आशुतोष झा। जो बात आज तक बंद कमरे में कही जा रही थी, जिस बात की अटकलें लगती थीं या फिर आरोप लगता था, उसे आखिरकार नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने खुद ही स्वीकार कर लिया है। चेन्नई में उन्होंने साफ-साफ कहा कि सरकार विरोधी आंदोलन को वह सत्ता बदलने और जाहिर तौर पर हासिल करने का संग्राम बनाना चाहते हैं। देश की सबसे पुरानी पार्टी अगर मुद्दा आधारित चुनावी राजनीति के बजाय अगले दो-ढाई साल तक इसी तरह आंदोलन करना चाहती है, सड़कों को बंद करना चाहती है, सरकार का विरोध करने के लिए भारतीय कंपनी की बजाय विदेशी कंपनी का स्वागत करना चाहती है तो यह स्वाभाविक रूप से चिंताजनक है। यह सोचना भी खतरनाक है कि पड़ोसी देश नेपाल और बांग्लादेश में जो कुछ और जिस तरह हुआ वह सही था। बहुत जरूरी है कि स्थापित राजनीतिक दल यह समझें कि जनता की उनसे गंभीर अपेक्षाएं होती हैं। अगर वह भी सामान्य छात्र संगठनों से प्रतिस्पर्धा करने लगेंगे तो अपने ही हाथ जलाएंगे।

लोकतंत्र में आंदोलन गैर-कानूनी नहीं है, लेकिन आंदोलन की सियासत राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता को ही खत्म करती है। खासतौर से तब जबकि मुद्दे का जमीनी जुड़ाव न हो। उसमें तथ्यों की कमी हो। कांग्रेस और विपक्षी दलों ने यहीं गलती कर दी। आंदोलन के जरिये उन्होंने सत्ता हासिल करने का मंसूबा तो जाहिर कर दिया, लेकिन मुद्दा गलत चुन लिया। मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को मुख्य मुद्दा बना लिया। वोट चोरी का नारा बुलंद किया जा रहा है, लेकिन खुद राहुल गांधी की ओर से शुरू किए गए सत्याग्रह पोर्टल ने मुद्दे की पोल खोल दी। इसमें लगभग दो प्रतिशत लोगों ने ही वोट चोरी को बड़ा मुद्दा माना है। अगर कांग्रेस अपने कार्यकर्ताओं से इतना भी मैनेज नहीं करवा पाई है तो आश्चर्य है कि ढाई साल तक आंदोलन कैसे चल पाएगा।

राहुल गांधी ने कुछ समय पहले कहा था कि ममता बनर्जी, उद्धव ठाकरे और तेजस्वी यादव भी वोट चोरी की बातों से पूरी तरह सहमत नहीं। हाल में आईएनडीआईए की बैठक में भी साफ हुआ कि कांग्रेस के ही कई नेता उनकी बातों से सहमत नहीं हैं। फिर ऐसे मुद्दे का चयन क्यों, जो जमीन से जुड़ा ही न हो। कांग्रेस की रणनीति भी समझ से परे है। छात्रों की गूंज जैसे गंभीर मुद्दे पर फूहड़ हास्य का चयन क्यों किया जाता रहा, जबकि उसका नुकसान ही हुआ। राष्ट्रपति से मिलने के बाद यह कहना कि उन्होंने वोट चोरी का आरोप मान लिया, जैसे बयान भी विश्वसनीयता के लिए घातक हो रहे हैं और बगैर विश्वसनीयता के न तो आंदोलन लंबा खिंच सकता है और न ही राजनीति।
एसआईआर की बात होते ही 13 करोड़ के आंकड़े उछाल दिए जाते हैं। इसे जितनी बार दोहराया जाएगा विश्वसनीयता उतनी कम होती जाएगी, क्योंकि आरोप-प्रत्यारोप के इस दौर में अब आम लोगों को भी आंकड़ा याद होने लगा है कि आपत्ति जताने वालों की संख्या इसके दसवें हिस्से से भी कम है।

यह सच है कि कानूनी रूप से वैध एक भी मतदाता सूची से बाहर नहीं छूटना चाहिए। चुनाव आयोग को भी इसकी पूरी फिक्र करनी चाहिए कि हर किसी को पर्याप्त समय मिले और अधिकारी फैसला लेने में सक्षम हों। विपक्षी दलों को बहुत फायदा होता अगर अपने कार्यकर्ताओं को सड़क बंद कराने की बजाय इस काम में लगा दिया होता कि उन मतदाताओं को दस्तावेज तैयार कराने से लेकर सुनवाई तक में मदद करें, जिनके नाम कथित रूप से बाहर हो गए हैं, पर ऐसा नहीं किया गया। एसआईआर मामले में विश्वसनीयता तभी बनेगी, जब ये राजनीतिक दल अपने खाते में कम से कम दस-दस हजार ऐसे नाम जोड़ें जो उनके परिश्रम के कारण मतदाता सूची में शामिल हुआ। फिलहाल किसी के खाते में एक भी नाम नहीं है। लिहाजा आंदोलन की राजनीति के बजाय सकारात्मक एजेंडे और रोडमैप की राजनीति पर जाना उनके हित में होगा। वे एंटी इनकंबेंसी के भरोसे न रहें कि सरकारें स्वत: बदल जाती है। यही सोच भ्रष्टाचार को बढ़ाता है। सरकारें तब भी दोबारा आती रही हैं, जब पूर्व में हुए एसआईआर को लेकर विवाद नहीं खड़ा हुआ करता था।

पिछले सप्ताह राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने लगातार तीन दिन तक दिल्ली में आंदोलन किया। रोज दोपहर के बाद विपक्षी दलों में भी सरप्राइज फैक्टर होता था कि आज किस तरफ जाना है और कहां धरना देना है। दो दिन बाद कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने आंदोलन की घोषणा की और उससे निपटने के लिए शासन-प्रशासन की तैयारी अभूतपूर्व थी। सच्चाई यह है कि राजनीतिक दलों का आचरण और व्यवहार एक सीमा के अंदर होता है। वहां जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति या समूह तक पहुंचती है। सीजेपी जैसे संगठन के आंदोलन में मर्यादा और जिम्मेदारी की यह सीमा नहीं होती। जुलाई में आंदोलन के दौरान यही तो हुआ जब आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के शामिल होने के सवाल पर सीजेपी ने पल्ला झाड़ लिया था। इसीलिए यह जिम्मेदारी पुलिस को लेनी होती है।

संविधान में सरकार गिराने और सरकार गठन का रास्ता तय है। दोनों ही नंबर से तय होते हैं और नंबर के लिए चुनाव जरूरी होते हैं। चुनाव के लिए वैध मतदाता संविधान की जरूरत है और वैध मतदाता की पहचान के लिए एसआईआर जरूरी है। संविधान स्पष्ट करता है कि किसी कानूनी प्रक्रिया की पड़ताल कोर्ट करेगा और कोर्ट ने एसआईआर को वैधानिक माना है। कोई आपत्ति है तो राजनीतिक दलों को फिर से कोर्ट जाना चाहिए। आखिर अब तक कोई राजनीतिक दल ज्ञानेश कुमार के खिलाफ शिकायत लेकर कोर्ट क्यों नहीं गया। दूसरों के पीछे छिपने का क्या अर्थ है।

जो तथ्य विपक्षी दल राष्ट्रपति को नहीं दे सके, वह कोर्ट में पेश किया जाना चाहिए। जो लोग सूची से बाहर हुए हैं, ऐसे मतदाताओं को दोबारा शामिल कराने के लिए पर्याप्त मदद देनी चाहिए। राजनीतिक दलों से इस व्यवहार की आशा जनता करती है, राजनीतिक दल से टूट कर बने किसी संगठन से यह आशा अपेक्षा नहीं होती है। वैसे खुद को छात्रों का प्रतिनिधि बताकर अब धीरे-धीरे राजनीति में प्रवेश की महत्वाकांक्षा पाले सीजेपी का चेहरा भी साफ होने लगा है। इसलिए उसे भी जवाब के लिए तैयार होना होगा। इस प्रेशर ग्रुप से अपेक्षा की जाएगी कि वह अपने राजनीतिक साथियों पर दबाव बनाए। सुधार का रास्ता तो विधायिका से ही आएगा।

(लेखक दैनिक जागरण के राजनीतिक संपादक हैं)