गिरीश्वर मिश्र। कठिन और लंबे वनवास के बाद श्रीराम द्वारा रावण के साथ लंका में युद्ध के बाद विजय प्राप्त करने की स्मृति को सजीव करता विजयदशमी का पर्व भारत के जन-जीवन में विशेष महत्व रखता है। यह याद दिलाता है कि आसुरी वृत्तियां जीवन-द्रोही होती हैं और उनका प्रतिकार करने के लिए तत्पर रहना आवश्यक है। यह पर्व भारतीय संस्कृति में जीवन मूल्यों को स्थापित करने की सतत कामना और उसके लिए संघर्ष की अनिवार्यता को भी व्यंजित करता है। श्रीराम की मंगलदायी छवि पौरुष और चरित्र के उत्कर्ष के रूप में लोक मन में अंकित है। उनकी विशिष्टता यही है कि उनके जैसा आत्मीय कोई और नहीं मिलता। लोक से श्रीराम का तादात्म्य इतना गहरा है कि राम को याद किए बिना आज भी आम आदमी जीवन के बारे में सोच ही नहीं पाता। इसलिए उनकी विजय का उत्सव हर जाति-वर्ग के बच्चे, बूढ़े, जवान सबके लिए हर्ष और उल्लास का विषय होता है। इसके साथ शारदीय नवरात्र में मां दुर्गा का पूजन देश के अन्यान्य क्षेत्रों में अत्यंत लोकप्रिय है। यह अवसर प्रतीक रूप में असत्य पर सत्य की और दुष्प्रवृत्ति पर सद्-वृत्ति की जीत के संकल्प की ओर ध्यान आकृष्ट करता है।

भगवान विष्णु के मानवीय अवतार श्रीराम की महागाथा में मानव जीवन की विभिन्न समस्याओं और विसंगतियों से आजीवन लगातार जूझते रहने की पीड़ा प्रकट होती है। इस पीड़ा के दायरे में देव, दानव, पशु, पक्षी, वनस्पति यानी पूरा चराचर जगत सम्मिलित है। यह विस्तृत वितान स्वाभाविक भी है, क्योंकि कर्म-बंधन अनिवार्य हैजो बिना रुके निरंतर चलता रहता है। कर्म करना जीवन की अनिवार्यता है। इस क्रम में आसक्ति और मोह पैदा होने की आशंका हमेशा बनी रहती है। तब जीवन और प्रकृति के बीच असंतुलन पैदा होता है। इस स्थिति को ही धर्म की ग्लानि कहते हैं। दूसरी ओर धर्म की रक्षा करने से जीवन की रक्षा और उन्नति होती है।

विजयदशमी धर्म की जय का उद्घोष करने वाला उत्सव है। राम और रावण के बीच लंका की भूमि पर हो रहे युद्ध के बीच प्रबल पराक्रमी रावण से लड़ने को पैदल चल रहे श्रीराम को देख भक्त विभीषण के मन में संशय उठा। रावण रथ पर सवार था और रघुवीर विरथ यानी रथहीन थे। इस बेमेल स्थिति से विभीषण अधीर हो रहे थे। इस संदेह की मनःस्थिति को भांप कर श्रीराम समझाते हैं कि जीत दिलाने वाला रथ कोई दूसरा है, जिसे कोई शत्रु पराजित नहीं कर सकता। विजय की ओर ले जाने वाला रथ शौर्य और धैर्य के दो पहियों पर टिका होता है। उस रथ पर सत्य और शील, यानी सदाचार नाम वाले ध्वज और पताका फहराते हैं। इस रथ में चार घोड़े जुते हुए हैं: बल, विवेक-बुद्धि, शम (अर्थात इंद्रियों पर नियंत्रण) और परोपकार।

आज हमारे राजनीतिक दल भी रथ-यात्रा पर रहते हैं, मगर यह रथ कैसा है और यात्रा किस काम के लिए है, यह विचारणीय है। आज विश्व में संहार की लीला ऐसी हो रही है कि हार-जीत का कोई स्पष्ट अर्थ ही नहीं रह रहा। शायद जीतना स्वयं को है अर्थात स्वराज ही जरूरी है। जब तक अपने पर जीत हासिल नहीं होती, तब तक आदमी हारा हुआ है। जीत आसुरी उपाय से नहीं हो सकती। लोभवश स्वार्थ, अहंकार, दंभ, आडंबर का बोलबाला हो रहा है। लगता है किसी को संतोष नहीं है और तृष्णा की आग में नियम-कानून, धन-जन, श्रम और उत्पादन सब की हानि हो रही है। कर्मकांड तो हो रहा है, पर सही कार्य नहीं हो पा रहा है। धर्म के साथ जुड़ाव के लिए निस्पृह कर्तव्य पालन कठोर नैतिक मानदंडों की मांग करता है। कपट, छल, छद्म के आडंबर जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, उनसे निःस्वार्थ जनसेवा का भाव जाता रहा।

मानवीय संवेदना के ह्रास की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। सत्ता-सुख ही केंद्रीय हो रहा है। जो सत्ता में है उसे सत्ता की रक्षा करनी है और जो सत्ता में नहीं हैं, उन्हें सत्ता तक पहुंचाने के लिए आंदोलन, प्रदर्शन, रैली, अनर्गल बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप में ही सारा श्रम और ऊर्जा को खपाया जा रहा है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति का अवसर वैध है, मगर धरना और प्रदर्शन प्रायः दिशाहीन हो जा रहा है और उनकी उपलब्धि संदिग्ध। इस उठापटक में लोक-कल्याण ओझल होता जा रहा है। इसलिए आत्मलोचन की विशेष आवश्यकता है। आज यह पहचानने की जरूरत है कि देश को क्या चाहिए। झूठे प्रपंच और अनावश्यक आडंबर की जगह विशाल देश की व्यापक समझ जरूरी है।

राम और देवी मां सबकी हैं। राम ने देवी की उपासना की और अपनी सहज शक्ति पहचानी। राम-राज्य की स्थिति ऐसी थी, जिसमें 'सब नर करहिं परस्पर प्रीती, चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती' का भाव रहा। बिना भेद-भाव के सबको अवसर देने की संकल्पना राम-राज्य की कसौटी है। विजयदशमी के अवसर पर राम से जुड़ने का अर्थ यह भी है कि हम अपने में प्रभुता और विश्वास स्थापित करें। शारदीय नवरात्र अपने में शक्ति के संचय का अवसर देता है। भगवती का जागरण और शेरा वाली की स्तुति तथा रामलीला का आयोजन इसके सांस्कृतिक रूप को मोहक और लोकप्रिय बना रहे हैं। पुरुषोत्तम श्रीराम ‘धर्म के विग्रह’ के रूप में विख्यात हैं। राम के लिए ‘धर्म’ का अर्थ होता है सत्य, अहिंसा, परोपकार और सब जनों की चिंता। इस तरह धर्म सबको साथ रहने, साझेदारी तथा परस्पर सौहार्द को जन्म देता है। इस धर्म की रक्षा हमें करनी होगी और यह धर्म ही हमारी रक्षा करेगा।

(लेखक शिक्षाविद् हैं)