विचार: संकट बने दवाओं के मनमाने मूल्य
जब दवाएं आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत आती हैं तो फिर एमआरपी की छद्म-आधारित मूल्य व्यवस्था क्यों ही बनी हुई है?
HighLights
सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर दवाओं के मूल्य अंतर को 'कत्लेआम' कहा।
दवा कंपनियों और निजी अस्पतालों का लालच उजागर, मनमानी जारी।
'एक दवा, एक मूल्य' नीति का प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक।
प्रमोद भार्गव। हाल में सर्वोच्च न्यायालय ने कैंसर की दवाओं की एमआरपी (अधिकतम खुदरा मूल्य) और सरकारी खरीद मूल्य के बीच बड़े अंतर को अजूबा करार दिया। यह अंतर 10 गुना से भी ज्यादा है। 2,700 रुपये की खुदरा बिक्री मूल्य वाली कैंसर की दवा पर एमआरपी 27,000 रुपये अंकित होने पर सुप्रीम कोर्ट ने पहले तो इसे ‘दिन-दहाड़े' डकैती कहा और फिर अगली सुनवाई में इस भारी अंतर को दो टूक शब्दों में ‘कत्लेआम' यानी ‘सामूहिक-संहार' तक कहने में संकोच नहीं किया। दवा कारोबारी, निजी अस्पतालों और सरकारी अस्पतालों में दवाओं की खरीद करने वाले जिम्मेदारों के लिए इससे तीखी टिप्पणी और कोई हो नहीं सकती।
अदालत ने यह सवाल भी खड़ा किया कि इतना पैसा कहां जा रहा है और फायदा किसे हो रहा है? यह टिप्पणी सीधे-सीधे फार्मा कंपनियों, निजी अस्पतालों के मालिकों एवं चिकित्सक तथा सरकारी खरीद में लिप्त जिम्मेदारों का संवेदनहीन चेहरा सामने लाती है। यह विडंबना तब है, जब केंद्र सरकार एक दवा, एक मूल्य और एक गुणवत्ता नीति से जुड़ा कानून फरवरी 2025 में पूरे देश में लागू कर चुकी है। इस नियम के तहत दवा विक्रेताओं और ई-फार्मेसी को दवाओं की मूल्य-सूची को सार्वजनिक रूप से दिखाना अनिवार्य है, ताकि रोगियों को तय दामों पर ही उचित गुणवत्ता की मानक दवाएं मिल सकें, परंतु शीर्ष न्यायालय की इस तीखी प्रतिक्रिया से साफ है कि दवा विक्रेताओं और सरकारी दवा खरीद से जुड़े अधिकारियों ने इस कानून को बट्टे खाते में डाल दिया है।
अधिकांश कारपोरेट अस्पताल अब सेवा नहीं उद्योग बन गए हैं। ये अस्पताल के भीतर स्थित मेडिकल स्टोर से ही दवा खरीदने के लिए मजबूर करते हैं। यदि कोई रोगी बाहर से दवा लाने को कहता है तो उपचार की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेने की बात कहते हैं। जबकि इनमें से ज्यादातर अस्पताल आयुष्मान भारत और अन्य सरकारी लाभदायी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत भी उपचार करते हैं यानी दवा उत्पादकों और अस्पतालों की मनमानी कानून अस्तित्व में आने के बाद भी बनी हुई है। जब दवाएं आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत आती हैं तो एमआरपी की छद्म-आधारित मूल्य व्यवस्था क्यों बनी हुई है?
कुछ समय पहले कंपनी मामलों के मंत्रालय की एक सर्वे रिपोर्ट ने सरकार को आगाह किया था कि दवाएं आम आदमी की पहुंच से जानबूझकर बाहर की जा रही हैं। इस रिपोर्ट ने बताया था कि दवाओं की महंगाई का कारण दवा में लगने वाली सामग्री का महंगा होना नहीं है, बल्कि दवा कंपनियों के मुनाफे का लालच है। इस लालच के चलते कंपनियां राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) के नियमों का भी पालन नहीं करती हैं और दवाओं की कीमत कई गुना तक अधिक रख देती हैं। यहां तक कि नामी-गिरामी दवा कंपनियां भी दो सौ से पांच सौ गुना ज्यादा कीमत अपने दवा उत्पादों की रख रही हैं। महंगी दवा सरकारी अस्पतालों में भ्रष्टाचार के बूते खपाई जाती हैं। इसके पहले नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने भी देसी-विदेशी दवा कंपनियों पर सवाल उठाते हुए कहा था कि इन कंपनियों ने सरकार द्वारा उपलब्ध उत्पाद शुल्क में छूट का लाभ तो लिया, लेकिन दवाओं की कीमतों में कटौती नहीं की?
यह गोलमाल प्रत्यक्ष रूप से ग्राहकों के साथ तो हो ही रहा है, अप्रत्यक्ष रूप से सरकार के साथ राजस्व सेंध के रूप में भी हो रहा है। इसे लेकर कैग ने सरकार को दवा मूल्य नियंत्रण अधिनियम में संशोधन का सुझाव दिया था। ऐसे ही सुझावों को मानते हुए सरकार ने देशभर में फैले सीजीएचएस (केंद्रीय सरकार स्वास्थ्य योजना) के 1,200 अस्पतालों, 200 जांच केंद्रों, 500 वेलनेस सेंटर और 8,000 से अधिक जन-औषधि केंद्रों पर एक दवा, एक मूल्य लागू करने का ऐतिहासिक फैसला लिया है। हालांकि इस योजना पर प्रभावी अमल की दृष्टि से सरकार को मजबूत और पारदर्शी नेटवर्क बनाना होगा, जिसके लिए प्रभावी डाटा भी जरूरी है। दवा वितरण में बोली के आधार पर भागीदारी करने वाले विक्रेताओं की तकनीकी योग्यता से कहीं ज्यादा ईमानदारी के मानदंडों की जरूरत है। दवा क्रय समिति को भी उन दवाओं को खरीदने की जरूरत है, जो उपचार में प्रभावी और कीमत में सस्ती हों, क्योंकि अंततः सरकार का उद्देश्य आम आदमी को सस्ती, असरकारी और गुणवत्तापूर्ण दवाएं उपलब्ध कराना ही है।
चूंकि देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य राज्यों के अधिकार क्षेत्र में है, इसलिए उन्हें भी यदि इस योजना में भागीदार बनाया जाए तो दवा वितरण के साथ ही लाभार्थी रोगियों का दायरा भी बढ़ जाएगा। चिकित्सा का व्यवसाय जीवन रक्षा का पेशा है। वह मनुष्यता की संवेदना की सुरक्षा का नैतिक व्यवसाय है। लाचार मरीज चिकित्सक के पास स्वास्थ्य लाभ लेने की उम्मीद से जाता है, न कि दवा उद्योग के लालच को बढ़ाने की दृष्टि से? किंतु पैसा कमाने की अनैतिक होड़ का ही परिणाम है कि रोगी अब चिकित्सक को धरती का भगवान मानने से हिचक रहा है। इस अविश्वास के चलते ही अस्पतालों में चिकित्सक और रोगियों के परिजनों के बीच निरंतर मारपीट और ज्यादा धन वसूलने के विवाद सामने आ रहे हैं। इस परिप्रेक्ष्य में शीर्ष न्यायालय की डकैती और सामूहिक संहार जैसी टिप्पणियों को बेवजह की प्रतिक्रिया नहीं कहा जा सकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)










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