अपने संकीर्ण राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग और विशेष रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सड़कों पर उतर कर जैसा अभियान छेड़ दिया है, उसका प्रतिवाद करने के लिए दोनों चुनाव आयुक्तों को भी आगे आना चाहिए, क्योंकि वे उसी संवैधानिक संस्था के महत्वपूर्ण सदस्य हैं, जिसकी प्रतिष्ठा को नष्ट करने की कोशिश की जा रही है।

इसका संज्ञान सुप्रीम कोर्ट को भी लेना चाहिए, क्योंकि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का हर पहलू उसकी जानकारी में है और उसने इस प्रक्रिया को बार-बार अपनी सहमति भी प्रदान की है। यदि उसने इस मामले में हस्तक्षेप नहीं किया तो कल को उसके साथ-साथ अन्य संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करने का अभियान छेड़ा जा सकता है।

लोकतंत्र अपनी संस्थाओं से ही शक्ति पाता है। उन्हें कमजोर करने का अर्थ है लोकतंत्र को खोखला करना। अभी तक विपक्ष यह काम केवल निराधार आरोपों और एसआइआर प्रक्रिया की छोटी-मोटी त्रुटियों को तिल का ताड़ बनाकर कर रहा था, लेकिन अब उसकी ओर से शांतिपूर्ण आंदोलन की आड़ में अराजकता का सहारा लेने की भी कोशिश हो रही है। चुनाव आयोग के खिलाफ जनता को गुमराह करने वाले भड़काऊ नारे कोई शुभ संकेत नहीं।

अब इसमें भी कोई संदेह नहीं कि काकरोच जनता पार्टी का भी एजेंडा वही है, जो हताश-निराश विपक्ष का है। विपक्षी दल इसलिए आपे से बाहर हो रहे हैं, क्योंकि एसआइआर के खिलाफ उनकी दलीलें सुप्रीम कोर्ट के समक्ष टिक नहीं पा रही हैं। केरलम सरकार की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ बीस वर्ष पुराने मामले को खोलना केवल कांग्रेस की हताशा का ही परिचायक नहीं, बल्कि इसका भी सूचक है कि उसे कुछ सूझ नहीं रहा है।

विपक्षी दल इसकी जानबूझकर अनदेखी कर रहे हैं कि चुनाव आयुक्तों के बीच असहमति को लेकर जो नैरेटिव खड़ा किया गया था, वह भोथरा पड़ चुका है। इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण और कुछ नहीं हो सकता कि जिस चुनाव आयोग ने चुनाव प्रक्रिया में लगातार सुधार कर विश्व में अपनी एक साख बनाई है और भारतीय लोकतंत्र की प्रतिष्ठा बढ़ाई है, उसे विपक्षी राजनीतिक दल मनगढ़ंत आरोपों के सहारे धूमिल करने की कोशिश कर रहे हैं।

हर कोई इससे अवगत है कि मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर अशुद्धियां हैं और उन्हें ठीक करने का काम एसआईआर के जरिये ही हो सकता है, लेकिन इस झूठे आरोप के सहारे उसका विरोध किया जा रहा है कि इससे राजनीतिक दल विशेष को लाभ पहुंचाया जा रहा है। यदि वास्तव में ऐसा है तो कांग्रेस केरलम में सत्ता में कैसे आ गई और तमिलनाडु में भी विपक्षी दल ने जीत कैसे हासिल कर ली?