शिवकांत शर्मा। राष्ट्रीय संस्थाओं की साख भी मोती और मनुष्य की आब जैसी होती है कि एक बार गई तो बहाल नहीं होती। विशेषकर संवैधानिक और नियामक संस्थाओं की साख, जिन पर लोकतंत्र की इमारत टिकी है। देश की स्थिरता के लिए इनकी साख बनाए रखना आवश्यक है, लेकिन लोकतंत्र में सत्ता दो ही तरह से हासिल की जा सकती है। सरकार की विफलताएं उजागर करते हुए जनता के सामने बेहतर नीतियां रखकर या फिर जिन संवैधानिक संस्थाओं के सहारे देश चल रहा है, उनके कामकाज की वैधता पर सवाल उठाकर। विपक्ष की रणनीति यही लगती है। उसका उद्देश्य तथ्य और प्रमाण रखे बिना संवैधानिक संस्थाओं के निर्णयों पर जनता के मन में केवल संदेह पैदा करना है। जैसे अदालतों में बचाव पक्ष अभियोग पक्ष के आरोपों पर संदेह पैदा करता है। उसे आशा है कि बाकी का काम जूरी की तरह जनता कर देगी और उनकी राह आसान हो जाएगी।

मोदी सरकार की वैधता को चुनौती देने के लिए संवैधानिक संस्थाओं के काम पर सवाल उठाने की रणनीति राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस और उसके गठबंधन ने उसके पहले कार्यकाल से ही अपना ली थी। नोटबंदी और फ्रांस के साथ हुए राफेल विमान सौदे पर विपक्ष ने महालेखापरीक्षक कैग पर आडिट रिपोर्टें सरकार की सुविधानुसार जारी करने के आरोप लगाए। राफेल सौदे में घूसखोरी साबित न होने पर भी राहुल गांधी न केवल 'चौकीदार चोर है' जैसे नारे लगाते रहे, बल्कि यह आभास देने की कोशिश भी की कि जैसे सर्वोच्च अदालत उनके आरोपों से सहमत थी। उसके बाद पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को राज्यसभा के लिए मनोनीत करने को लेकर विवाद उठा। उसे राम मंदिर मामले में निर्णय देने का पुरस्कार बताया गया। सरकार ने रंगनाथ मिश्रा को राज्यसभा में निर्वाचित कराने जैसे पुराने निर्णयों की याद दिलाकर बचाव करने की कोशिशें कीं, लेकिन उनसे सर्वोच्च न्यायालय की साख पर उठे संदेह कितने दूर हो पाए, यह कहना कठिन है।

भारत दुनिया के उन मुट्ठी भर बड़े लोकतांत्रिक देशों में प्रमुख है, जहां चुनाव आयोग जैसी संस्था राष्ट्रीय स्तर पर सारे चुनाव कराती है और स्वायत्त रूप से काम करती है। इसलिए उसका निरंतर या फिर अप्रत्याशित हार से हताश विपक्ष के निशाने पर आना स्वाभाविक है। यहां उल्लेखनीय है कि 2023 तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल की सिफारिश से होती थी, जिसकी वजह से आयोग पर सरकार के दबाव में काम करने के आरोप लगते रहते थे। मार्च 2003 में सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय पीठ ने सरकारी सिफारिश से नियुक्ति की परंपरा को समाप्त करते हुए नियुक्ति के लिए एक तीन सदस्यीय अंतरिम समिति का गठन किया, जिसमें मुख्य न्यायाधीश, प्रधानमंत्री और लोकसभा में नेता-प्रतिपक्ष को शामिल किया गया। मोदी सरकार ने उसी साल दिसंबर में विधेयक पारित करके इस समिति में मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री को दे दी। सरकार का यह कदम चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर विपक्ष के संदेह की जड़ बन गया।

ऐसे माहौल में बिहार, बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्यों के चुनावों से पहले मतदाता सूचियों के शोधन की एसआईआर प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी ने संदेह की आग में घी का काम किया। लोकतंत्र में जितना जरूरी जनादेश की वैधता के लिए अवैध मतदान को रोकना है, उतना ही जरूरी वैध मतदाताओं के मताधिकार को सुनिश्चित करना होता है। कटे नामों में मृतकों और विस्थापितों को छोड़कर कितने अवैध और घुसपैठिए थे, इसका आंकड़ा आयोग अभी तक नहीं दे पाया। हालांकि, हजारों वैध वोटरों के नाम कटने के मामले सामने आए हैं, जिनमें तमाम गणमान्य लोग भी हैं। आनलाइन वोटर पंजीकरण फार्म में अर्हता प्रमाणित करने के लिए अतिरिक्त सूचना के अनुच्छेद में तीनों आयुक्तों की सहमति थी या नहीं इसे लेकर और सूची से नाम कटवाने के लिए कोई कितने फार्म भर सकता था, इसे लेकर संदेह बना हुआ है। पता नहीं आयोग यह जानते हुए भी क्यों चुप्पी साधे है कि जनादेश की विश्वसनीयता उसकी साख पर टिकी है और सरकार की साख जनादेश की विश्वसनीयता पर, जिसके बिना कोई भी सरकार सुधार करना तो दूर सामान्य कामकाज भी नहीं चला सकती।

साख का यह संकट चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय तक ही सीमित नहीं है। संसद में विपक्षी हो-हल्ले और नारेबाजी की वजह से देश के लिए आवश्यक आर्थिक और सामाजिक सुधारों को छोड़ गंभीर चुनौतियों और समस्याओं पर भी कोई सार्थक चर्चा नहीं हो पाती। ऐसे कैसे विकसित राष्ट्र का सपना पूरा हो सकेगा? राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षाओं के लिए गठित परीक्षा एजेंसी एनटीए की साख पेपर लीक न रोक पाने के कारण धूल में मिल चुकी है। अदाणी समूह की कथित अनियमितताओं पर सट्टा कंपनी हिंडरसन की रिपोर्ट के बाद शेयर बाजार नियामक संस्था सेबी को निशाना बनाया गया और सेबी प्रमुख का इस्तीफा मांगा गया। अदाणी समूह के शेयर तो साल भर में उबर गए, मगर इस विवाद के बाद से विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से निरंतर पैसा निकाल रहे हैं। संभव है उनका भरोसा टूटने का मुख्य कारण 2024 में भाजपा का बहुमत हासिल न कर पाना या ट्रंप की टैरिफ जंग रहा हो, पर साख और भरोसे का चोली-दामन का साथ है।

यदि विपक्ष की रणनीति सरकार और संस्थानों की साख गिराने की है तो सरकार को साख बहाल करने के उपाय करने चाहिए, क्योंकि साख गिरने से जनता और निवेशकों दोनों का भरोसा डिगता है। भरोसा टूटने पर निवेश और रुपया गिरने, पूंजी महंगी होने, महंगाई बढ़ने और अस्थिरता फैलने का खतरा बढ़ता है, जो विकास की गाड़ी पटरी से उतार सकता है। संवैधानिक संस्थाओं की साख बचाने और बहाल करने का दायित्व सरकार का है। वह चाहे तो एसआईआर का काम पारदर्शी तरीके से निपटा कर संसद और विधानसभाओं को भंग कर एक साथ ईवीएम और मतपत्रों से चुनाव करा सकती है, जिससे चुनाव आयोग और जनादेश की साख बहाल हो सके और आए दिन चुनावों की मुसीबत से छुटकारा मिले। राष्ट्रीयता रजिस्टर और समान नागरिक संहिता और आर्थिक सुधार के मुद्दों पर जनमत संग्रह कराया जा सकता है।

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)