विचार: विपक्षी एकता की परीक्षा
विपक्षी दलों के कई नेता आइएनडीआइए का नेतृत्व करने के लिए उनके नाम को आगे बढ़ाते रहे हैं। ऐसे में इन चुनावों के नतीजे विपक्षी गठबंधन की एकता को भी प्रभावित करते दिखाई पड़ सकते हैं।
HighLights
चुनाव परिणाम राष्ट्रीय और राज्य सरकारों की दिशा तय करेंगे।
कांग्रेस का प्रदर्शन इंडिया गठबंधन में उसकी स्थिति को प्रभावित करेगा।
एसआईआर और परिसीमन जैसे मुद्दे भी परिणामों पर असर डालेंगे।
राहुल वर्मा। चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश के विधानसभा चुनावों में से असम, केरलम एवं पुडुचेरी के लिए मतदान हो चुका है और बंगाल एवं तमिलनाडु के मतदाताओं को अपना निर्णय करना अभी शेष है। लोकसभा चुनाव के बाद पहली बार देश में एक साथ इतने बड़े पैमाने पर चुनाव हो रहे हैं तो स्वाभाविक है कि राष्ट्रीय राजनीति पर भी उसका असर दिखेगा। देखा जाए तो चार मई को आने वाले नतीजे केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियों को आईना दिखाने के साथ भावी राजनीति की दिशा निर्धारित करने का काम भी करेंगे। इस दौरान जहां मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर से लेकर निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन जैसी संस्थागत प्रक्रियाओं की परख होगी तो महिला आरक्षण विधेयक के कानून के अमल में आने से भी राजनीतिक दलों को अपने समीकरण नए सिरे से तैयार करने होंगे।
अगर राजनीतिक परिदृश्य की बात करें तो पांच राज्यों के चुनाव राष्ट्रीय दलों के साथ-साथ क्षेत्रीय पार्टियों के लिए भी अस्तित्व बचाए रखने की चुनौती है। असम में भाजपा और बंगाल में तृणमूल कांग्रेस लंबे समय से राज्य की सत्ता पर काबिज हैं। केरलम में वामपंथी दलों के गठबंधन ने पिछले विधानसभा चुनाव में बारी-बारी से सत्ता बदलने वाले रुझान को धता बताते हुए कांग्रेस को हैरान किया था। तमिलनाडु में दोनों ही राष्ट्रीय दल मुख्य मुकाबले से बाहर अपने सहयोगियों के भरोसे हैं। पुडुचेरी की कहानी भी कमोबेश ऐसी ही है।
इस तरह दोनों ही राष्ट्रीय दलों का दो-दो राज्यों में बहुत कुछ दांव पर लगा होने के साथ ही एक राज्य में ही सीधा मुकाबला है। प्रतीत होता है कि भाजपा ने असम को अपना गढ़ बना लिया है और इस चुनाव में भी वहां कांग्रेस को अंदरूनी कलह का सामना करना पड़ा जब चुनावों के दौरान ही उसके दो दिग्गज नेता भाजपाई खेमे से जुड़ गए। केरलम में जरूर वामपंथी दलों के दस साल के शासन से सत्ता विरोधी रुझान के दम पर कांग्रेस उम्मीदें पाले हुए है। अगर कांग्रेस इन दोनों राज्यों में खास प्रदर्शन नहीं कर पाती तो निश्चित ही राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ी उसकी आकांक्षाओं को आघात पहुंचेगा।
बंगाल और तमिलनाडु, दोनों राजनीतिक रूप से बड़े राज्य हैं। लोकसभा की अच्छी-खासी सीटें भी इनकी राजनीतिक महत्ता और बढ़ा देती हैं। दोनों ही जगह क्षेत्रीय दल मजबूती से टिके हुए हैं। पहले माकपा के नेतृत्व में वामपंथी दलों और फिर तृणमूल कांग्रेस का मजबूत किला बन चुका बंगाल लंबे अर्से से राष्ट्रीय दलों को मायूस ही करता आया है। पिछले चुनाव में भाजपा ने भरसक प्रयास किए, फिर भी ममता बनर्जी को सत्ता से बाहर नहीं कर पाई। तमिलनाडु में जयललिता के निधन के बाद से ही द्रमुक ने अपनी पकड़ जिस तरह मजबूत की हुई है, वह कमजोर होती नहीं दिख रही। भाजपा ने इस राज्य में भी सेंध लगाने के लिए कोशिश तो बहुत की, लेकिन थक हारकर सहयोगियों के दम पर ही आगे बढ़ने का विकल्प अपनाया। अभिनेता से नेता बने विजय के राजनीति में उतरने से भी राज्य का चुनाव रोचक हो गया है। बहरहाल, इन दोनों राज्यों के नतीजे क्षेत्रीय क्षत्रपों की राज्य की सत्ता पर पकड़ के साथ ही राष्ट्रीय राजनीति में उनके असर को भी निर्धारित करेंगे।
पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में इस बार के चुनावों की पृष्ठभूमि में भी जमीन-आसमान का अंतर है और इसका असर परिणामों को भी प्रभावित कर सकता है। 2021 के चुनाव कोविड महामारी के प्रकोप के दौरान हुए थे। उसने चुनाव अभियान से लेकर मतदान तक पर अपना असर दिखाया था। उसकी तुलना में इस बार चुनाव सामान्य परिस्थितियों में हो रहे हैं। असम, केरलम और पुडुचेरी में मतदान प्रतिशत में जबरदस्त बढ़ोतरी भी इसे स्पष्ट रूप से रेखांकित कर रही है। एक और महत्वपूर्ण पहलू एसआइआर का भी है। एसआइआर से असम, केरलम और पुडुचेरी में तो बहुत ज्यादा मतदाताओं के नाम नहीं कटे और वहां बहुत विवाद भी नहीं हुआ।
जबकि तमिलनाडु में 70 से 80 लाख और बंगाल में करीब एक करोड़ नाम एसआइआर के चलते मतदाता सूची से कटे हैं। यह एक बहुत बड़ा आंकड़ा है। बिहार का जनादेश इसका स्पष्ट उदाहरण रहा कि एसआइआर में कटे संदिग्ध मतदाताओं के नाम न केवल मतदान प्रतिशत, बल्कि अंतिम परिणामों को भी एक बड़ी हद तक प्रभावित करते हैं। ऐसे में अगर बंगाल और तमिलनाडु चुनावों में सत्तारूढ़ दलों की नैया राजनीतिक मझधार में पलटी तो वे इसे एक बड़ा मुद्दा बनाने का प्रयास करेंगे। भावी एसआइआर प्रक्रियाओं पर इसका असर देखने को मिल सकता है, जहां कुछ सशंकित दल इसमें अवरोध पैदा करने के पुरजोर प्रयास करेंगे। वहीं, परिसीमन के मुद्दे पर भी तकरार बढ़ने के भरे-पूरे आसार होंगे, जिसे लेकर दक्षिण के नेता पहले से ही अपनी आपत्तियां जताते आए हैं।
कांग्रेस अगर राजनीतिक सफलता हासिल करने में असफल रहती है तो फिर वह वापस उसी मोड़ पर पहुंच जाएगी, जहां राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के समय थी। कुछ राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि राहुल की उस यात्रा ने लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के लिए कुछ अनुकूल माहौल बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। लगातार दो चुनावों में शर्मनाक प्रदर्शन को पीछे छोड़ते हुए पार्टी करीब-करीब सौ के आंकड़े तक पहुंच सकी थी। यदि विधानसभा चुनावों में उसका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा तो आइएनडीआइए में भी उसकी स्थिति और कमजोरी होगी। यदि बंगाल में तृणमूल और तमिलनाडु में द्रमुक जीतने में सफल रहते हैं तो उसकी यह स्थिति और कमजोर हो जाएगी।
द्रमुक भले ही कांग्रेस के खेमे में हो, लेकिन उसके कमजोर होने की सूरत में वह कांग्रेस पर दबाव बढ़ाने से शायद ही संकोच करे। वहीं, ममता बनर्जी भले ही राज्य की राजनीति में रमी हुई हों, लेकिन उनकी राष्ट्रीय आकांक्षाएं रह-रहकर सतह पर आती रहती हैं। विपक्षी दलों के कई नेता आइएनडीआइए का नेतृत्व करने के लिए उनके नाम को आगे बढ़ाते रहे हैं। ऐसे में इन चुनावों के नतीजे विपक्षी गठबंधन की एकता को भी प्रभावित करते दिखाई पड़ सकते हैं।
(लेखक सेंटर फार पालिसी रिसर्च में फेलो एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)











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