विचार: बड़े संकट की ओर बढ़ता यूरोप
यूरोप की समस्या केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे आर्थिक और राजनीतिक कारण भी हैं।
HighLights
फ्रांस में हिंसा ने यूरोप के गहरे सामाजिक असंतोष को उजागर किया।
आर्थिक कठिनाइयां, महंगाई और असमानता प्रमुख कारण हैं।
सरकारों को वित्तीय संतुलन और सामाजिक जरूरतों पर ध्यान देना होगा।
डॉ. आनंद कुमार। यूरोप इस समय आर्थिक कठिनाइयों, बढ़ती असमानता और राजनीतिक ध्रुवीकरण के कारण गहरे सामाजिक असंतोष का सामना कर रहा है। फ्रांस में बीते दिनों हुई व्यापक हिंसा में यह स्पष्ट दिखा। स्कूलों में सुविधाओं की कमी और सार्वजनिक सेवाओं की गिरती गुणवत्ता के विरोध में शुरू हुए प्रदर्शन धीरे-धीरे महंगाई, आवास संकट और आम लोगों के जीवन स्तर में गिरावट के विरुद्ध व्यापक आंदोलन में बदल गए। हिंसा, आगजनी और लूटपाट की घटनाओं ने पूरे आंदोलन का स्वरूप बदल दिया। दुकानों, रेस्तरां और सार्वजनिक भवनों को निशाना बनाया गया।
फ्रांस के अलावा इटली, बेल्जियम, पुर्तगाल और अल्बानिया में भी विरोध-प्रदर्शनों और हिंसक घटनाओं की खबरें सामने आई हैं। इससे स्पष्ट है कि यूरोप की समस्या केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे आर्थिक और राजनीतिक कारण मौजूद हैं। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई का आश्वासन दिया है। हालांकि सरकार अगर आंदोलन को सिर्फ कानून-व्यवस्था की समस्या मानती है, तो वह उन आर्थिक और सामाजिक कारणों की अनदेखी करेगी, जिन्होंने इतने बड़े जनसमूह को सड़कों पर उतरने के लिए प्रेरित किया।
इस असंतोष की जड़ें आम नागरिकों की अपेक्षाओं और उनकी आर्थिक स्थिति के बीच बढ़ती खाई में भी हैं। महंगाई, अपर्याप्त वेतन, महंगे मकान और सार्वजनिक सेवाओं की गिरती गुणवत्ता ने विशेष रूप से युवाओं के बीच भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ाई है। जब शिक्षा बेहतर भविष्य की गारंटी देने में असमर्थ दिखाई दे और रोजगार से भी सम्मानजनक जीवन संभव न हो, तो असंतोष केवल किसी एक सरकारी नीति तक सीमित नहीं रहता। धीरे-धीरे यह राजनीतिक व्यवस्था और संस्थाओं के प्रति अविश्वास में बदल सकता है। इसलिए सरकार को हिंसा कर रहे लोगों और शांतिपूर्ण ढंग से मांगें रखने वालों के बीच स्पष्ट अंतर करना होगा।
बढ़ते सार्वजनिक ऋण और सरकारी उधारी की लागत ने फ्रांस पर बजट घाटे को नियंत्रित करने का दबाव बढ़ा दिया है। संसद में 2027 के बजट पर चर्चा शुरू हो चुकी है, जिसमें लगभग 43 अरब यूरो की घाटा-कटौती उपाय प्रस्तावित हैं, लेकिन शिक्षा, कल्याणकारी योजनाओं और अन्य आवश्यक सेवाओं पर खर्च घटाने से जनता का असंतोष और बढ़ सकता है। दूसरी ओर, बिना पर्याप्त वित्तीय संसाधनों के सरकारी खर्च बढ़ाने से वित्तीय स्थिरता और निवेशकों का विश्वास प्रभावित हो सकता है। बाजारों की प्रतिक्रिया भी इस संकट की गंभीरता को दर्शाती है।
फ्रांस के सरकारी बांड पर दबाव बढ़ा, यूरो कमजोर हुआ और फ्रांसीसी शेयर बाजार का प्रदर्शन यूरोपीय बाजारों की तुलना में खराब रहा। यदि राजनीतिक अस्थिरता लंबे समय तक बनी रही, तो निवेश प्रभावित हो सकता है। उपभोक्ताओं का विश्वास कमजोर पड़ेगा। व्यवसायों को अतिरिक्त नुकसान उठाना पड़ सकता है। विशेष रूप से छोटे दुकानदारों के लिए हिंसा से हुए नुकसान की भरपाई कठिन होगी। जिस आर्थिक असुरक्षा ने विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया, वही हिंसा के कारण और गहरी हो सकती है।
आर्थिक संकट के साथ राजनीतिक ध्रुवीकरण भी फ्रांस की स्थिति को गंभीर बना रहा है। राष्ट्रपति मैक्रों का कार्यकाल समाप्ति की ओर है और लगभग छह महीने बाद होने वाले राष्ट्रपति चुनाव को देखते हुए राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज हो गई है। संसद में तीन प्रमुख राजनीतिक धड़ों के बीच गहरे मतभेदों के कारण सरकार के लिए सहमति बनाना कठिन है। दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन सरकार की कानून-व्यवस्था संबंधी विफलताओं को मुद्दा बना रही हैं, जबकि वामपंथी नेता जां-लुक मेलांशों सरकार और पुलिस की भूमिका की आलोचना कर रहे हैं। संकट के समाधान के लिए आवश्यक राजनीतिक सहयोग के स्थान पर आरोप-प्रत्यारोप बढ़ रहे हैं।
फ्रांस की घटनाओं का प्रभाव पूरे यूरोप में दिखाई दे रहा है। इटली, बेल्जियम और पुर्तगाल में भी प्रदर्शन तथा झड़पें हुई हैं, जबकि स्पेन में आवास और वेतन के मुद्दों पर विरोध-प्रदर्शन की तैयारी है। अल्बानिया में भी सरकार विरोधी और छात्र आंदोलनों ने हिंसक रूप लिया। इन देशों की राजनीतिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं, लेकिन महंगाई, आवास की बढ़ती लागत, कम वेतन और सरकारी नीतियों से असंतोष जैसी समस्याएं समान हैं। अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष से ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि ने परिवारों के बजट पर अतिरिक्त दबाव डाला है। कमजोर आर्थिक विकास के कारण लोगों की आय आवश्यक खर्चों के अनुरूप नहीं बढ़ पा रही है।
आने वाले महीनों में कई यूरोपीय देशों में चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में आर्थिक असंतोष और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का मेल अधिक खतरनाक हो सकता है। यदि पारंपरिक दल जनता को ठोस समाधान देने में विफल रहते हैं, तो अतिवादी ताकतों को समर्थन मिल सकता है। जटिल आर्थिक समस्याओं के सरल समाधान देने का दावा करने वाले दल जनता की निराशा का लाभ उठा सकते हैं। इससे राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ेगा और गठबंधन तथा सहमति के आधार पर शासन चलाना और कठिन हो सकता है।
कुल मिलाकर, फ्रांस का संकट पूरे यूरोप के लिए एक चेतावनी है। लोकतंत्र की स्थिरता केवल पुलिस और प्रशासन की क्षमता पर निर्भर नहीं करती, इसके लिए नागरिकों का यह विश्वास भी आवश्यक है। कानून-व्यवस्था बनाए रखना अनिवार्य है, लेकिन किफायती आवास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सम्मानजनक रोजगार और विश्वसनीय सार्वजनिक सेवाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। यूरोपीय सरकारों को वित्तीय अनुशासन के साथ सामाजिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाना होगा। यदि वे जनता की अपेक्षाओं और वास्तविक जीवन की परिस्थितियों के बीच बढ़ती खाई को पाटने में विफल रहती हैं, तो राजनीतिक ध्रुवीकरण और सामाजिक अशांति और गहरी हो सकती है। यूरोप के सामने असली चुनौती केवल सड़कों पर शांति बहाल करना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और बेहतर भविष्य के प्रति नागरिकों के विश्वास को फिर से स्थापित करना है।
(लेखक मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान में फेलो हैं)











