डॉ. रामानंद शर्मा। लोकतंत्र की मूल शक्ति नागरिक के सवाल पूछने के अधिकार में निहित है। लोगों को अपनी समस्याओं तथा प्रशासनिक विफलताओं के विरुद्ध आवाज उठाने का पूर्ण लोकतांत्रिक अधिकार प्राप्त है। सरकार से सवाल पूछना किसी भी स्थिति में लोकतंत्र विरोधी कदम नहीं कहा जा सकता। असंतोष की प्राथमिक अभिव्यक्ति या स्वाभाविक विरोध-प्रदर्शनों को खारिज करना न तो प्रशासनिक दृष्टि से उचित है और न ही लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुकूल, परंतु आज का सबसे विचारणीय प्रश्न असंतोष की उपस्थिति पर नहीं है। सवाल यह नहीं है कि युवाओं समेत देश के अन्य लोग अपनी चिंताओं को लेकर सड़कों पर क्यों उद्वेलित हैं। सवाल यह है कि उस आक्रोश और असंतोष की दिशा कौन तय कर रहा है? क्या वे अपने प्रामाणिक मुद्दों पर स्वयं मुखर हैं या उनके कंधों का इस्तेमाल किसी दलीय संघर्ष के लिए किया जा रहा है। यदि कोई आंदोलन दिशाहीन आक्रोश या परोक्ष राजनीतिक एजेंडे की भेंट चढ़ जाए, तो इसकी भरपाई पूरे समाज और राष्ट्र को चुकानी पड़ती है।

किसी भी आंदोलन की साख उसी प्रश्न से बनी रहती है, जिससे उसका जन्म हुआ था। जब आंदोलन की पहचान और प्राथमिकताएं बदलती हैं, तो उसका मूल उद्देश्य भी समाप्त हो जाता है। हालिया आंदोलनों में कुछ भटकाव दिखाई देता है। शुरुआत में मांगों की शृंखला स्वाभाविक और तार्किक थी। यह मूलतः एक सामाजिक और शैक्षणिक मांग थी, परंतु धीरे-धीरे यह विमर्श परीक्षा सुधारों के अपने मूल केंद्र से भटककर संवैधानिक संस्थाओं, निर्वाचन प्रक्रिया और दलीय आरोप-प्रत्यारोप का मंच बन गया। संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर स्वस्थ प्रश्न उठाना गलत नहीं है, पर जब परीक्षा सुधार के प्रश्नों से उपजा आंदोलन दलीय संस्थागत संघर्ष का रूप ले ले, तो उसे केवल स्वायत्त युवा आंदोलन कहना बौद्धिक ईमानदारी नहीं होगी। जब आंदोलन का लक्ष्य बदल जाता है, तो वास्तविक मुद्दे ठंडे बस्ते में चले जाते हैं। चुनावी राजनीति में सक्रिय राजनीतिक दल सदैव ऐसे स्वाभाविक सामाजिक असंतोष की ताक में रहते हैं। वे आंदोलनों को मंच, मीडिया में दृश्यता और संसाधन दे सकते हैं, परंतु इस बाहरी सहयोग की कीमत आंदोलन को अपनी स्वायत्तता गंवाकर चुकानी पड़ती है।

इतिहास साक्षी है कि एक सफल जनांदोलन के लिए सही प्रश्न, नैतिक नेतृत्व, स्पष्ट भाषा, अहिंसक पद्धति, प्रामाणिक तथ्य, सुदृढ़ संगठन और नवनिर्माण का दीर्घकालिक उद्देश्य अनिवार्य शर्तें हैं। वर्ष 1974 का जेपी आंदोलन इन सिद्धांतों का सबसे प्रामाणिक ऐतिहासिक उदाहरण है। मार्च 1974 में बिहार छात्र संघर्ष समिति के युवा प्रतिनिधियों ने स्वयं लोकनायक जयप्रकाश नारायण से आंदोलन का मार्गदर्शक बनने का विनम्र आग्रह किया था। जेपी ने छात्रों का नेतृत्व स्वीकार करने से पहले यह स्पष्ट शर्त रखी थी कि आंदोलन पूरी तरह अहिंसक रहेगा, अनुशासित रहेगा और किसी दलीय स्वार्थ का शिकार नहीं बनेगा। जेपी ने छात्रों के असंतोष का उपयोग कभी अपने या किसी दल के तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए नहीं किया। उनका नैतिक प्रभाव किसी सरकारी सत्ता से नहीं, बल्कि उनके सर्वोदय, त्याग और वैचारिक निष्ठा से आता था। जेपी ने युवाओं के आक्रोश को एक उच्च नैतिक धरातल प्रदान किया। उन्होंने आंदोलन को केवल सरकार हटाने के संकीर्ण नारे से निकालकर संपूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के रचनात्मक प्रश्न तक पहुंचाया। जब भी भीड़ के बीच उग्रता की संभावना बनी, तब जेपी ने लोगों को शांति और कठोर अनुशासन का संकल्प कराया। जनता ने भी उसका पूर्ण पालन किया।

आज की डिजिटल विरोध-संस्कृति और जेपी के आंदोलन माडल में एक बुनियादी अंतर दिखाई देता है। आज का तंत्र मुख्य रूप से इंटरनेट मीडिया की क्षणिक गोलबंदी, हैशटैग, वायरल वीडियो और त्वरित टकराव पर टिका हुआ है। इसके विपरीत जेपी का माडल जन-जागरण, निरंतर संवाद, विचार-विमर्श और अनुशासित संगठन पर आधारित था। केवल भीड़ जुटा लेना जनांदोलन नहीं होता। जन-जागरण से निकली हुई संगठित जनता ही वास्तविक जनांदोलन बनाती है। सड़क पर उतरने से पहले आंदोलन को जनता के सामने यह स्पष्ट करना होता है कि समस्या का वास्तविक स्वरूप क्या है, तथ्य क्या हैं, जिम्मेदारी किसकी है और समाधान का व्यावहारिक मार्ग क्या हो सकता है?

आज की राजनीति को एक बात साफ समझनी होगी कि छिटपुट प्रदर्शन और इंटरनेट मीडिया का शोर कभी व्यापक जनाधार नहीं बनते। जब आप सीमित घटनाओं के आधार पर पूरी व्यवस्था के ध्वस्त होने का ढोल पीटते हैं, तो आपसे ठोस सुबूत मांगे ही जाएंगे। 42 पूर्व न्यायाधीशों-अधिकारियों की चिट्ठी इसी मर्यादा की याद दिलाती है। बिना प्रमाण 'वोट चोरी' का हल्ला मचाना जनता का भरोसा तोड़ता है। मतदाता सूची के पुनरीक्षण यानी एसआइआर को भी इसी दृष्टि से ही देखना होगा। यह सूची को दुरुस्त करने का कानूनी काम है। बिना साक्ष्यों के गढ़े गए आरोप किसी गंभीर लड़ाई को दलीय अखाड़े की कुश्ती बना देते हैं, जहां अंततः आंदोलन की साख ही हारती है।

आज का भारत 1974 के भारत से अलग है। आज के युवा के पास डिजिटल तकनीक, स्टार्टअप इकोसिस्टम, नवाचार और बुनियादी ढांचे के विकास के नए अवसर उपलब्ध हैं। इसलिए केवल सवाल खड़े करना ही पर्याप्त नहीं है, समाधान का हिस्सा बनना भी उतना ही आवश्यक है। देश को हमेशा आंदोलित रहने वालों की नहीं, बल्कि समस्याओं का व्यावहारिक समाधान खोजकर समाज और राष्ट्र के नवनिर्माण में निरंतर सक्रिय रहने वालों की आवश्यकता है। किसी आंदोलन की सबसे बड़ी सफलता यह नहीं है कि कितने लोग उसके साथ सड़क पर आए। उसकी सबसे बड़ी सफलता यह है कि उसके बाद कितने लोग समाज और राष्ट्र के निर्माण के लिए समर्पित होकर खड़े रहे। केवल मुद्दा सही होना ही पर्याप्त नहीं है, उसे सही नेतृत्व, सही भाषा, सही पद्धति भी चाहिए। यही लोकनायक जेपी की विरासत है और यही आज की राजनीति का वास्तविक मार्ग है।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के आर्यभट्ट कालेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)