राजीव सचान। आतंकवाद से लड़ना केवल इसलिए कठिन नहीं है कि इसका ठिकाना नहीं कि कौन कब अतिवादी-जिहादी विचारों से भर जाए। ऐसे लोगों का किसी आतंकी संगठन से जुड़ना जरूरी नहीं। वे कट्टरपंथी विचारों से कुप्रेरित होकर अकेले ही आतंकी घटना को अंजाम दे सकते हैं। कई देशों में ऐसी घटनाएं होती भी रहती हैं, जिन्हें 'लोन वुल्फ' कहे जाने वाले आतंकी अंजाम देते हैं। वे कभी किसी सार्वजनिक स्थल पर बम विस्फोट कर देते हैं या भीड़ पर ट्रक चढ़ा देते हैं अथवा लोगों पर अंधाधुंध गोलियां बरसा देते हैं। हाल में ऐसी एक घटना आस्ट्रेलिया में हुई थी।

लोन वुल्फ या किसी संगठन से जुड़े आतंकियों में डाक्टरों, इंजीनियरों और पायलटों तक की भी गिनती होने लगी है। दिल्ली में लाल किला बम विस्फोट डाक्टरों के एक आतंकी समूह का कारनामा था। इस कार विस्फोट को एक आत्मघाती आतंकी ने अंजाम दिया था। फ्लाईदुबई का ओमानी मूल का को-पायलट हमाम अल-हम्मामी भी आतंकी निकला। वह उन अलकायदा आतंकियों से कुप्रेरित जान पड़ता है, जिन्होंने अमेरिका में 9/11 की घटना को अंजाम दिया था।

अभी तक की जांच के आधार पर यही माना जा रहा है कि अल-हम्मामी एक लोन वुल्फ आतंकी है। उसका इरादा भारतीय पायलट स्मित मच्छर को काकपिट में मारकर 174 यात्रियों से भरे विमान को तेल अवीव के हवाईअड्डे पर ध्वस्त करने का था। यह 9/11 सरीखी भीषण आतंकी घटना होती और इसमें हजारों लोग मारे जा सकते थे। कल्पना करें, इसके बाद पश्चिम एशिया के क्या हालात होते? स्मित मच्छर ने अपने अप्रतिम साहस से अल-हम्मामी के शैतानी इरादों को नाकाम कर दिया। वे दुनिया भर के लिए हीरो बन गए हैं।

आमतौर पर हर कोई उनकी प्रशंसा कर रहा है, लेकिन हर मामले में साजिश की कहानी गढ़ने वाले कुछ तत्व इस घटना को फाल्स फ्लैग आपरेशन यानी इजरायली प्रधानमंत्री के इशारे पर की गई कार्रवाई बता रहे हैं, ताकि वे चुनावी लाभ उठा सकें। आखिर जिस आतंकी घटना को एक भारतीय पायलट ने नाकाम किया, उससे इजरायली प्रधानमंत्री को चुनावी लाभ कैसे मिल जाएगा? समस्या यह है कि कुतर्क गढ़ने वाले तर्क और तुक की बात सुनना पसंद ही नहीं करते। यह नई आदत नहीं। 9/11 के बारे में भी यही कहा गया था और 26/11 को लेकर भी।

याद करें, इस आतंकी हमले पर 'आरएसएस की साजिश' नामक एक किताब लिखी गई थी, जिसका लोकार्पण करने वालों में कांग्रेस नेताओं के साथ फिल्मकार महेश भट्ट भी थे। पहलगाम हमले को लेकर भी पाकिस्तानियों ने यह दुष्प्रचार किया था कि यह उन्हें बदनाम करने के लिए भारत का फाल्स फ्लैग आपरेशन था। ऐसे तत्व केवल आतंकवाद का बचाव ही नहीं कर रहे होते, बल्कि उससे लड़ाई में बाधक भी बन रहे होते हैं। वे कई बार आतंकियों को पीड़ितों का रहनुमा बताकर उनका गुणगान करने में भी संकोच नहीं करते।

आतंकवाद से लड़ना इसलिए भी कठिन हो गया है, क्योंकि कुछ लोग आतंकियों की हरकतों और उनसे लड़ने वालों पर मौन रहना पसंद करते हैं। इस तरह वे आतंकियों से हमदर्दी रखने वालों को बल प्रदान करते हैं। ऐसे लोग दुनिया में हर कहीं हैं और दुर्भाग्य से भारत में भी। अब यह कोई दबी-छिपी बात नहीं कि विपक्ष के अनेक कथित सेक्युलर नेताओं ने स्मित मच्छर की बहादुरी की तारीफ में एक शब्द भी कहने की जरूरत नहीं समझी। यद्यपि उनके मौन पर सवाल उठे, फिर भी वे चुप ही रहे।

इसके कारणों को समझना कठिन नहीं। इसका कारण है मुस्लिम वोट बैंक की संकीर्ण राजनीति। मुस्लिम समाज का एक हिस्सा इजरायल को शत्रु ही नहीं मानता, वह उसकी तबाही की कामना भी करता है। इसके लिए वह हमास जैसे संगठनों की तारीफ करने में भी संकोच नहीं करता। चूंकि भारत में अलकायदा और आईएस के आतंक में हाथ बंटाने वाले लोग भी सामने आ चुके हैं, इसलिए हमास से हमदर्दी रखने वालों की मौजूदगी पर हैरानी नहीं। यह सिद्ध भी हो चुकी है।

तीन साल पहले हमास आतंकियों ने इजरायल में भीषण आतंकी हमला कर करीब 12 सौ लोगों को मार दिया था और कुछ लोगों को बंधक बनाकर अपने साथ गाजा ले आए थे। इस आतंकी हमले के जवाब में इजरायल ने गाजा में कठोर सैन्य कार्रवाई की। इसमें हजारों लोगों की जान गई। इससे मुस्लिम जगत में इजरायल के खिलाफ गुस्सा और बढ़ा। इसी दौरान केरलम में एक रैली में हमास नेता खालिद मशाल का वर्चुअल भाषण कराया गया। इस रैली का आयोजन जमात-ए-इस्लामी हिंद की युवा शाखा ने किया था। रैली फलस्तीनी लोगों का समर्थन करने के नाम पर बुलाई गई थी, लेकिन उसमें हमास नेता का भाषण कराना जरूरी समझा गया।

इस रैली में 'बुलडोजर हिंदुत्व और रंगभेदी यहूदीवाद को उखाड़ फेंकने' के नारे भी लगाए गए थे। कहीं ऐसा तो नहीं कि ऐसे ही लोगों की भावनाओं को दुख पहुंचने की आशंका के चलते ही तमाम विपक्षी नेता स्मित मच्छर की बहादुरी को लेकर चुप्पी साधे हुए हैं? ऐसे मामलों में मौन धारण करके एक तरह से समस्त मुस्लिम समाज की छवि को मलिन करने का भी काम किया जाता है और उसके बीच की उन आवाजों को दबाया जाता है, जो सही को सही और गलत को गलत कहना पसंद करते हैं। यदि असदुद्दीन ओवैसी स्मित मच्छर की तारीफ कर सकते हैं तो विपक्षी दलों के अन्य नेता क्यों हिचक रहे हैं?

(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)