विचार: बेहतर विकल्प देने में अक्षम विपक्ष
यदि लोगों का सरकार से मोहभंग हो भी रहा है तो उसे प्रकट करने के लिए उनके सामने विकल्प क्या हैं?
HighLights
राहुल गांधी मोदी सरकार के प्रति मोहभंग न होने से हैरान।
विपक्ष शिक्षा, रोजगार जैसे मुद्दों पर ठोस योजना नहीं दे पाया।
बेहतर विकल्प के अभाव में जनता सरकार बदलने से हिचक रही।
शिवकांत शर्मा। नेता-प्रतिपक्ष राहुल गांधी को समझ नहीं आ रहा कि मोदी-शाह सरकार से लोगों का मोहभंग क्यों नहीं हो रहा? उनका मानना है कि भारतीय लोकतंत्र में एंटी इनकंबेंसी यानी सत्ता विरोधी रुझान ऐसी आधारभूत शक्ति है, जिससे कोई नहीं बच सकता। उनकी दादी इंदिरा गांधी पाकिस्तान के दो टुकड़े करने के बावजूद अपनी लोकप्रियता कायम नहीं रख पाईं और दो-तीन साल के भीतर मोहभंग की शिकार हो गईं, लेकिन किसी कारणवश यह मोदी के साथ क्यों नहीं हो रहा?
राहुल गांधी का अभिप्राय शायद यह था कि या तो चुनाव की प्रक्रिया में गड़बड़ी हो रही है या वोटिंग मशीनों में हेरफेर किया जा रहा है जिसे वे वोट चोरी कहते हैं। अपने आरोपों का अभी तक वे अकाट्य प्रमाण तो नहीं दे पाए हैं, लेकिन संभव है उनमें कुछ तथ्य भी हों। हालांकि उनके आरोपों की आधी धार तो इसी पहलू से कुंद हो जाती है कि भाजपा अपने 12 साल लंबे शासनकाल में राज्य स्तर के 20 चुनाव हार चुकी है, जिनमें उसका गढ़ समझे जाने वाले राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य भी शामिल हैं। पिछले आम चुनाव में ही उत्तर प्रदेश में अपेक्षित सफलता न मिलने के कारण पार्टी 240 सीटों पर सिमट कर रह गई।
अलबत्ता उनकी इस बात में दम है कि भारत में शासन के लंबे कार्यकाल में लोग सरकारों से उकताने लगते हैं। पंडित नेहरू, मनमोहन सिंह और नरेन्द्र मोदी की सरकारें इसकी अपवाद रही हैं। हालांकि मनमोहन सरकार ने दूसरे कार्यकाल में अशक्त और भ्रष्ट दिखने के कारण जनसमर्थन खो दिया था, लेकिन मोदी सरकार ने अपना दूसरा कार्यकाल तो आसानी से पूरा किया, मगर तीसरे कार्यकाल में वह लोगों की कुछ उकताहट का सामना करने लगी है। फिर भी मोदी की लोकप्रियता बरकरार है और पूर्वी राज्यों में पार्टी का फैलाव जारी है।
राहुल कहते हैं कि नेता विशेष की लोकप्रियता समझी जा सकती है, सरकार का प्रदर्शन भी समझा जा सकता है, मगर मोहभंग का गायब होना समझ नहीं आता। प्रश्न यह है कि क्या वे उसे समझने की कोशिश कर रहे हैं? ऐसा इसलिए, क्योंकि यदि लोगों का मोहभंग हो भी रहा है तो उसे प्रकट करने के लिए उनके सामने विकल्प क्या हैं? राहुल और उनका राजनीतिक धड़ा आईएनडीआईए ऐसा क्या नया पेश कर रहा है, जो मौजूदा सरकार से बेहतर हो। मोहभंग होने का मतलब जमीन छोड़कर अंधे कुएं में कूदना थोड़ी है?
चुनौतियों की बात की जाए तो एक सामान्य भारतीय परिवार के लिए बच्चों की शिक्षा मकान के किराए के बाद दूसरा सबसे बड़ा खर्च बन चुकी है। इसका कारण यही है कि सरकारी स्कूलों के खराब स्तर के कारण बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना पड़ता है और ऊपर से कोचिंग भी करानी पड़ती है। लाखों खर्चने के बाद भी बच्चों को रोजगार नहीं मिलता, क्योंकि सूचना-तकनीकी और एआई क्रांतियों के कारण उन कौशलों की मांग लगातार बदल रही है, जो रोजगार के लिए आवश्यक हैं। मौजूदा शिक्षा उसके साथ कदमताल नहीं बिठा पा रही।
मोदी सरकार ने गांधी जी की नई तालीम पर आधारित नई रोजगारोन्मुख शिक्षा नीति लागू तो की है, लेकिन पर्याप्त बुनियादी सुधारों और शिक्षकों के प्रशिक्षण के बिना वह अपेक्षित सुधार ला पाएगी, इसमें संदेह है। परीक्षा प्रणाली भी नकल और लीक माफिया के जाल में फंस चुकी है। क्या राहुल और उनके गठबंधन की पार्टियों के पास इस विकराल समस्या के समाधान की कोई योजना है? गूंज समारोहों में छात्रों को उकसाने से क्या होगा, जबकि नकल को बढ़ावा देना तो आईएनडीआईए के राजद जैसे दलों की ही नीति रही है?
मोदी सरकार बड़ी संख्या में औद्योगिक रोजगारों के सृजन की आशा के साथ सत्ता में आई थी, लेकिन करीब ढाई कार्यकाल पूरे होने के बाद भी वह ऐसी आशाएं अपेक्षित रूप से पूरी नहीं हो पाई है। क्या आईएनडीआईए की कोई ठोस योजना हैं, जिससे उद्योग-धंधों का सृजन हो सके? बिहार, बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश में सिंडिकेट, रंगदारी, माफिया और बाहुबलियों के आतंक से कानून व्यवस्था इतनी खराब होती गई कि वहां निवेश का जोखिम कोई नहीं उठाना चाहता। चाहे भी तो आईएनडीआईए के कुछ दलों का नाम ही उसे भगाने के लिए काफी हैं। राहुल स्वयं कहते हैं कि किसके पास कितनी संपत्ति है, इसका हिसाब एक्स-रे सर्वेक्षण से लिया जाएगा। कुछ बड़े उद्योगपतियों के दानवीकरण में भी वे लगे रहते हैं। ऐसे राजनीतिक माहौल में उद्योग-धंधे और उन पर आधारित रोजगार कैसे पनप सकेंगे?
दुनिया में एआई जनित मशीनी क्रांति की दौड़ में टिके रहने पर मंथन हो रहा है। नई प्रतिभाओं को खोजा और विकसित किया जा रहा है, ताकि शोध, आविष्कार और नवाचार की दौड़ में आगे रहा जा सके। वहीं, राहुल 'जितनी आबादी-उतना हक' के नारों के साथ अतीत के अन्याय का हिसाब करने में लगे हैं। कभी सचिवालय में पिछड़े वर्ग की गिनती करते हैं, कभी शिक्षा और स्वास्थ्य संस्थानों में, तो कभी सेना के अफसरों में। जिस संविधान की रक्षा का दम भरते हैं, उसी की धारा 45 में दस साल के भीतर पूर्ण साक्षरता लाने का निर्देश था, जिसे उनकी पार्टी की सरकारें पूरा नहीं कर पाईं।
यदि उसे समय पर पूरा करते हुए हर सरकारी स्कूल में सबको अच्छे प्राइवेट स्कूलों जैसी शिक्षा दी गई होती तो शायद आज उन्हें यह गिनती न करनी पड़ती। संभव है कि सरकार से कुछ मोहभंग हो रहा हो, पर उसे भुनाने के लिए विकल्प क्या हैं? कांग्रेस ने किसान आंदोलन का साथ दिया। कृषि सुधारों को काला कानून कहकर रद करा लिया। अब कोई पूछे कि हर गांव-कस्बे में फसलों के भंडारण और प्रसंस्करण के लिए किसके पास क्या योजना है, ताकि जिस प्याज-टमाटर के दाम बेमौसम आसमान छूने लगते हैं, उन्हें फसल के समय फेंकना न पड़े?
इसलिए सुधारों का विरोध उन्हें रोकने की जगह उनमें बेहतरी के लिए होना चाहिए। लगभग हर लोकतांत्रिक देश में विपक्ष अवैध घुसपैठ की रोकथाम की मांग कर रहा है, लेकिन भारत में उलटा है। लगभग हर देश में मतदाता सूचियों से मृतकों और विस्थापितों के नाम हटाकर उन्हें दुरुस्त रखा जाता है। भारत में इसका भी विरोध हो रहा है और लोग बस देख रहे हैं, क्योंकि वे शायद समझ चुके हैं कि बेहतर विकल्प के बिना केवल मोहभंग में सरकारें गिराने से कुछ हासिल नहीं होता।
(लेखक बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक हैं)




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