भोपाल में जमीयत उलेमा-ए-हिंद की बैठक में मौलाना महमूद मदनी ने जो कुछ कहा, उसे भड़काऊ भाषण के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। उनकी बातें कट्टरपंथी तत्वों के दुस्साहस को बल प्रदान करने का ही काम करेंगी, क्योंकि एक तो उन्होंने जिहाद को पवित्र शब्द करार दिया और दूसरे एक तरह से यह धमकी भी दी कि जब-जब जुल्म होगा, तब-तब जिहाद होगा।

अच्छा होता कि वे यह भी बता देते कि इस जिहाद के नाम पर क्या होगा? पता नहीं वे जिहाद को किस रूप में देखते और समझते हैं, लेकिन उन्हें इससे परिचित होना चाहिए कि न जाने कितने आतंकी संगठन ऐसे हैं, जो अपने नाम में जिहाद शब्द का इस्तेमाल करते हैं। वे अपनी आतंकी गतिविधियों को बिना किसी शर्म-संकोच जिहाद का नाम देते हैं।

साफ है कि उनके कहने भर से जिहाद को आंतरिक संघर्ष की संज्ञा नहीं दी जा सकती। वैसे भी किसी शब्द का अर्थ उसी रूप में समझा जाता है, जिसके लिए उसका इस्तेमाल होने लगता है। क्या मदनी यह दावा कर सकने की स्थिति में हैं कि आज बुराइयों से लड़ने की कोशिश ही जिहाद है?

मौलाना मदनी जिस तरह इस नतीजे पर भी पहुंच गए कि सुप्रीम कोर्ट समेत सभी अदालतें दबाव में काम कर रही हैं, उससे उन्होंने न केवल न्यायपालिका को नीचा दिखाने का काम किया, बल्कि उसके प्रति अविश्वास पैदा करने की भी कोशिश की। यह एक खतरनाक कोशिश है। शायद उनकी नजर में अदालतें तभी तक स्वतंत्र हैं, जब तक वे उनके मनमाफिक फैसला दें। यह न तो संभव है और न ही किसी को इसकी अपेक्षा करनी चाहिए।

मदनी ने न्यायपालिका को दबाव में लेने की जो कोशिश की, उसका प्रतिकार किया जाना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है। ऐसा इसलिए किया जाना चाहिए, क्योंकि उन्होंने अपने संबोधन में तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी उल्लेख किया। क्या वे यह चाह रहे थे कि सुप्रीम कोर्ट मुस्लिम महिलाओं को दोयम दर्जे का साबित करने और उन्हें उनके अधिकारों से वंचित करने वाली तीन तलाक की कुप्रथा को विधिसम्मत ठहरा देता?

आखिर वे यह कैसे भूल गए कि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष तीन तलाक का उल्लेख एक कुप्रथा के रूप में ही किया गया था? प्रश्न यह भी है कि क्या वे तीन तलाक के समर्थक हैं? जो भी हो, उन्होंने अपने बिगड़े बोल से खुद को उन लोगों में शामिल करने का काम किया है, जो भड़काऊ बयान देकर चर्चा में आना पसंद करते हैं।

ऐसा लगता है कि उन्होंने तय कर लिया था कि वे किसी भी विषय पर कुछ भी संयमित तरीके से नहीं कहेंगे। इसका उदाहरण यह है कि उन्होंने वंदे मातरम् पर भी आपत्ति जता दी। उन्होंने जैसी बातें कीं, वे यही अधिक बताती हैं कि उनके जैसे लोगों के लिए गंगा-जमुनी तहजीब का कहीं कोई मूल्य महत्व नहीं।