राजीव शुक्ला। दिल्ली में सर्दियां शुरू हो गई हैं, लेकिन राजधानी में राजनीतिक पारा चढ़ने वाला है। सोमवार से संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हो रहा है। एक दिसंबर से शुरू होने वाला यह सत्र 19 दिसंबर तक चलेगा। यानी संसद करीब 15 दिन ही चलेगी। यह सूचना भले ही प्रशासनिक कागजों में दर्ज हो, पर उसके भीतर देश की राजनीति की एक गहरी बेचैनी छिपी है। ऐसा इसलिए, क्योंकि जब संसद के सत्र छोटे होने लगते हैं तो यह कुछ और नहीं जनता की आवाज का सिकुड़ना ही है।

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में जहां पांच सौ से अधिक लोकसभा सदस्य और ढाई सौ के करीब राज्यसभा सदस्य जनता की आवाज लेकर सदन में पहुंचते हैं, वहां सवाल यह है कि क्या इन सात सौ अस्सी से अधिक प्रतिनिधियों को मात्र पंद्रह दिनों में अपनी बात कहने का अवसर मिल पाएगा? यह गणित जितना सरल दिखता है, उतना ही खतरनाक है। अगर हर सांसद को अपने क्षेत्र की ओर से सिर्फ पांच मिनट बोलने का ही अवसर मिले, तो पैंसठ घंटे से अधिक समय चाहिए। जबकि पूरे सत्र में मुश्किल से नब्बे घंटे की कार्यवाही होती है। उसमें प्रश्नकाल, विधेयक, औपचारिक भाषण और सरकार के एजेंडे का समय जोड़ दें तो बहस के लिए क्या बचता है? शायद वही, जो लोकतंत्र के पास अब धीरे-धीरे बचा रह गया है बहुत कम समय और बहुत लंबा मौन।

संसद को लोकतंत्र का आत्मा कहा जाता है। यह वह जगह है जहां असहमति को जगह मिलती है और बहस के जरिये सच्चाई निकलती है। यहां जनता के सवालों को सत्ता के सामने रखा जाता है, पर पिछले कुछ वर्षों में यह आत्मा थका-सा लगने लगा है। संसद अब बहस का नहीं, बल्कि विधेयक पारित करने का केंद्र बनती जा रही है। कई बार तो लगता है कि विधेयक पहले से तय होकर आते हैं और संसद सिर्फ उस पर मुहर लगाने की औपचारिकता निभाती है। लोकतंत्र में संवाद सबसे बड़ी ताकत होती है, पर जब संवाद घटता है, तो लोकतंत्र सिर्फ औपचारिक शब्द बनकर रह जाता है।

लोकतांत्रिक सरकार का अर्थ केवल सत्ता पक्ष नहीं होता, बल्कि विपक्ष भी उसका हिस्सा होता है। विपक्ष कोई विरोधी दल नहीं, बल्कि लोकतंत्र का दूसरा फेफड़ा है। जब एक पक्ष बोलता है और दूसरा सुनता है, तभी यह प्रणाली सांस लेती है, मगर अब वह सांस घुटने लगी है। संसद में विपक्ष के बोलने के समय को सीमित किया जाना, असहमति को विघ्न मान लेना और सवाल पूछने वालों को ‘अव्यवस्थित’ करार देना, यह लोकतंत्र के चरित्र में आई सबसे खतरनाक प्रवृत्ति है। सत्ता को हमेशा सवालों की जरूरत होती है, क्योंकि सवाल ही उसे जमीन पर रखता है, लेकिन जब सवाल पूछने वाले कम हो जाएं या उनकी आवाज दबा दी जाए तो सत्ता जवाबदेह नहीं रहकर आत्मसंतुष्ट हो जाती है।

स्वतंत्रता के आरंभिक दो दशकों में संसद साल में औसतन एक सौ बीस से अधिक दिन चलती थी। अब वह संख्या आधी रह गई है। शीतकालीन सत्र का पंद्रह दिनों तक सीमित रहना उसी गिरावट का हिस्सा है। यह सिर्फ समय की कमी नहीं, अपितु लोकतांत्रिक संस्कृति के सिकुड़ने की कहानी है। संसद को अब जनता के सवालों से ज्यादा अपने कार्यक्रमों की चिंता है। बेरोजगारी, महंगाई, किसान संकट या शिक्षा पर चर्चा पीछे खिसक गई है। संसद वह जगह थी जहां जनता बोलती थी, अब वह जगह बन गई है जहां सरकार बोलती है और बाकी सिर्फ सुनते हैं।

सवाल पूछना लोकतंत्र का अपराध नहीं, उसका सबसे बड़ा कर्तव्य है। हर सांसद जब अपनी सीट से खड़ा होकर कोई प्रश्न पूछता है, तो वह अपने क्षेत्र की जनता की तरफ से बोलता है। जब उसे बोलने से रोका जाता है, तो यह एक तरह से उस जनता को चुप कराने जैसा है जिसने अपने वोट से उसे संसद तक पहुंचाया। यही कारण है कि संसद में कम होते सवाल, कम होते सत्र और बढ़ता मौन एक गहरी चिंता पैदा करते हैं। लोकतंत्र की ताकत बहस में होती है और जब बहस सिमटने लगे तो समझना चाहिए कि लोकतंत्र की सेहत गिर रही है। अब संसद का मौन डराने लगा है। पहले संसद में शोर था।

गुस्सा भी था। बहसें भी थीं और कभी-कभी अव्यवस्था भी देखने को मिलती थी, लेकिन उस शोर में जीवंतता की अनुभूति थी। आज बहुत कुछ सुव्यवस्थित है, शांत है, तय है। शायद यही शांति लोकतंत्र की सबसे बड़ी बीमारी बन गई है, क्योंकि जो संसद बोलना बंद कर देती है, वह जनता से सुनना भी बंद कर देती है। पंद्रह दिन का सत्र किसी राजनीतिक गणना का नतीजा हो सकता है, पर यह जनता के प्रतिनिधित्व के आत्मा पर प्रहार है। इतने कम समय में न कोई गहरी चर्चा हो सकती है, न किसी कानून के दूरगामी प्रभावों पर विचार। यह लोकतंत्र का ‘संक्षिप्त संस्करण’ है कि यह तेज तो है पर आत्माहीन भी है।

लोकतंत्र को चलाने के लिए सिर्फ चुनाव नहीं, संवाद भी चाहिए। संसद को सिर्फ विधेयक नहीं, प्रश्न भी चाहिए। जो शासन संवाद से डरता है, वह अंततः जनता से दूर हो जाता है। संसद को अब समय की नहीं, गंभीरता की जरूरत है। यह वह जगह नहीं होनी चाहिए जहां सरकार केवल अपनी बात कहे, बल्कि वह मंच होना चाहिए जहां देश की हर आवाज, चाहे वह सत्ता की हो या विपक्ष की, उसे बराबरी और गंभीरता से सुना जाए। लोकतंत्र की सबसे सुंदर बात यही है कि वह बहस से चलता है, सहमति से नहीं। अगर संसद में अब सिर्फ सहमति बची है और असहमति को जगह नहीं दी जा रही तो हमें यह स्वीकार करना पड़ेगा कि लोकतंत्र अब अपने मूल अर्थ से कहीं न कहीं दूर जा रहा है। लोकतंत्र का अस्तित्व संसद के शोर में है, उसकी चुप्पी में नहीं। संसद को चलाना ही पर्याप्त नहीं, उसे बोलना और सुनना भी चाहिए। याद रहे कि जब संसद चुप होती है तब जनता बोलती है और जब जनता बोलती है तब इतिहास करवट लेता है।

(लेखक कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं)