जागरण संपादकीय: संघ प्रमुख की चेतावनी
किसी भी राष्ट्र की प्रगति और खुशहाली के लिए यह आवश्यक है कि मतभेदों और असहमतियों के बाद भी राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सद्भाव को बनाए रखने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
HighLights
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने विजयादशमी पर अपने वार्षिक उत्सव पर जो कुछ कहा, उस पर सभी को ध्यान देना चाहिए-चाहे वे इस संगठन की रीति-नीति से असहमत लोग ही क्यों न हों। उनकी यह चेतावनी समयानुकूल है कि भारत में बांग्लादेश और फ्रांस जैसे हालात बनाने की जो कोशिश हो रही है, उसके पीछे कुछ ऐसी शक्तियां हैं, जो देश को कमजोर कर अपने संकीर्ण स्वार्थ सिद्ध करना चाहती हैं।
इनमें विदेश की भी कुछ शक्तियां हैं, जो असंतोष को हवा देकर देश में अराजकता फैलाने के लिए सक्रिय हैं। इन शक्तियों में जहां कुछ ऐसे संगठन हैं, जिन्हें भारत की प्रगति रास नहीं आ रही है तो कुछ ऐसे भी, जिन्हें भारत का वर्तमान शासन अपने हितों के अनुकूल नहीं लग रहा है। ऐसी शक्तियों का सबसे बड़ा हथियार हैं सोशल मीडिया कहे जाने वाले डिजिटल प्लेटफार्म।
इंटरनेट मीडिया ऐसी तकनीक पर काम करता है कि वह लोगों के सोच को कहीं अधिक आसानी से दुष्प्रभावित कर देता है। कई बार तो वह विवेक का पूरी तरह हरण कर लेता है। एआइ के आगमन के चलते यह काम और बड़े पैमाने पर किया जाने लगा है। इसी कारण संघ प्रमुख ने यह रेखांकित किया कि नई तकनीक सीखना और उसमें सक्षम बनना आवश्यक है, लेकिन इसी के साथ नैतिकता का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
आज इसकी अनदेखी नहीं हो सकती कि इंटरनेट मीडिया के जरिये भारत में सामाजिक विभाजन की खाई को चौड़ा करने का ही काम नहीं किया जा रहा है, बल्कि नितांत झूठे और भ्रामक नैरेटिव से लोगों को बरगलाया-उकसाया भी जा रहा है। इसके लिए कई बार लोगों की कुछ जायज चिंताओं की शातिर तरीके से आड़ ली जाती है और फिर संबंधित आंदोलन को खतरनाक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाने लगता है।
चिंताजनक यह है कि जन समर्थन पाने के लोभ में राजनीतिक दल भी ऐसे आंदोलनों का साथ देने के लिए आगे आ जाते हैं। देश में इन दिनों यही देखने को मिल रहा है। भारत के प्रति अपने समर्पण को व्यक्त करते हुए संघ प्रमुख ने एक और महत्वपूर्ण बात यह कही कि देश और समाज को चलाने की जिम्मेदारी केवल नेताओं की नहीं, बल्कि आम नागरिकों की भी है।
वे इस जिम्मेदारी का निर्वाह अनुशासन भाव का परिचय देकर और नियम-कानूनों के पालन के प्रति प्रतिबद्ध रहकर ही कर सकते हैं। वास्तव में देश के समग्र विकास की यही कुंजी है। यह समझा ही जाना चाहिए कि हर समस्या का समाधान आंदोलन नहीं हैं और ऐसे आंदोलन तो कतई नहीं, जो लोगों को विभाजित करने का काम करते हैं। किसी भी राष्ट्र की प्रगति और खुशहाली के लिए यह आवश्यक है कि मतभेदों और असहमतियों के बाद भी राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सद्भाव को बनाए रखने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।











