ए. सूर्यप्रकाश। लगता है कि भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने और लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई मोदी सरकार को अस्थिर करने की कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा पश्चिमी देशों और वैश्विक संस्थाओं के समक्ष की गई अपील अब असर दिखाने लगी है। एक के बाद एक चुनावों में भाजपा को हराने में नाकाम रहने वाले राहुल गांधी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यही राग अलापते रहे कि पश्चिमी देश भारत में 'लोकतंत्र की पुनर्स्थापना' के लिए मदद नहीं कर रहे हैं। हालांकि अंतरराष्ट्रीय ताकतों से भारत के घरेलू मामलों में दखल देने की इस शर्मनाक अपील को उस समय कोई खास तवज्जो नहीं मिली थी, लेकिन अब ऐसा प्रतीत होता है कि पश्चिमी देशों और खुद भारत के भीतर सक्रिय शक्तियों के बीच साठगांठ मजबूत होती जा रही है।

यह एक विचित्र दुर्योग है कि जब कांग्रेस ने देश में अराजकता को बढ़ावा देकर मोदी सरकार को अस्थिर करने की व्यापक मुहिम शुरू की, उसी दौरान संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त के कार्यालय ने भारत को लोकतांत्रिक मूल्यों एवं परंपराओं पर नसीहत देना शुरू कर दिया है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने उसे दो-टूक जवाब देकर बिल्कुल सही किया कि वह अपने काम से काम रखे। इतना ही नहीं, भारत ने इस एजेंसी को आईना भी दिखाया कि उसके पड़ोसियों पाकिस्तान और बांग्लादेश में लोगों के दमन पर उसने कैसे आंखें मूंदें रखीं।

आखिर संयुक्त राष्ट्र की इस एजेंसी में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को नसीहत देने की यह जुर्रत कहां से आई? इसके जिम्मेदार राहुल गांधी जैसे लोग ही हैं। राहुल गांधी की गैर-जिम्मेदाराना हरकतों की कोई सीमा नहीं रह गई है। इसी क्रम में वे दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति एलन मस्क की भारत विरोधी भावनाओं के साथ सुर मिलाते दिखे। अपनी सैटेलाइट इंटरनेट सेवा प्रदाता स्टारलिंक को भारत में लाइसेंस न मिलने पर तिलमिलाए मस्क ने जब अपने इंटरनेट मीडिया प्लटेफार्म एक्स पर झुंझलाहट दिखानी शुरू की तो राहुल उनके साथ हो लिए।

इस मामले में वास्तविकता यह है कि मस्क की कंपनी भारत में नियमन के पैमानों को अभी तक पूरा नहीं कर पाई, लेकिन उन्होंने अपनी खीझ भारतीय उद्यमियों और सरकार पर उतारनी शुरू कर दी। इसमें राहुल उन्हें एक तरह से उकसाते नजर आए। इससे पहले डोनाल्ड ट्रंप ने भी जब भारतीय अर्थव्यवस्था को डेड इकोनमी बताया था तो राहुल ने उनसे सहमति जताने में देर नहीं लगाई थी, जबकि हकीकत यह है कि हाल में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर को लेकर अपना अनुमान और बढ़ाया है। वह भी तब जब वैश्विक अर्थव्यवस्था अस्थिरता एवं सुस्ती से जूझ रही है।

भारत को धमकाने से जुड़ी मस्क की मंशा को हल्के में नहीं लिया जा सकता। मस्क ने बोलीविया के निर्वाचित राष्ट्रपति को सत्ता से बेदखल करने के लिए अमेरिका को उकसाया था, क्योंकि बोलीवियाई राष्ट्रपति अपने लीथियम भंडार मस्क को औने-पौने दाम पर देने और इसके लिए लाइसेंस देने के पक्ष में नहीं थे। जब एक्स पर किसी यूजर ने मस्क को इस तख्तापलट की साजिश रचने का 'दोषी' ठहराया, तो उन्होंने बहुत अहंकार भाव से जवाब दिया कि 'हम जिसका चाहें तख्तापलट करेंगे, जिसे जो करना है कर ले।' तख्तापलट को लेकर मस्क की ऐसी दंभ से भरी स्वीकारोक्ति यही दर्शाती है कि कि स्टारलिंक लाइसेंस विवाद पर मोदी सरकार से उपजी उनकी हताशा और भारत में राहुल गांधी द्वारा पैदा की जा रही अस्थिरता को अलग-अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए।

मस्क और राहुल के बीच यह जुगलबंदी बहुत कुछ कहती है। इससे यह भी स्पष्ट है कि देसी उद्यमियों के विरुद्ध विषवमन करती रहने वाली कांग्रेस को मस्क जैसे विदेशी एवं बदमिजाज कारोबारी के लिए लाल कालीन बिछाने से भी कोई गुरेज नहीं, जिस व्यक्ति को सामान्य शिष्टाचार और मर्यादाओं का भान तक नहीं और जो मुकेश अंबानी को भारत का 'रीयल बास' यानी प्रधानमंत्री करार देने से संकोच नहीं करता। राहुल को इस मामले में कमल हासन से सीख लेनी चाहिए, जिन्होंने मस्क को आईना दिखाते हुए स्पष्ट किया था कि 'भारत एक लोकतांत्रिक देश है, कोई उपनिवेश नहीं। हमारे यहां दुनिया का स्वागत है, परंतु अपने भविष्य का फैसला केवल भारत की जनता करेगी, पश्चिमी स्वार्थ, उनकी दोहरे रवैये वाली नीतियां या कोई देसी-विदेशी अरबपति नहीं।'

इस सबके बीच अमेरिकी डीप स्टेट की पैदाइश या फिर उससे प्रोत्साहित मानी जा रही काकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी को कोई कैसे अनदेखा कर सकता है। मोदी सरकार में भारत का अभूतपूर्व विकास अमेरिकी डीप स्टेट को पच नहीं पा रहा और लगता है कि वह सीजेपी के रूप में अपने मोहरे के जरिये भारत में लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को गिराने की साजिश रच रहा है। ठीक वैसे ही, जैसे उसने बांग्लादेश और नेपाल में किया था। इस परिदृश्य में मोदी के एक अंधविरोधी वकील भी उभरते हैं, जिन्होंने एलान कर दिया कि मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने का एकमात्र रास्ता सिर्फ और सिर्फ 'क्रांति' है। उनके दिमाग में यह बात पूरी तरह शीशे की तरह साफ है कि वे लोकतांत्रिक तरीके से मोदी को शिकस्त नहीं दे सकते।

उन्हें यह कहने में भी कोई संकोच नहीं कि इसमें भारी 'खून-खराबा होगा', लेकिन इसके सिवा अब कोई दूसरा चारा भी नहीं बचा है। कुल मिलाकर देश में एक जहरीला गठजोड़ उभर रहा है। इसमें एक तरफ अमेरिकी डीप स्टेट है, जिसने अपने प्यादे को सीधे भारत में उतार दिया है। दूसरी तरफ एलन मस्क हैं, जो अपनी मनमानी शर्तें न मानने वाले मुल्कों में 'तख्तापलट' तक की धमकियां देते हैं। तीसरी तरफ हताश-निराश राहुल गांधी हैं, जो प्रधानमंत्री की कुर्सी पर अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं। अंत में वे बदहवास वामपंथी आते हैं, जो अब कहीं भी सत्ता में नहीं बचे। वामपंथियों के साथ प्रतिशोध के भाव से भरे ऐसे वकील हैं, जो खून-खराबे से ही वांछित परिणाम निकालने को बेताब हैं। अब यह देश की जनता को तय करना है कि वे अराजकता फैलाने वालों का साथ देंगे या फिर देश के विकास के लिए प्रतिबद्ध मोदी का?

(लेखक प्रसार भारती के अध्यक्ष रहे हैं)