विचार: बदल रही युवाओं के करियर की दिशा
पहले इंजीनियरिंग छात्रों की पहली पसंद कंप्यूटर साइंस थी, लेकिन अब बुनियादी ढांचे के विस्तार और सेमीकंडक्टर उद्योगों में निवेश के कारण पारंपरिक इंजीनियरिंग शाखाओं में रुचि बढ़ रही है
HighLights
कंप्यूटर साइंस के बजाय कोर इंजीनियरिंग में छात्रों की बढ़ती रुचि।
पीएम गति शक्ति से बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में रोजगार के अवसर।
सेमीकंडक्टर मिशन से तकनीकी विशेषज्ञों की भारी मांग बढ़ेगी।
डॉ. रोहित यादव। पिछले कुछ वर्षों में इंजीनियरिंग की दुनिया में यह धारणा लगभग स्थापित हो गई थी कि अच्छे अंक हासिल करने वाले छात्रों की पहली पसंद कंप्यूटर साइंस होगी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), कोडिंग और आइटी क्षेत्र के तेज विस्तार ने सिविल, मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल जैसी पारंपरिक शाखाओं को धीरे-धीरे पीछे धकेल दिया था, पर अब तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है।
भारत में बुनियादी ढांचे के विस्तार और सेमीकंडक्टर जैसे आधुनिक उद्योगों में बढ़ते निवेश ने युवाओं के करियर विकल्पों को नई दिशा देना शुरू कर दिया है। पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान और भारत सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 जैसी पहल केवल आर्थिक विकास की योजनाएं नहीं, बल्कि रोजगार और कौशल की मांग को भी बदल रही हैं।
पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान भारत में बुनियादी ढांचे की योजना बनाने के तरीके को बदलने की कोशिश है। इसके तहत सड़क, रेलवे, बंदरगाह, बिजली, नागर विमानन और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों को अलग-अलग विकसित करने के बजाय उन्हें एक साझा योजना के तहत जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। अब तक इसने करीब 18.66 लाख करोड़ रुपये की 396 बड़ी अवसंरचना परियोजनाओं का मूल्यांकन किया है।
इनमें से 256 परियोजनाओं को मंजूरी मिल चुकी है और 198 पर निर्माण कार्य चल रहा है। इस मंच से 58 केंद्रीय मंत्रालय और सभी राज्य तथा केंद्रशासित प्रदेश जुड़े हैं। इस तरह के समन्वित निवेश का असर केवल सड़कों और रेलवे लाइनों की संख्या बढ़ने तक सीमित नहीं रहता। जब राजमार्ग, औद्योगिक गलियारे, बिजली नेटवर्क, बंदरगाह और गोदाम बेहतर तालमेल के साथ विकसित होते हैं तो निर्माण मजदूरों से लेकर सिविल-मैकेनिकल इंजीनियरों, सर्वेक्षकों, परियोजना प्रबंधकों और तकनीकी विशेषज्ञों तक-हर स्तर पर कुशल मानव संसाधन की मांग बढ़ती है।
आइआइएम बेंगलुरु के एक अध्ययन के अनुसार, राष्ट्रीय राजमार्गों पर खर्च किया गया प्रत्येक एक रुपया जीडीपी में 3.2 रुपये तक की वृद्धि कर सकता है। इसी तालमेल का नतीजा है कि देश की लाजिस्टिक्स लागत, जो कभी जीडीपी के 13-14 प्रतिशत के आसपास हुआ करती थी, अब घटकर करीब 7.9 प्रतिशत रह गई है। यानी बेहतर बुनियादी ढांचा केवल आवागमन आसान नहीं बनाता, बल्कि उद्योगों की लागत घटाकर आर्थिक गतिविधियों और रोजगार के नए अवसर भी पैदा करता है।
आज दुनिया की आधुनिक अर्थव्यवस्थाएं सेमीकंडक्टर के बिना नहीं चल सकतीं। मोबाइल फोन और कारों से लेकर रक्षा उपकरणों और एआइ तक, लगभग हर आधुनिक तकनीक चिप पर निर्भर है। ऐसे में भारत लंबे समय तक केवल चिप का उपभोक्ता बने रहने के बजाय इस क्षेत्र में अपनी क्षमता विकसित करना चाहता है। इसके लिए हाल में सरकार ने सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 को मंजूरी दी।
इसके तहत अब तक छह राज्यों में 12 परियोजनाओं को मंजूरी मिल चुकी है, जिनमें सिलिकान फैब, कंपाउंड सेमीकंडक्टर इकाइयां और असेंबली तथा टेस्टिंग इकाइयां शामिल हैं, लेकिन सेमीकंडक्टर उद्योग केवल फैक्ट्रियां लगाने से विकसित नहीं होगा। इसके लिए बड़ी संख्या में प्रशिक्षित इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों की भी जरूरत होगी। 2026-27 के लक्ष्यों के अनुसार, सेमीकंडक्टर उद्योग में हजारों प्रत्यक्ष उच्च-कौशल रोजगार सृजित होने की उम्मीद है।
सरकार की स्मार्टलैब पहल के तहत एक लाख इंजीनियरों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया है, जिनमें से 62,000 का प्रशिक्षण पूरा हो चुका है। डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव योजना के तहत 105 भारतीय कंपनियों को चिप डिजाइन से जुड़े अत्याधुनिक उपकरण उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इन नीतिगत बदलावों का असर अब इंजीनियरिंग कालेजों में छात्रों की पसंद पर भी दिखाई देने लगा है।
बीते डेढ़ दशक में कंप्यूटर साइंस का दबदबा इतना बढ़ गया था कि सिविल, मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल जैसी शाखाएं कई छात्रों के लिए दूसरा विकल्प बन गई थीं, पर अब सिविल एव मैकेनिकल इंजीनियरिंग में भी आइआइटी जैसे संस्थानों में बेहतर रैंक वाले छात्रों की रुचि बढ़ी है। इसकी वजह सिर्फ बाजार का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि दो ठोस कारण हैं। पहला, एआइ के बढ़ते असर ने खुद पारंपरिक आईटी नौकरियों को लेकर नई बहस छेड़ दी है, जिससे कई छात्र मशीनों, उत्पादन और भौतिक दुनिया से जुड़े क्षेत्रों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
दूसरा, गति शक्ति, सेमीकंडक्टर मिशन, रक्षा विनिर्माण में आत्मनिर्भरता और मेक इन इंडिया जैसी दीर्घकालिक नीतियां वाकई कोर इंजीनियरों की मांग बढ़ा रही हैं। युवाओं के सोच में यह बदलाव किसी अस्थायी ट्रेंड का नहीं, बल्कि जमीनी नीतिगत हकीकत का असर है। अब करियर का चुनाव इस आधार पर हो कि दस-पंद्रह वर्षों में किन कौशलों की जरूरत होगी।
भारत जिस तरह सड़क, रेल, ऊर्जा, लॉजिस्टिक्स, इलेक्ट्रानिक्स और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में निवेश कर रहा है, उससे साफ है कि भविष्य में अच्छे साफ्टवेयर इंजीनियरों की जरूरत जितनी बनी रहेगी, उतनी ही जरूरत उन इंजीनियरों की भी होगी जो सड़कें, पुल बनाएंगे, मशीनें डिजाइन करेंगे, बिजली प्रणालियां मजबूत करेंगे और दुनिया के लिए चिप तैयार करेंगे।
(लेखक आईआईएम, बोधगया में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)




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