श्री माता अमृतानंदमयी देवी। अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा हुआ नेता ही राष्ट्र और उसकी जनता का मार्गदर्शन अपनी पारंपरिक जड़ों से विमुख हुए बिना कर पाता है। ऐसा नेतृत्व यह भलीभांति समझता है कि देश की समृद्धि के लिए उसकी पुरातन संस्कृति का संरक्षण कितना आवश्यक है। यह संपूर्ण प्रक्रिया भौतिक समृद्धि और देश की समृद्ध विरासत के बीच संतुलन साधने की है। प्रधानमंत्री मोदी यही सिद्ध करने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। उनके लिए भारत केवल भूमि का कोई टुकड़ा मात्र नहीं है। यह उनके विचारों में है और वे इसी के लिए जीते हैं।

मोदी जी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनने से बहुत पहले से जानने के कारण मैं यह कह सकती हूं कि समाज सुधार पर उनका बल, राष्ट्र के प्रति उनके उस प्रेम से जुड़ा है, जो सदैव एक तेज ज्योति की तरह जलता रहा है। इसके बाद उन्होंने जो भी दायित्व संभाला, यह ज्वाला और अधिक प्रखर ही हुई है। उन्होंने केवल भारत माता की सेवा ही नहीं की है, अपितु अपना संपूर्ण जीवन उनके चरणों में समर्पित कर दिया है। दिन-रात, बिना थके और बिना रुके, वे हमारे राष्ट्र की भौतिक उन्नति और आध्यात्मिक जागृति के लिए अनवरत परिश्रम कर रहे हैं।

दशकों से मैंने एक ऐसे भारत का स्वप्न देखा है, जो अधिक स्वच्छ हो, अधिक करुणामय हो और धर्म की जड़ों के साथ गहराई से जुड़ा हो। आज प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में देशभर में जो परिवर्तन आकार ले रहे हैं, वे उन्हीं संकल्पों और दृष्टियों का ही प्रतिबिंब हैं, जिन्हें मैंने लंबे समय से संजो रखा था। यह बदलाव हमारे गांवों से अधिक स्पष्ट कहीं और दिखाई नहीं देता। वहां शिक्षा, स्वास्थ्य, पौष्टिक आहार, स्वच्छता, स्वास्थ्य-रक्षा और नशीले पदार्थों के दुष्प्रभावों को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। बहुत कुछ बदला है, फिर भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

मेरा जन्म और पालन-पोषण एक छोटे से तटीय गांव में हुआ, जहां के परिवार पूरी तरह से समुद्र और मछलियों को पकड़ने पर निर्भर थे। एक छोटी बच्ची के रूप में भी मैंने अपने आसपास के लोगों के कष्टों को बहुत निकट से देखा। उन आरंभिक अनुभवों ने मेरे भीतर नि:स्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा करने और सभी के प्रति करुणा भाव रखने की गहरी अभिलाषा को जन्म दिया। मेरी समझ के अनुसार अनासक्ति ही निःस्वार्थता की आधारशिला है। मेरा विश्वास है कि प्रधानमंत्री मोदी में यह गुण नैसर्गिक रूप से विद्यमान है और यही उन्हें आंतरिक शक्ति भी प्रदान करता है।

विगत 35 वर्षों में मैंने पश्चिमी देशों का व्यापक भ्रमण किया है। वहां के अनुभव से यह आकांक्षा जगी कि हमारी सड़कें और नदियां भी उतनी ही स्वच्छ हों और जहां लोग सार्वजनिक स्थलों को साफ-सुथरा रखने में गर्व का अनुभव करें। हम अपने मंदिर परिसरों को तो स्वच्छ रखते हैं, किंतु ईश्वर तो सर्वव्यापी हैं, इसलिए इस धरा का प्रत्येक इंच ईश्वर का ही स्वरूप है और उसी आदर एवं देखभाल का अधिकारी है। मेरी यह चिर अभिलाषा रही है कि यह चेतना हमारे विद्यालयों से ही आरंभ हो। मुझे इसका अपार हर्ष है कि प्रधानमंत्री स्वच्छता के इस महायज्ञ को देश के कोने-कोने तक ले जा रहे हैं।

मैं एक ऐसे भारत की कल्पना करती हूं, जहां बेटियों को बोझ समझने के बजाय लक्ष्मी के रूप में देखा और स्वीकारा जाए। मैं एक ऐसे देश का स्वप्न देखती हूं, जहां प्रत्येक स्त्री किसी भी सड़क पर, किसी भी समय, बिना किसी भय के चल सके और जहां राष्ट्र-निर्माण में महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हों। जब महिलाएं नेतृत्व करने और प्रबंधन संभालने के लिए आगे आएं, तो पुरुषों को केवल उनके लिए मार्ग ही प्रशस्त नहीं करना चाहिए, बल्कि उनके मार्ग में अनावश्यक बाधाएं डालने से भी बचना चाहिए। दोनों पक्षों के बीच वास्तविक समता और समानता स्थापित होनी चाहिए। इस दिशा में भी प्रधानमंत्री मोदी ने अत्यंत महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।

युवा पीढ़ी के नशे के दलदल में भटकने को लेकर मैं लंबे समय से अत्यंत चिंतित रही हूं-चाहे वह मादक द्रव्यों और मदिरा का नशा हो या फिर आधुनिक गैजेट्स का। मुझे प्रसन्नता है कि प्रधानमंत्री ने नशा मुक्त भारत और नशा मुक्त युवा अभियान के माध्यम से इस विषय को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया है। मैं एक ऐसे भारत का स्वप्न देखती हूं, जहां गाय, वन्यजीव, वन, पर्वत और हमारे सभी प्राकृतिक संसाधनों का प्रेमपूर्वक संरक्षण हो। पीएम मोदी ने इन विषयों पर भी ध्यान देते हुए हमारी प्राकृतिक विरासत, वन्यजीवों तथा हमारी देसी नस्लों के संरक्षण और संवर्धन के लिए कार्य किया है।

प्रधानमंत्री को राम राज्य के आदर्शों को स्थापित करते देखना अत्यंत हृदयस्पर्शी है। इस आदर्श की मूल भावना उन प्रश्नों में समाहित है, जो प्रभु श्रीराम ने भरत से राज्य की स्थिति के विषय में पूछे थे: क्या किसान प्रोत्साहित हैं? क्या नदियां, गोवंश और वन सुरक्षित हैं? क्या महिलाएं और बच्चे भयमुक्त एवं सुरक्षित हैं? इन सबके मूल में मेरा एक अत्यंत आत्मीय विश्वास निहित है कि स्थायी सुधार केवल कानूनों से नहीं, बल्कि परिवर्तित हृदयों से आता है। प्रत्येक नागरिक को 'अपने में स्वयं दीप प्रज्वलित करना होगा।' इसके लिए सच्चे मानवीय प्रयास और ईश्वरीय कृपा-दोनों की आवश्यकता है। मेरी हार्दिक इच्छा है कि भारत एक बार पुनः विश्व-गुरु और विश्व-मित्र के रूप में प्रतिष्ठित हो।

यह देखकर मेरा मन अत्यंत आनंदित होता है कि विगत एक दशक में प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों ने हमारे राष्ट्रीय जीवन के कितने विविध आयामों को छुआ है। उनके अनवरत प्रयास हमारे राष्ट्र की प्रगति को गति प्रदान कर रहे हैं। मैं उन्हें स्वार्थ-रहित और ऐसे अनासक्त नेता के रूप में देखती हूं, जो केवल एक ही लक्ष्य के प्रति समर्पित हैं-भारत के खोए हुए वैभव को पुनर्स्थापित करना। अंतर्मन से वे एक संन्यासी हैं और कर्म से एक कर्मयोगी तथा समाज सुधारक।

(अम्मा के नाम से लोकप्रिय लेखिका विश्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक एवं मानवीय मार्गदर्शक हैं)