र के शुरुआती चरणों का स्मरण कराता रहे।

( लेखक राज्यसभा के महासचिव रहे हैं )

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