अलग-अलग कारणों से विभिन्न यूरोपीय देशों में वहां की सरकारों के खिलाफ हो रहे धरना-प्रदर्शन जिस तरह अराजक होते जा रहे हैं, उससे समूचा यूरोप संकट से घिरता दिख रहा है। यह सामान्य बात नहीं कि फ्रांस, इटली, अल्बानिया, पुर्तगाल और बेल्जियम आदि में सड़कों पर उतर कर सरकारों के खिलाफ असंतोष जताने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। चिंताजनक यह है कि कहीं-कहीं असंतोष का यह प्रदर्शन हिंसा, आगजनी और लूटपाट में तब्दील हो जा रहा है। इस मामले में फ्रांस के कुछ शहरों में हो रही अराजकता किसी बड़े गंभीर संकट का सूचक जान पड़ती है।

प्रदर्शनकारी आगजनी और लूटपाट करने के साथ पुलिसकर्मियों पर हमले भी कर रहे हैं। फ्रांस में धरना-प्रदर्शन स्कूलों में शिक्षकों और सुविधाओं की कमी को लेकर शुरू हुए थे। बाद में महंगाई और सामाजिक योजनाओं के व्यय में कटौती जैसे मुद्दे भी इसमें शामिल हो गए। फ्रांस के अलावा अन्य यूरोपीय देशों में कहीं सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर रहे हैं, कहीं बेरोजगारी के विरोध में तो कहीं बढ़ती महंगाई अथवा आवास की कमी के कारण।

यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि लोगों के असंतोष को भुनाने और अराजकता का सहारा लेने वाले सक्रिय हो चुके हैं। अंदेशा इसका है कि आने वाले दिनों में यूरोप के अन्य देश भी अराजकता भरे प्रदर्शनों से दो-चार हो सकते हैं। यूरोप में अप्रवासियों के खिलाफ भी आक्रोश पनप रहा है। इसके नतीजे में कई यूरोपीय देशों में दक्षिणपंथी दलों का उभार हो रहा है। समस्या यह है कि अवैध अप्रवासियों का जो विरोध हो रहा है, उसकी चपेट में वैध अप्रवासी भी आ रहे हैं। अप्रवासियों के खिलाफ विरोध की लहर आस्ट्रेलिया और अमेरिका में भी देखी जा रही है।

यूरोप और पश्चिम के अन्य देश जिन समस्याओं से घिरे हैं, उनके लिए वही अधिक जिम्मेदार हैं। ये देश हिंसक प्रदर्शनों को इसलिए नियंत्रित नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि लोगों की जायज चिंताओं के बहाने अराजकता फैलाने वालों को कुछ ऐसी शक्तियां भड़काने में लगी हुई हैं, जो अपने संकीर्ण हितों की पूर्ति करना चाहती हैं। इनमें इस्लामिस्टों और कम्युनिस्टों के गठजोड़ की भूमिका कहीं अधिक दिखाई दे रही है।

ऐसे गठजोड़ दुनिया के अन्य देशों में भी अस्थिरता और अराजकता का माहौल पैदा कर रहे हैं। कहीं-कहीं यह गठजोड़ आतंक की पैरवी करने वालों का भी साथ दे रहा है और लोगों के बीच वैचारिक खाई को चौड़ा करने का काम भी कर रहा है। ऐसे तत्वों से विश्व समुदाय को एकजुट होकर निपटने के लिए आगे आने की आवश्यकता है। यदि ऐसा नहीं होता तो यूरोप में आज जो अशांति का माहौल दिख रहा है, वह विश्व के अन्य देशों में भी देखने को मिल सकता है।