गिरीश्वर मिश्र। कालजयी श्रीमद्भगवद्गीता उस महाभारत का अंश है, जिसे भारतीय चिंतन परंपरा में विशिष्ट स्थान प्राप्त है। महाभारत की महागाथा में धर्म की अवधारणा ही प्रमुख है। गीता का आरंभ भी धर्म शब्द के साथ होता है। धर्म का तत्व देश, काल और पात्र के सापेक्ष होता है और गतिशील जीवन-पद्धति को इंगित करता है। ईश्वर का अवतार धर्म को पहचानने और स्थापित करने के लिए होता है। धर्म को रीति और नीति से भिन्न समझना होगा। अपने से दुर्बल की सहायता करना ही परम धर्म है। इस दृष्टि से सामाजिक संदर्भ के सापेक्ष ही धर्म की समझ भी आकार लेती है। ऋग्वेद, उपनिषद और धर्मशास्त्र आदि सब का संज्ञान लेते हुए महाभारत रचा गया। भगवद्गीता महाभारत का हृदय सरीखा है।

भगवद्गीता महाभारत के भीष्म पर्व में है, पर उसके पहले वन पर्व में व्याध-गीता का भी एक आख्यान आता है। आश्चर्य यह कि दोनों हिंसा की पृष्ठभूमि में हैं। एक कसाई के घर में तो दूसरा युद्धभूमि में। भौतिक (प्रकृति) और मानसिक चैतन्य (पुरुष) का भेद दोनों में ही दिखता है। प्रकृति का सत्य विविधताओं से भरा हुआ है। मनुष्य की कल्पनाशीलता उसे चर अचर अन्य सभी जीवों या पदार्थों से अलग करती है। मनुष्य से यह अपेक्षा है कि वह पाशविक वृत्ति से ऊपर उठ कर ऊर्ध्वमुखी हो। यही जीवन में व्याप्त हीनता और क्षुधा को दूर करने वाला है।

गीता की विचारधारा सदियों से देश-विदेश में मानवीय चिंतन को प्रभावित करती आ रही है। अब तक विश्व की विभिन्न भाषाओं में गीता के तीन हजार से अधिक अनुवाद हो चुके हैं। कहा जाता है कि तमाम शास्त्रों को विस्तार में पढ़ने की जगह गीता को हृदयंगम करना ही पर्याप्त है। इसमें कृष्ण स्रोत हैं और संजय सूचना या संदेश के प्रस्तोता हैं। शायद धृतराष्ट्र और अर्जुन दोनों श्रीकृष्ण के वचनों को सुनते हैं, परंतु अपने-अपने ढंग से और कदाचित भिन्न भिन्न रूपों में। अर्जुन श्रीकृष्ण से प्रश्न पूछते हैं। धृतराष्ट्र चुप रहते हैं। वे डरे सहमे हुए हैं। वे शायद मन ही मन कृष्ण के वचनों को सुनकर गुनते-आंकते हैं।

गीता में श्रीकृष्ण विश्लेषण (सांख्य) और संश्लेषण (योग) दोनों पद्धतियों का उपयोग करते हैं। उन्होंने व्यावहारिक कर्म-योग, भावनात्मक भक्ति-योग और बौद्धिक ज्ञान-योग का प्रतिपादन किया है। गीता के पांचवें अध्याय में श्रीकृष्ण शरीर को नौ द्वारों वाली एक पुरी बताते हैं। गीता द्वारा मानस का विस्तार और यथार्थ का बोध संभव होता है। कर्म का सिद्धांत यह बताता है कि आप वर्तमान परिस्थिति को तो नहीं नियंत्रित कर सकते, किंतु उस परिस्थिति के प्रति प्रतिक्रिया कैसे करें, यह जरूर चुन सकते हैं। गीता का कर्मवाद यह भी स्पष्ट करता है कि मनुष्य अपनी परिस्थितियों का स्वयं निर्माता भी है। इसका संदेश यही है कि आप स्वयं अपने जीवन के लिए उत्तरदायी हैं। हमारे बस में मात्र यही है कि हम परिस्थिति के प्रति किस तरह प्रतिक्रिया करते हैं। इसीलिए गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म पर ध्यान देने को कहते हैं न कि फल पर।

कर्म का परिणाम भी पांच पहलुओं पर निर्भर करता है–शरीर, मन, उपकरण, विधि तथा दैव (भाग्य)। मूर्ख ही खुद को अकेले कारण मानता है। यदि हम खुद को कर्मों के परिणामों से नहीं बांधते तो कर्म भी हमको नहीं बांधते। सुख, शक्ति और स्वर्ग की कामना से किया गया कर्म जब किया जाता है तो आंख फल पर टिकी होती है न कि कर्म पर। कर्म, विकर्म और अकर्म के बीच के अंतर को समझना कठिन है। बुद्धिमान लोग कर्म फल से बिना जुड़े निर्लिप्त होकर काम करते हैं। कर्तृत्व के अभिमान से मुक्त होने और फलेच्छा का त्याग करने पर कर्म अकर्म हो जाता है। कर्म करते हुए निर्लिप्त रहना और निर्लिप्त होकर कर्म करना श्रेष्ठ कर्मयोगी बनाता है। सक्रिय होना कर्म है, पर परिणाम को बिना नियंत्रित करने की चेष्टा के कर्म करना कर्म-योग है। बिना किसी प्रत्याशा के कर्म के विचार को देखकर यह प्रश्न उठता है कि उस स्थिति में कर्म के लिए क्या प्रेरणा का तत्व होगा। वृक्ष और पशु अपने लिए खाद्य और सुरक्षा पाने के लिए सक्रिय होते हैं। एक मनुष्य ही है जो दूसरों के खाद्य और सुरक्षा के लिए कर्म कर सकता है। इसी दृष्टि को अपनाना धर्म है।

हमारा शरीर मरणधर्मा है और सुरक्षा चाहता है। वह सीमाएं भी बनाता है, किंतु इस शरीर में अमर आत्मा का वास है। उसे किसी किस्म की सुरक्षा या बंधन की दरकार नहीं है। अमरता और पुनर्जन्म के विचार के साथ श्रीकृष्ण मानवीय जीवन के विमर्श का पूरा नक्शा ही बदल देते हैं। शरीर का अंत अंत नहीं होता और न शरीर का आरंभ आरंभ होता है। वस्तुत: हम एक महा आख्यान का हिस्सा होते हैं। पुनर्जन्म यह बताता है कि यह विश्व हमारे पहले भी था और हमारे बाद भी रहेगा।

गीता व्यक्ति के मानसिक-आध्यात्मिक उन्नयन पर बल देती है। अस्तित्व का अर्थ और मूल्य ही गीता का प्रतिपाद्य है। कर्म मार्ग का प्रवर्तन ही उसका प्रमुख उद्देश्य है। कर्म की गति गहन होती है। कर्म से मुक्ति संभव नहीं है। कर्म की गुणवत्ता उसे करने में नहीं, बल्कि उसके पीछे निहित इच्छा के त्याग में है। त्याग इच्छाओं का अभाव है। गीता इच्छाओं से आसक्ति दूर करना चाहती है न कि कर्म से। लोक-संग्रह के लिए जीवन का ढर्रा बदलना होगा। बंधुत्व का भाव आवश्यक है। अपने स्वभाव के अनुसार कर्म में निरत होकर मनुष्य को सिद्धि प्राप्त होती है।

(लेखक पूर्व कुलपति हैं)