रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कांग्रेस पर हिंसा और अराजकता के सहारे बांग्लादेश की तरह सत्ता परिवर्तन के प्रयास में लिप्त होने का जो गंभीर आरोप लगाया, उसके लिए राहुल गांधी अपने अलावा अन्य किसी को दोष नहीं दे सकते। उन्होंने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में धुर वामपंथी प्रशांत भूषण और नेहा बोरा को जिस तरह अपने साथ खड़े होने की विशेष सुविधा प्रदान की, उससे यही पता चला कि हताशा में आकर वे अराजकतावादियों का भी सहयोग लेने को तैयार हैं।

प्रशांत भूषण कह रहे हैं कि हां, हम सत्ता परिवर्तन के लिए ही लड़ रहे हैं और इसमें कुछ गलत भी नहीं। वे खून-खराबे वाली क्रांति की भी बात कह चुके हैं। नेहा बोरा कह रही हैं कि उन्हें बांग्लादेश के आंदोलन से प्रेरणा मिली। उनकी समझ से बांग्लादेश का आंदोलन लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए था। वे जानबूझकर इसे भूल गईं कि बांग्लादेश के छात्र आंदोलन में कट्टरपंथी मजहबी तत्व शामिल थे और उन्होंने हिंसा का कैसा नंगा नाच किया था।

उन्हें यह भी याद नहीं रहा कि तब वहां किस बड़े पैमाने पर हिंदुओं की हत्याएं हुई थीं और कथित लोकतंत्र प्रेमी छात्रों ने चरमपंथी संगठन जमाते इस्लामी के साथ मिलकर चुनाव लड़ना पसंद किया था।

नेहा बोरा वामपंथी छात्र संगठन आईसा की नेता हैं, लेकिन राहुल गांधी अपने छात्र संगठन के नेताओं से अधिक उन पर भरोसा कर रहे हैं। इससे इसी बात की पुष्टि होती है कि वे वामपंथियों से कुछ ज्यादा ही प्रेरित हैं। यह भी सनद रहे कि कांग्रेस के एक और करीबी योगेंद्र यादव यह कह चुके हैं कि अब इस देश में लोकतंत्र का भविष्य संसद से नहीं, बल्कि सड़क से तय होगा। कांग्रेस नेताओं और विशेष रूप से राहुल गांधी को स्पष्ट करना होगा कि क्या वे अराजकता की खुली पैरवी करने वाले प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव और नेहा बोरा के विचारों से सहमत हैं?

उन्हें यह भी बताना चाहिए कि कॉकरोच जनता पार्टी से दूरी बनाते-बनाते उसके निकट जाने की जरूरत क्यों पड़ रही है? यदि वे मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के विभिन्न पहलुओं की सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट पर सच में भरोसा कर रहे हैं तो फिर सड़कों पर क्यों उतर रहे हैं? क्या यह सुप्रीम कोर्ट पर भरोसे का परिचायक है कि वे भीड़ के साथ मार्च करते हुए याचिका दाखिल करना पसंद करते हैं?

आखिर इसे अराजक व्यवहार के अलावा और क्या कहा जा सकता है? कांग्रेस केवल अपनी विचारधारा से भटक ही नहीं गई है, बल्कि वह लोकतांत्रिक मूल्यों का अनादर भी कर रही है। उसे अच्छे से पता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को महाभियोग के जरिये ही हटाया जा सकता है, लेकिन वह ऐसा जाहिर कर रही है कि यह काम अशांति पैदा करके भी हो सकता है।